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REET लेवल 2 अध्ययन सामग्री

संस्कृत में उपसर्ग एवं प्रत्यय

शास्त्रीय व्याकरण बाईस उपसर्ग गिनता है (प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप)।

मुख्य बिंदु

  • शास्त्रीय व्याकरण बाईस उपसर्ग गिनता है (प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप)।
  • धातु से पूर्व उपसर्ग उसके अर्थ को बलपूर्वक मोड़ता है — सूत्र "उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते"।
  • एक धातु, अनेक शब्द: हृ से आहृ (लाना), विहृ (विहार), संहृ (समेटना), प्रहृ (प्रहार)।
  • कृत् प्रत्यय धातु से जुड़ते हैं: क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, शतृ, शानच्, क्त, क्तवतु, तव्यत्, अनीयर्, ण्वुल्, तृच्।
  • तद्धित प्रत्यय प्रातिपदिक से जुड़ते हैं: मतुप्, इन्, त्व, तल्, ष्यञ्, अण्, ठक्।
  • स्त्री-प्रत्यय स्त्रीलिंग बनाते हैं: टाप् से दीर्घ आ (अजा), ङीप् से दीर्घ ई (गौरी)।
  • उपसर्ग रहने पर क्त्वा ल्यप् बन जाता है — कृत्वा पर आकृत्य, आगम्त्वा नहीं।
  • आम फंदे: शाब्दिक विभाजन, उपसर्ग-अव्यय, कृत्-तद्धित अंत-भ्रम, क्त्वा-ल्यप्, टाप्-ङीप् अदला-बदली।
  • कक्षा 6 से 8 में उपसर्ग-चक्र, विभाजन-कार्ड, व्युत्पत्ति-सीढ़ी और अर्थ-नाट्य से पढ़ाएँ।
  • वायगोत्स्की अवलंबन, पियाजे मूर्त-संक्रियात्मक चरण, ब्रूनर सक्रिय-प्रतिमात्मक-प्रतीकात्मक और क्रैशन बोधगम्य निवेश इस शिक्षण को ढाँचा देते हैं।

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पाठ्यक्रम सीमा

राजस्थान बोर्ड के रीट भाषा संस्कृत (वैकल्पिक) पाठ्यक्रम में यह विषय एक संक्षिप्त किंतु अति-उपयोगी पंक्ति में रखा गया है: उपसर्ग, कृत् प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय। इसलिए सीमा तीन परस्पर जुड़ी व्यवस्थाएँ हैं, संपूर्ण शब्द-रचना नहीं। पहली, उपसर्ग-समूह: बाईस अव्यय (प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप) जो धातु से ठीक पहले जुड़कर उसके अर्थ को बदलते, बढ़ाते, उलटते या...

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