भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम
मुख्य तथ्य
- 1857 का विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ, दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर से प्रतीकात्मक वैधता मिली और 1858 के अधिनियम से कम्पनी की सत्ता ब्रिटिश क्र...
- 1905 के बंगाल विभाजन ने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जन-संगठन को अधिक तीखा औपनिवेशिक-विरोधी रूप दिया।
- गांधी ने सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा और 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंची नमक यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति को जन-राजनीति बनाया।
- भारतीय परिषद अधिनियम 1892 से भारत शासन अधिनियम 1935 तक सुधारों ने प्रतिनिधित्व बढ़ाया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक उत्तरदायी स्वशासन नहीं दिया।
- सुभाष चंद्र बोस और INA ने युद्धकालीन दबाव बनाए रखा; 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार घोषित हुई और बाद के INA मुकदमों ने जनमत को झकझोरा...
मुख्य बिंदु
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1857 का विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ, दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर से प्रतीकात्मक वैधता मिली और 1858 के अधिनियम से कम्पनी की सत्ता ब्रिटिश क्राउन को चली गई।
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आरंभिक राष्ट्रवाद क्षेत्रीय संस्थाओं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, संवैधानिक मांगों और औपनिवेशिक शासन की आर्थिक आलोचना से विकसित हुआ।
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1905 के बंगाल विभाजन ने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जन-संगठन को अधिक तीखा औपनिवेशिक-विरोधी रूप दिया।
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गांधी ने सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा और 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंची नमक यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति को जन-राजनीति बनाया।
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भारतीय परिषद अधिनियम 1892 से भारत शासन अधिनियम 1935 तक सुधारों ने प्रतिनिधित्व बढ़ाया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक उत्तरदायी स्वशासन नहीं दिया।
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सुभाष चंद्र बोस और INA ने युद्धकालीन दबाव बनाए रखा; 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार घोषित हुई और बाद के INA मुकदमों ने जनमत को झकझोरा।
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भारत छोड़ो आंदोलन 8 अगस्त 1942 के AICC प्रस्ताव के बाद शुरू हुआ, जबकि अगस्त 1947 की स्वतंत्रता विभाजन, हिंसा, विस्थापन और रियासतों के तात्कालिक एकीकरण के साथ आई।
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राजस्थान की भूमिका में 1857 के आऊवा और कोटा, बिजोलिया-बेगूं किसान आंदोलन, भील चेतना, प्रजा मंडल संघर्ष और 30 मार्च 1949 को वृहद राजस्थान का गठन शामिल है।
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स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र-निर्माण संविधान, रियासतों के एकीकरण, भाषाई पुनर्गठन, लोकतांत्रिक संस्थाओं, योजना और विज्ञान-प्रौद्योगिकी क्षमता पर केंद्रित रहा।
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1857 का विद्रोह और क्राउन शासन की शुरुआत
CET में 1857 इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीतिक असंतोष, सैनिक रोष और जन-प्रतिरोध को एक साथ जोड़ता है। NCERT बताती है कि कम्पनी की नीतियों से राजा, किसान, जमींदार, जनजातियां और सिपाही अलग-अलग तरह से प्रभावित हुए। 1856 में अवध को कुशासन के आरोप पर ले लिया गया, सिपाही वेतन और सेवा-शर्तों से नाराज थे, और कारतूसों की अफवाह ने यह भय बढ़ा दिया कि कम्पनी धर्म में हस्तक्षेप कर रही है।
बड़ा विस्फोट 10 मई 1857 को मेरठ में हुआ। सिपाही दिल्ली पहुंचे, महल में गए और बहादुर शाह ज़फर को अपना नेता घोषित किया। यह प्रतीकात्मक कदम बहुत बड़ा था, क्योंकि इससे कई स्थानीय सरदारों और सैनिकों को मुगल वैधता के नाम पर प्रतिरोध की संभावना दिखी। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झांसी और बिहार प्रमुख केंद्र बने; NCERT नाना साहेब, बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बख्त खान और कुंवर सिंह को प्रमुख चेहरों में रखती है।
ब्रिटिश दमन तुरंत नहीं, धीरे-धीरे हुआ। दिल्ली फिर कब्जे में ली गई, मार्च 1858 में लखनऊ लिया गया, जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई मारी गईं, और तात्या टोपे अप्रैल 1859 में पकड़े और मारे जाने से पहले गुरिल्ला संघर्ष करते रहे। 1859 के अंत तक ब्रिटिश नियंत्रण लौट आया, लेकिन पुरानी तरह शासन करना संभव नहीं रहा।
सबसे बड़ा प्रशासनिक परिणाम 1858 का नया अधिनियम था, जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी की सत्ता ब्रिटिश क्राउन को सौंप दी। भारत सचिव और भारत परिषद बनी, और गवर्नर-जनरल को वायसराय की उपाधि मिली। राजस्थान के लिए तुलना याद रखें: कई रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया, फिर भी ठाकुर कुशाल सिंह का आऊवा और कोटा का विद्रोह राजपूताना को प्रतिरोध की कहानी से जोड़ते हैं।
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