मुख्य तथ्य

  • 1956 में बेंजामिन ब्लूम और उनके सहयोगियों ने शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण प्रकाशित किया;
  • 1968 में बी. एफ. स्किनर की पुस्तक द टेक्नोलॉजी ऑफ टीचिंग ने ड्रिल, ट्यूटोरियल और कंप्यूटर-सहायित शिक्षण में प्रोग्राम्ड अधिगम तथा त्वरित प्रतिपुष्टि क...
  • 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने कार्य-अनुभव, विज्ञान-शिक्षा और शैक्षिक प्रौद्योगिकी पर जोर दिया, जिससे व्यावहारिक और तकनीक-समर्थित अधिगम को नीतिगत आध...
  • 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा ने निर्माणवादी, विद्यार्थी-केंद्रित कक्षा को महत्व दिया, जहां विद्यार्थी गतिविधि, चर्चा और चिंतन से समझ बनाते हैं...
  • 2009 के शिक्षा का अधिकार अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए बाल-अनुकूल और समावेशी प्रारंभिक शिक्षा को कानूनी दायित्व बनाया।

मुख्य बिंदु

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    1956 में बेंजामिन ब्लूम और उनके सहयोगियों ने शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण प्रकाशित किया; उसके संज्ञानात्मक स्तर मापनीय अधिगम-उद्देश्य बनाने में आज भी महत्वपूर्ण हैं।

  2. 2

    1968 में बी. एफ. स्किनर की पुस्तक द टेक्नोलॉजी ऑफ टीचिंग ने ड्रिल, ट्यूटोरियल और कंप्यूटर-सहायित शिक्षण में प्रोग्राम्ड अधिगम तथा त्वरित प्रतिपुष्टि की परंपरा को मजबूत किया।

  3. 3

    1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने कार्य-अनुभव, विज्ञान-शिक्षा और शैक्षिक प्रौद्योगिकी पर जोर दिया, जिससे व्यावहारिक और तकनीक-समर्थित अधिगम को नीतिगत आधार मिला।

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    2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा ने निर्माणवादी, विद्यार्थी-केंद्रित कक्षा को महत्व दिया, जहां विद्यार्थी गतिविधि, चर्चा और चिंतन से समझ बनाते हैं।

  5. 5

    2009 के शिक्षा का अधिकार अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए बाल-अनुकूल और समावेशी प्रारंभिक शिक्षा को कानूनी दायित्व बनाया।

  6. 6

    2012 की विद्यालयी शिक्षा में आईसीटी पर राष्ट्रीय नीति ने डिजिटल संसाधन, कनेक्टिविटी और शिक्षक-क्षमता निर्माण के उपयोग की रूपरेखा दी।

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    2017 में DIKSHA शिक्षक और विद्यार्थी के लिए राष्ट्रीय डिजिटल अवसंरचना के रूप में शुरू हुआ, और बाद में ई-सामग्री तथा क्यूआर-लिंक्ड अधिगम सामग्री का प्रमुख स्रोत बना।

  8. 8

    2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने विद्यालयी शिक्षा में क्षमता-आधारित अधिगम, निर्माणात्मक मूल्यांकन, डिजिटल साक्षरता और शिक्षक व्यावसायिक विकास पर जोर दिया।

शिक्षण-शास्त्र का अर्थ क्या है और शिक्षक की भूमिका क्या होती है?

शिक्षण-शास्त्र का अर्थ सीखने की पूरी प्रक्रिया को समझना है, और शिक्षक की भूमिका विद्यार्थी के लिए समझ, अभ्यास, अनुशासन और समस्या-समाधान की सही सीखने की स्थिति बनाना है। शिक्षण-शास्त्र केवल पढ़ाने की तकनीक नहीं है; यह इस बात का अध्ययन है कि विद्यार्थी कैसे सीखता है, शिक्षक सीखने की स्थिति कैसे बनाता है और पाठ्य-वस्तु को किस क्रम में रखा जाए। कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर के लिए यह बात खास है, क्योंकि कंप्यूटर विषय में परिभाषा, प्रक्रिया, डिवाइस, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क, सुरक्षा और प्रयोगात्मक कौशल साथ-साथ आते हैं। अच्छा शिक्षक केवल सूचना नहीं देता, बल्कि विद्यार्थी को समझ, अभ्यास और समस्या-समाधान की ओर ले जाता है। यू-डाइस प्लस 2024-25 के अनुसार भारत की विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में 1.01 करोड़ से अधिक शिक्षक दर्ज थे, इसलिए शिक्षक की भूमिका को केवल पाठ पढ़ाने तक सीमित मानना व्यावहारिक नहीं है।

शिक्षक की भूमिका व्याख्याता, मार्गदर्शक, निदेशक, मूल्यांकनकर्ता और प्रेरक की होती है। कक्षा में वह उद्देश्यों को स्पष्ट करता है, पूर्व-ज्ञान पहचानता है, उदाहरण देता है, अभ्यास करवाता है और गलतियों को सुधारने का अवसर देता है। कंप्यूटर-शिक्षण में शिक्षक को बोर्ड, प्रोजेक्टर, मॉनिटर, कीबोर्ड, प्रिंटर, नेटवर्क और इंटरनेट संसाधनों का उपयोग इस तरह करना चाहिए कि विद्यार्थी केवल सुनें नहीं, बल्कि करके सीखें।

सार यही है: प्रभावी शिक्षण में विषय-ज्ञान, विद्यार्थी-समझ और उपयुक्त विधि तीनों साथ चलते हैं।

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