प्रमुख राजवंश, प्रतापी शासक और उनकी उपलब्धियाँ
मुख्य तथ्य
- नागभट्ट प्रथम और गुर्जर-प्रतिहार 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद उभरे, जिससे पश्चिमी राजस्थान उत्तर भारत के बड़े सीमांत क्षेत्र का हिस्सा बना।
- मिहिर भोज ने लगभग 836-885 के शासनकाल में कन्नौज को प्रतिहार शक्ति का केंद्र बनाया और आदिवराह मुद्राओं से राजसत्ता को वैष्णव प्रतीक से जोड़ा।
- बप्पा रावल की 8वीं शताब्दी की मेवाड़-स्मृति गुहिल परंपरा का आरंभिक आधार है, जबकि हम्मीर सिंह ने 14वीं शताब्दी में चित्तौड़ की पुनर्प्राप्ति से सिसोदिय...
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 की हार ने अजमेर-दिल्ली की चौहान शक्ति को निर्णायक झटका दिया।
- रावल जैसल ने 1156 में त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर बसाया और भाटी मरु-राज्य को व्यापार, मंदिरों और सीमांत राजनीति का दुर्गीय केंद्र बनाया।
मुख्य बिंदु
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नागभट्ट प्रथम और गुर्जर-प्रतिहार 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद उभरे, जिससे पश्चिमी राजस्थान उत्तर भारत के बड़े सीमांत क्षेत्र का हिस्सा बना।
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मिहिर भोज ने लगभग 836-885 के शासनकाल में कन्नौज को प्रतिहार शक्ति का केंद्र बनाया और आदिवराह मुद्राओं से राजसत्ता को वैष्णव प्रतीक से जोड़ा।
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बप्पा रावल की 8वीं शताब्दी की मेवाड़-स्मृति गुहिल परंपरा का आरंभिक आधार है, जबकि हम्मीर सिंह ने 14वीं शताब्दी में चित्तौड़ की पुनर्प्राप्ति से सिसोदिया शक्ति को टिकाऊ बनाया।
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पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 की हार ने अजमेर-दिल्ली की चौहान शक्ति को निर्णायक झटका दिया।
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रावल जैसल ने 1156 में त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर बसाया और भाटी मरु-राज्य को व्यापार, मंदिरों और सीमांत राजनीति का दुर्गीय केंद्र बनाया।
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राणा कुम्भा ने 1433-1468 के शासनकाल में कुम्भलगढ़, चित्तौड़ के विजय स्तम्भ, मंदिर-संरक्षण और संगीत-विद्या से मेवाड़ को सैन्य-सांस्कृतिक शिखर दिया।
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राव जोधा ने 1459 में जोधपुर और मेहरानगढ़ की स्थापना कर मारवाड़ की राजधानी को मंडोर से अधिक सुरक्षित पहाड़ी आधार पर स्थानांतरित किया।
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सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1727 में जयपुर बसाया और जंतर मंतर वेधशालाओं से कछवाहा राज्य-निर्माण को नियोजित नगर और खगोल-विद्या से जोड़ा।
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CET के लिए राजवंशों को प्रशासन और राजस्व-व्यवस्था सहित पढ़ना चाहिए: दुर्ग, जल-संरचना, जागीर-सामंत संबंध, कर-दावे, व्यापारिक मार्ग और बाद का संधि-नियंत्रण, सभी ने शक्ति को आकार दिया।
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प्रारंभिक पृष्ठभूमि: प्रतिहार और राजपूताना का आधार
प्रारंभिक मध्यकालीन राजस्थान को समझने के लिए गुर्जर-प्रतिहारों से शुरुआत उपयोगी है। 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद पश्चिमी भारत में सीमांत सुरक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण हुआ, और प्रतिहार शक्ति इसी पृष्ठभूमि में उभरी। नागभट्ट प्रथम को बाद की परंपरा अरब दबाव के प्रतिरोध से जोड़ती है। प्रतिहारों का प्रभाव केवल एक दरबार तक सीमित नहीं था; राजस्थान, मालवा और कन्नौज के बीच चलने वाले मार्ग, सैन्य कुलीन और मंदिर-केंद्र इस शक्ति-संसार का हिस्सा बने। वत्सराज और नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज के लिए पाल और राष्ट्रकूट शक्तियों से संघर्ष किया, जिससे उत्तर भारत की त्रिपक्षीय राजनीति बनी।
मिहिर भोज के समय प्रतिहार प्रतिष्ठा सबसे मजबूत दिखाई देती है। उनका काल सामान्यतः लगभग 836-885 माना जाता है। कन्नौज उनकी साम्राज्यिक प्रतिष्ठा का केंद्र बना और उनकी आदिवराह मुद्राएँ राजसत्ता, वैष्णव प्रतीक और आर्थिक विनिमय को साथ दिखाती हैं। राजस्थान में ओसियां के मंदिर, आभानेरी का हर्षत माता मंदिर और प्रतिहार-कालीन स्थापत्य वातावरण इस सांस्कृतिक विस्तार की याद दिलाते हैं। 10वीं शताब्दी के बाद प्रतिहार शक्ति कमजोर हुई, पर शाकम्भरी के चौहान, मेवाड़ के गुहिल, मालवा के परमार और अन्य घराने उसी राजनीतिक धरातल से आगे बढ़े।
सार यह है कि प्रतिहारों ने राजस्थान को सीमांत प्रदेश से उत्तर भारतीय शक्ति-राजनीति के सक्रिय क्षेत्र में बदला।
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