मुख्य तथ्य

  • राणा कुम्भा से जुड़ा कुम्भलगढ़ मेवाड़ का प्रमुख पहाड़ी दुर्ग है; राजस्थान पर्यटन इसकी दीवार को लगभग 36 किलोमीटर लंबा बताता है।
  • 1459 में राव जोधा द्वारा जोधपुर की स्थापना मेहरानगढ़ और मारवाड़ की चट्टानी राजधानी को सबसे उपयोगी स्थल-संरक्षक जोड़ बनाती है।
  • बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग राजा राय सिंह द्वारा 1588 ई. में निर्मित प्रमुख समतल दुर्ग है, इसलिए राजस्थान के दुर्गों को केवल पहाड़ी दुर्गों तक सीमित नहीं...
  • बूंदी की रानीजी की बावड़ी 1699 में रानी नाथावती जी द्वारा निर्मित थी और जल-प्रबंधन तथा राजकीय संरक्षण का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • 1592 में राजा मान सिंह प्रथम द्वारा शुरू कराया गया आमेर और 1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बसाया गया जयपुर, दुर्ग-महल से नियोजित परकोटा-नगर तक का...

मुख्य बिंदु

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    राजस्थान के स्थापत्य प्रश्नों को आधिकारिक पाठ्यक्रम के उसी वाक्य से जोड़कर पढ़ें जिसमें दुर्ग, स्मारक, कला-रूप, चित्रकला और हस्तशिल्प आते हैं।

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    राणा कुम्भा से जुड़ा कुम्भलगढ़ मेवाड़ का प्रमुख पहाड़ी दुर्ग है; राजस्थान पर्यटन इसकी दीवार को लगभग 36 किलोमीटर लंबा बताता है।

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    1459 में राव जोधा द्वारा जोधपुर की स्थापना मेहरानगढ़ और मारवाड़ की चट्टानी राजधानी को सबसे उपयोगी स्थल-संरक्षक जोड़ बनाती है।

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    बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग राजा राय सिंह द्वारा 1588 ई. में निर्मित प्रमुख समतल दुर्ग है, इसलिए राजस्थान के दुर्गों को केवल पहाड़ी दुर्गों तक सीमित नहीं करना चाहिए।

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    बूंदी की रानीजी की बावड़ी 1699 में रानी नाथावती जी द्वारा निर्मित थी और जल-प्रबंधन तथा राजकीय संरक्षण का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

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    1592 में राजा मान सिंह प्रथम द्वारा शुरू कराया गया आमेर और 1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बसाया गया जयपुर, दुर्ग-महल से नियोजित परकोटा-नगर तक का बदलाव दिखाते हैं।

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    राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों का समूह याद रखें: चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर।

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    कला, चित्रकला और शिल्प को भित्तिचित्रों वाली हवेलियों, पत्थर की नक्काशी, दर्पण-काम, संगमरमर नक्काशी, सांगानेरी छपाई, नीली मिट्टी कला और दरबारी-मंदिर संरक्षण से जोड़कर पढ़ें।

स्थापत्य को पढ़ने का सही ढाँचा

राजस्थान की स्थापत्य परंपरा को शासक, भूगोल, सामग्री, जल, धर्म, कला और शिल्प के आपसी संबंध के रूप में पढ़ना चाहिए। स्नातक स्तर के CET में यह विषय राजस्थान के इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परंपरा और विरासत के अंतर्गत आता है। इसी खंड में स्थापत्य से जुड़े दुर्ग, स्मारक, कला-रूप, चित्रकला और हस्तशिल्प भी आते हैं। इसलिए परीक्षा में स्मारकों के नाम अलग-अलग रटने से काम नहीं चलेगा; स्थल, क्षेत्र, संरक्षक, उपयोग, सामग्री और सांस्कृतिक महत्त्व को साथ समझना होगा।

दुर्ग में केवल दीवार नहीं होती; उसके भीतर द्वार, परकोटा, महल, मंदिर, जलाशय, अनाज-भंडार, आंगन और प्रशासनिक या आबादी वाले हिस्से भी हो सकते हैं। महल दरबारी पद, प्रवेश-व्यवस्था, शिल्प-कौशल और राजनयिक रुचि दिखाता है। बावड़ी जल-संरचना, छायादार सार्वजनिक स्थान और स्थापत्य, तीनों है। मंदिर मूर्तिकला, संरक्षण, संप्रदाय, तीर्थ-मार्ग और बस्ती के इतिहास को बचाए रखता है। चित्रकला और हस्तशिल्प भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि भित्तिचित्रों वाली हवेलियाँ, दर्पण-काम, पत्थर की नक्काशी, संगमरमर नक्काशी, कपड़ा-शिल्प और मिट्टी-कला वही संरक्षण-जाल दिखाते हैं जिनसे दुर्ग और महल बने।

CET के लिए सबसे उपयोगी इकाई स्थल-संरक्षक-विशेषता का जोड़ है: चित्तौड़गढ़ और कुम्भलगढ़ को मेवाड़ और राणा कुम्भा से, मेहरानगढ़ को राव जोधा और मारवाड़ से, जूनागढ़ को बीकानेर और राजा राय सिंह से, आमेर को कछवाहा दुर्ग-महल स्थापत्य से और जयपुर को सवाई जय सिंह द्वितीय तथा नियोजित नगर-रचना से जोड़कर पढ़ें। यह तरीका बिखरी हुई रटाई से बचाता है और मिलते-जुलते नाम अलग करने में मदद करता है।

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