सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन
मुख्य तथ्य
- 1828 में राजा राम मोहन रॉय ने कलकत्ता में ब्रह्म सभा शुरू की, जो आगे ब्रह्म समाज से जुड़ी और आधुनिक भारत के शुरुआती बड़े सामाजिक-धार्मिक सुधार संगठनों...
- 1829 के विनियम XVII ने लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासन में बंगाल प्रेसीडेंसी में सती को अवैध और दंडनीय घोषित किया; इसके पीछे लंबी सुधार-बहस थी।
- 1856 के हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ने विधवा पुनर्विवाह की कानूनी बाधाएँ हटाईं;
- 1875 में बॉम्बे में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की;
- 1897 में स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की; इसने वेदांत, आध्यात्मिक अनुशासन और संगठित सामाजिक सेवा को जोड़ा।
मुख्य बिंदु
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1828 में राजा राम मोहन रॉय ने कलकत्ता में ब्रह्म सभा शुरू की, जो आगे ब्रह्म समाज से जुड़ी और आधुनिक भारत के शुरुआती बड़े सामाजिक-धार्मिक सुधार संगठनों में गिनी गई।
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1829 के विनियम XVII ने लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासन में बंगाल प्रेसीडेंसी में सती को अवैध और दंडनीय घोषित किया; इसके पीछे लंबी सुधार-बहस थी।
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1856 के हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ने विधवा पुनर्विवाह की कानूनी बाधाएँ हटाईं; इस सुधार में ईश्वर चंद्र विद्यासागर का अभियान केंद्रीय माना जाता है।
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1875 में बॉम्बे में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की; इसका जोर वेद, मूर्ति-पूजा-विरोध, बाल-विवाह-विरोध, अस्पृश्यता-विरोध और जाति-सुधार पर था।
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1897 में स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की; इसने वेदांत, आध्यात्मिक अनुशासन और संगठित सामाजिक सेवा को जोड़ा।
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1875 में न्यूयॉर्क में हेलेना पी. ब्लावात्स्की और हेनरी स्टील ओल्कॉट ने थियोसोफिकल सोसाइटी बनाई; भारत में अडयार मुख्यालय इसका प्रमुख केंद्र बना।
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7 जनवरी 1877 को सर सैयद अहमद खाँ ने अलीगढ़ में मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की; 1920 के अधिनियम से यह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।
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1873 में ज्योतिराव फुले का सत्यशोधक समाज और 1927 का अम्बेडकर का महाड सत्याग्रह जाति-विरोधी सुधार को सार्वजनिक अधिकार और गरिमा के प्रश्न से जोड़ते हैं।
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पृष्ठभूमि और सुधार की दिशा
19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, मुद्रण और भारतीय समाज की आंतरिक समस्याओं के बीच उभरे। औपनिवेशिक शासन ने पुराने राजनीतिक ढांचे बदले, अंग्रेज़ी शिक्षा और नई अदालतों का विस्तार किया, और समाचार-पत्रों, पर्चों तथा अनुवादों से सार्वजनिक बहस का नया क्षेत्र बनाया। सुधारकों ने इन्हीं साधनों से धार्मिक अधिकार, महिला अधिकार, जाति-व्यवस्था, आधुनिक शिक्षा और सार्वजनिक नैतिकता पर बहस की। वे केवल पश्चिम की नकल नहीं कर रहे थे; कई सुधारकों ने तर्क, शास्त्रीय पुनर्व्याख्या और सामाजिक आलोचना को साथ रखा।
इन आंदोलनों के मुद्दे आपस में जुड़े हुए थे। धार्मिक सुधार में एकेश्वरवाद, शास्त्र, तर्क और कर्मकांड की भूमिका पर बहस हुई। सामाजिक सुधार ने सती, बाल-विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर रोक, महिला शिक्षा की कमी, अस्पृश्यता और जन्म-आधारित जाति-विशेषाधिकार को चुनौती दी। शैक्षिक सुधार ने विज्ञान, आधुनिक विषयों और भारतीय भाषाओं में पढ़ाई को बढ़ावा दिया। 1885 के बाद संगठित राष्ट्रवाद मजबूत हुआ, लेकिन उससे पहले ये सुधार आंदोलन शिक्षित सार्वजनिक जीवन तैयार कर चुके थे।
फ्रेम साफ रखें: ये सभी आंदोलन एक जैसे नहीं थे। ये आधुनिकता, औपनिवेशिक शासन और आंतरिक असमानता के प्रति क्षेत्रीय, धार्मिक, जाति-आधारित और शैक्षिक प्रतिक्रियाएँ थे। सीईटी के लिए हर आंदोलन को चार बिंदुओं से पढ़ें: संस्थापक, वर्ष, संस्था और ठोस सुधार कार्यक्रम।
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