मुख्य तथ्य

  • 2026 सीईटी स्नातक पाठ्यक्रम में यह विषय भारत और राजस्थान के इतिहास के भीतर आता है: 1857 की क्रांति में राजस्थान का योगदान, जनजातीय और किसान आंदोलन, रा...
  • 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद राजपूताना में मुगल प्रभाव कमजोर हुआ और ब्रिटिश सर्वोच्चता के विस्तार से पहले रियासतों पर मराठा दबाव, पिंडारी असुरक्...
  • तुंगा का युद्ध जुलाई 1787 में हुआ और मराठा दबाव के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध का परीक्षोपयोगी संकेत है, पर इससे मराठा प्रभाव स्थायी रूप से समाप्त नहीं हु...
  • 1817-1818 की संधियों ने राजपूताना की प्रमुख रियासतों को ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन रखा, जबकि आंतरिक राजवंशीय शासन अप्रत्यक्ष नियंत्रण के तहत सीमित रूप...
  • 1857 में राजस्थान का योगदान नसीराबाद, नीमच, आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह और कोटा के जयदयाल तथा मेहराब खान से विशेष रूप से याद किया जाता है।

मुख्य बिंदु

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    2026 सीईटी स्नातक पाठ्यक्रम में यह विषय भारत और राजस्थान के इतिहास के भीतर आता है: 1857 की क्रांति में राजस्थान का योगदान, जनजातीय और किसान आंदोलन, राजनीतिक जागरण, प्रजा मंडल आंदोलन और राजस्थान का एकीकरण।

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    1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद राजपूताना में मुगल प्रभाव कमजोर हुआ और ब्रिटिश सर्वोच्चता के विस्तार से पहले रियासतों पर मराठा दबाव, पिंडारी असुरक्षा तथा राजस्व संकट बढ़े।

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    तुंगा का युद्ध जुलाई 1787 में हुआ और मराठा दबाव के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध का परीक्षोपयोगी संकेत है, पर इससे मराठा प्रभाव स्थायी रूप से समाप्त नहीं हुआ।

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    1817-1818 की संधियों ने राजपूताना की प्रमुख रियासतों को ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन रखा, जबकि आंतरिक राजवंशीय शासन अप्रत्यक्ष नियंत्रण के तहत सीमित रूप में चलता रहा।

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    1857 में राजस्थान का योगदान नसीराबाद, नीमच, आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह और कोटा के जयदयाल तथा मेहराब खान से विशेष रूप से याद किया जाता है।

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    बिजोलिया, बेगूं, गोविंद गुरु का भगत आंदोलन, मानगढ़ और मोतीलाल तेजावत का एकी आंदोलन जैसे किसान-जनजातीय संघर्ष स्थानीय शिकायतों को व्यापक राजनीतिक जागरण से जोड़ते हैं।

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    प्रजा मंडलों ने रियासतों के भीतर सामंती मनमानी, नागरिक अधिकार और उत्तरदायी शासन की मांग को संगठित राजनीति में बदला।

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    राजस्थान का एकीकरण 17 मार्च 1948 के मत्स्य संघ से 1 नवंबर 1956 के पुनर्गठित राजस्थान तक सात चरणों में पूरा हुआ।

ब्रिटिश सर्वोच्चता से पहले राजपूताना

आधुनिक राजस्थान की राजनीतिक पृष्ठभूमि 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता के कमजोर होने से शुरू होती है। जयपुर, मारवाड़, मेवाड़, कोटा, बूंदी और अन्य राजपूत रियासतों में राजवंश, किले और दरबारी परंपराएं बनी रहीं, लेकिन पुराना साम्राज्यिक संतुलन टूट चुका था। इससे उत्तराधिकार विवाद, राजस्व-वसूली और स्थानीय सुरक्षा अधिक अस्थिर होने लगी। सिंधिया और होल्कर जैसे मराठा घराने चौथ, सैन्य दबाव और रियासतों के भीतर राजनीतिक सौदेबाजी के माध्यम से राजपूताना में प्रभाव बढ़ाने लगे। बाद में पिंडारी हमलों ने गांवों और व्यापारिक रास्तों की असुरक्षा और बढ़ा दी।

जुलाई 1787 का तुंगा युद्ध इस दौर को समझने का उपयोगी संकेत है। जयपुर और मारवाड़ ने लालसोट-दौसा क्षेत्र के पास महादजी सिंधिया के मराठा दबाव का संयुक्त प्रतिरोध किया। इसे मराठा प्रभाव के स्थायी अंत की तरह नहीं पढ़ना चाहिए; बाद की राजनीति और सैन्य घटनाओं ने संतुलन फिर बदला। इसका परीक्षोपयोगी महत्व यह है कि जब बड़ी राजपूत रियासतों ने तालमेल किया तो प्रतिरोध संभव था।

उन्नीसवीं सदी के आरंभ तक कई शासक मराठा-पिंडारी संकट से सुरक्षा चाहते थे, पर यह सुरक्षा राजनीतिक कीमत के साथ आई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसी असुरक्षा का उपयोग संधि-व्यवस्था बनाने में किया। इसलिए राजपूताना मुगल पतन से मराठा दबाव और फिर ब्रिटिश निगरानी वाली रियासती राजनीति की ओर बढ़ा। यही पृष्ठभूमि समझाती है कि स्वतंत्रता के समय राजस्थान एक ब्रिटिश प्रांत नहीं, बल्कि अनेक रियासतों और कुछ ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों का समूह था।

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