भारत की प्रमुख नदियां, झीलें और अपवाह तंत्र
मुख्य तथ्य
- CET स्नातक 2026 के भारत भूगोल भाग में प्रमुख नदियां, बांध, झीलें और महासागर साफ तौर पर शामिल हैं, इसलिए यह विषय स्नातक-स्तर के पेपर के दायरे में है।
- नदी परियोजनाएं, जलमार्ग और विवाद भूगोल के उपयोगी संकेत हैं: भाखड़ा-नांगल-सतलुज, हीराकुंड-महानदी, सरदार सरोवर-नर्मदा, राष्ट्रीय जलमार्ग 1 गंगा-भागीरथी-...
- शासन के तथ्य अलग-अलग रखें: अनुच्छेद 262, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, जल अधिनियम, 1974, आर्द्रभूमि नियम, 2017, राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम,...
मुख्य बिंदु
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CET स्नातक 2026 के भारत भूगोल भाग में प्रमुख नदियां, बांध, झीलें और महासागर साफ तौर पर शामिल हैं, इसलिए यह विषय स्नातक-स्तर के पेपर के दायरे में है।
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अपवाह के प्रश्न द्रोणी, जल-विभाजक, स्थलरूप और मुहाने से शुरू करें: नदी-द्रोणी, नहर कमान क्षेत्र, जलाशय, डेल्टा और ज्वारनदमुख एक ही चीज नहीं हैं।
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हिमालयी अपवाह का आधार सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हैं; ये नदियां हिम-पिघलन और वर्षा से जल पाती हैं तथा मैदान, बाढ़, निक्षेप और सिंचाई से जुड़ती हैं।
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सिंधु जल संधि के पाठ में सतलुज, ब्यास और रावी को पूर्वी नदियां तथा सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां कहा गया है; इसे संधि-वर्गीकरण मानें, प्राकृतिक नक्शा-रेखा नहीं।
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प्रायद्वीपीय अपवाह में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी मुख्यतः बंगाल की खाड़ी की ओर जाती हैं, जबकि नर्मदा और तापी प्रमुख पश्चिमवाहिनी भ्रंश-घाटी अपवाद हैं।
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झील और आर्द्रभूमि के उदाहरण राज्य, उत्पत्ति और जल-प्रकृति के साथ याद करें: वुलर, लोकतक, कोलेरू, चिलिका, पुलिकट, वेम्बनाड-कोल और सांभर एक ही प्रकार की झीलें नहीं हैं।
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नदी परियोजनाएं, जलमार्ग और विवाद भूगोल के उपयोगी संकेत हैं: भाखड़ा-नांगल-सतलुज, हीराकुंड-महानदी, सरदार सरोवर-नर्मदा, राष्ट्रीय जलमार्ग 1 गंगा-भागीरथी-हुगली और राष्ट्रीय जलमार्ग 2 ब्रह्मपुत्र बार-बार पूछे जाने वाले युग्म हैं।
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शासन के तथ्य अलग-अलग रखें: अनुच्छेद 262, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, जल अधिनियम, 1974, आर्द्रभूमि नियम, 2017, राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 और बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 अलग काम करते हैं।
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अपवाह तंत्र की मूल समझ
भारत का अपवाह तंत्र स्थलरूप, चट्टानी संरचना, ढाल, वर्षा और मुहाने का संयुक्त परिणाम है। अपवाह द्रोणी वह क्षेत्र है जहां का जल किसी नदी और उसकी सहायक धाराओं में जाता है। जल-विभाजक वह ऊंचा भाग या रेखा है जो दो द्रोणियों को अलग करती है। जलग्रहण, बाढ़-मैदान, डेल्टा, ज्वारनदमुख, नहर कमान क्षेत्र और जलाशय जल-भूगोल से जुड़े शब्द हैं, लेकिन ये पर्याय नहीं हैं। CET में गलती अक्सर इसी तरह कराई जाती है कि द्रोणी की जगह सिंचाई कमान क्षेत्र दे दी जाती है या जलाशय को प्राकृतिक झील जैसा मान लिया जाता है।
पाठ्यक्रम में "प्रमुख नदियां, बांध, झीलें और महासागर" को अलग-अलग सूची की तरह नहीं, बल्कि जुड़े हुए तंत्र की तरह पढ़ना चाहिए। नदियां जल इकट्ठा करती हैं; बांध जल को रोकते या नियंत्रित करते हैं; झीलें और आर्द्रभूमियां प्राकृतिक या बदली हुई अवसादों में जल रखती हैं; महासागर कई नदी-तंत्रों का अंतिम मुहाना हैं और मानसून, चक्रवात, बंदरगाह, मत्स्य और तटीय आपदाओं को भी प्रभावित करते हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी इसलिए पहला उपयोगी विभाजन देते हैं, क्योंकि अनेक भारतीय नदियों को उनके मुहाने के आधार पर समूहित किया जा सकता है।
बड़ा भौतिक विभाजन हिमालयी और प्रायद्वीपीय अपवाह का है। हिमालयी नदियां सामान्यतः बारहमासी होती हैं क्योंकि उन्हें हिम-पिघलन और वर्षा दोनों से जल मिलता है। वे पर्वतों में गहरी घाटियां और मैदानों में बाढ़-मैदान, विसर्प, गोखुर झीलें और डेल्टा या वितरिकाएं बनाती हैं। प्रायद्वीपीय नदियां पुराने पठारी भागों पर बहती हैं, मानसून पर अधिक निर्भर रहती हैं और इनके मार्ग सामान्यतः अधिक स्थिर होते हैं। परीक्षा की पद्धति साफ रखें: पहले द्रोणी, मुहाना, स्थलरूप-नियंत्रण और मानवीय उपयोग पहचानें, फिर विकल्प चुनें।
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