भारत की जलवायु और मानसून व्यवस्था
मुख्य तथ्य
- 1875 में भारत मौसम विज्ञान विभाग अवलोकन, पूर्वानुमान, चक्रवात चेतावनी, लू मानदंड और जलवायु आँकड़ों के लिए भारत की राष्ट्रीय मौसम सेवा का आधार बना।
- 1 जून के आसपास भारत मौसम विज्ञान विभाग दक्षिण-पश्चिम मानसून के केरल आगमन को सामान्य मानता है;
- 8 जुलाई के आसपास दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा से आगे बढ़ते हुए पूरे देश को ढक लेता है।
- IMD में तुलना का आधार उत्पाद के अनुसार बदलता है: वर्षा सामान्य 1971-2020 पर और कई अन्य जलवायु सामान्य 1991-2020 पर आधारित हैं।
- भारत मौसम विज्ञान विभाग के लू मानदंडों में अधिकतम तापमान सीमा मैदानों के लिए 40 डिग्री सेल्सियस, तटीय स्टेशनों के लिए 37 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी क्ष...
मुख्य बिंदु
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1875 में भारत मौसम विज्ञान विभाग अवलोकन, पूर्वानुमान, चक्रवात चेतावनी, लू मानदंड और जलवायु आँकड़ों के लिए भारत की राष्ट्रीय मौसम सेवा का आधार बना।
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1 जून के आसपास भारत मौसम विज्ञान विभाग दक्षिण-पश्चिम मानसून के केरल आगमन को सामान्य मानता है; इसी से भारत की मुख्य वर्षा ऋतु का संचालनात्मक आरंभ समझा जाता है।
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8 जुलाई के आसपास दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा से आगे बढ़ते हुए पूरे देश को ढक लेता है।
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जून-सितंबर में दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत के अधिकांश हिस्सों को मुख्य मौसमी वर्षा देता है और खरीफ बुवाई, जलाशयों तथा भूजल पुनर्भरण को मजबूत ढंग से नियंत्रित करता है।
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अक्टूबर-नवंबर में लौटती या उत्तर-पूर्वी मानसूनी पवनें बंगाल की खाड़ी पार करने के बाद तमिलनाडु तट पर बड़ी वर्षा लाती हैं।
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मई-जून और अक्टूबर-नवंबर उत्तर हिंद महासागर के चक्रवातों के लिए विशेष रूप से मानसून-संक्रमण खिड़कियों से जुड़े हैं।
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IMD में तुलना का आधार उत्पाद के अनुसार बदलता है: वर्षा सामान्य 1971-2020 पर और कई अन्य जलवायु सामान्य 1991-2020 पर आधारित हैं। इससे किसी एक चरम मौसम को दीर्घकालिक जलवायु मान लेने की गलती घटती है।
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भारत मौसम विज्ञान विभाग के लू मानदंडों में अधिकतम तापमान सीमा मैदानों के लिए 40 डिग्री सेल्सियस, तटीय स्टेशनों के लिए 37 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए 30 डिग्री सेल्सियस है; इसके साथ सामान्य तापमान से विचलन भी देखा जाता है।
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भारत की जलवायु का मूल चरित्र
व्यापक रूप से भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है, लेकिन इस नाम के भीतर मजबूत क्षेत्रीय अंतर छिपे हैं। भारत उत्तरी गोलार्ध में है; मुख्य भूमि लगभग 8°4' उत्तर से 37°6' उत्तर अक्षांशों तक फैली है और कर्क रेखा देश के मध्य भाग से गुजरती है। इस स्थिति से दक्षिण भारत उष्णकटिबंधीय-समुद्री प्रभाव के अधिक निकट आता है, जबकि उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमी अंतर अधिक तीखे दिखते हैं। हिमालय मध्य एशिया की बहुत ठंडी महाद्वीपीय हवा को रोकता है, हिंद महासागर तीन ओर से नमी देता है और वर्षा से पहले उत्तर-पश्चिमी भूभाग तेज़ी से गर्म होता है। अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से दूरी, स्थलाकृति और दाब-पट्टियाँ मिलकर भारत का जलवायु-पैटर्न बनाती हैं। इसलिए CET उत्तर में जलवायु को अलग-अलग स्थानों की सूची नहीं, बल्कि एक तंत्र के रूप में पढ़ना चाहिए।
मुख्य वार्षिक लय के चार परिचित चरण हैं: शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, आगे बढ़ता दक्षिण-पश्चिम मानसून और लौटता मानसून। शीत ऋतु भारत के अधिकांश भागों में साफ और शुष्क रहती है, केवल जहाँ पश्चिमी विक्षोभ वर्षा या हिमपात लाते हैं वहाँ अपवाद दिखता है। ग्रीष्म ऋतु उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान पर ऊष्मीय निम्न-दाब बनाती है। इसके बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून पवन-दिशा को उलटता है और समुद्री नमी को भीतर लाता है। सितंबर के बाद वापसी और पवन-उलटाव एक अलग लौटते मानसून का चरण बनाते हैं।
सबसे उपयोगी ढाँचा विविधता में एकता है: मानसूनी पवनें देश को जोड़ती हैं, लेकिन वर्षा मरुस्थलीय राजस्थान से नम मेघालय पहाड़ियों तक और मालाबार तट से कोरोमंडल तट तक बदलती रहती है। मुंबई, कोच्चि और चेन्नई में दिल्ली, जयपुर और नागपुर जैसे भीतरी शहरों की तुलना में समुद्री संतुलन अधिक दिखता है; पश्चिमी घाट, मेघालय पहाड़ियाँ और अरावली की दिशा भी वर्षा-वितरण को बदलती हैं।
मुख्य विचार: राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जलवायु मानसूनी है, लेकिन स्थानीय परिणाम अक्षांश, स्थलाकृति, समुद्र से दूरी और मौसमी परिसंचरण पर निर्भर करते हैं।
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