मुख्य तथ्य

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस) ने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) को प्रतिस्थापित किया।
  • शून्य FIR अब BNSS धारा 173(3) के तहत अनिवार्य है: पुलिस को क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना FIR दर्ज करनी होगी;
  • इलेक्ट्रॉनिक FIR: BNSS धारा 173(1) के तहत कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराधों के लिए ऑनलाइन FIR दर्ज कर सकता है;
  • विचारण समय-सीमा: BNSS अनिवार्य समय-सीमाएँ लाता है
  • जमानत प्रावधान: BNSS धारा 479 के तहत विचाराधीन कैदियों के लिए अधिकार के रूप में जमानत

मुख्य बिंदु

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    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस) ने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) को प्रतिस्थापित किया। इसमें 531 धाराएँ हैं, जबकि सीआरपीसी में 484 धाराएँ थीं। भारतीय न्याय संहिता के विपरीत, जो मुख्यतः समेकन थी, बीएनएसएस ने नए प्रावधान जोड़कर प्रक्रियात्मक कानून को सचमुच विस्तारित किया।

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    शून्य FIR अब BNSS धारा 173(3) के तहत अनिवार्य है: पुलिस को क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना FIR दर्ज करनी होगी; फिर इसे 15 दिन के भीतर क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाने को स्थानांतरित — यह निर्भया मामले के बाद सर्वोच्च न्यायालय निर्देश था, जो अब विशेष रूप से धारा 173(3) में संहिताबद्ध (धारा 173(1) सामान्य FIR प्रावधान है)।

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    इलेक्ट्रॉनिक FIR: BNSS धारा 173(1) के तहत कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराधों के लिए ऑनलाइन FIR दर्ज कर सकता है; प्राप्त अधिकारी इसे पढ़कर सुनाएगा, सूचनाकर्ता की हस्ताक्षर/इलेक्ट्रॉनिक पुष्टि लेगा और तत्काल पंजीकृत करेगा।

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    विचारण समय-सीमा: BNSS अनिवार्य समय-सीमाएँ लाता है — गंभीर अपराधों में गिरफ्तारी से 60 दिन के भीतर आरोप-पत्र; आरोप-पत्र के 60 दिन में आरोप; सत्र विचारण संज्ञान के 3 वर्ष में समाप्त, अधिकतम 2 विस्तार।

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    जमानत प्रावधान: BNSS धारा 479 के तहत विचाराधीन कैदियों के लिए अधिकार के रूप में जमानत — अधिकतम सजा का आधा (मृत्युदंड/आजीवन कारावास छोड़) भुगत चुके विचाराधीन कैदी को जमानत का अधिकार, विवेक नहीं।

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    अनुपस्थिति में विचारण: BNSS में जानबूझकर गिरफ्तारी से बचने और अनुपस्थित रहने पर विचारण जारी रखने के प्रावधान — धारा 356: भगोड़ा घोषित; 90 दिन बाद अनुपस्थिति में विचारण; अनुपस्थिति में दोषसिद्धि वैध।

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    फोरेंसिक जाँच: BNSS धारा 176 7+ वर्ष कारावास वाले अपराधों के लिए अपराध स्थल की फोरेंसिक जाँच अनिवार्य बनाती है — फोरेंसिक विशेषज्ञ का दौरा, साक्ष्य संग्रह; अपराध स्थल का ऑडियो-विजुअल दस्तावेजीकरण अब कानूनी आवश्यकता।

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    पीड़ित अधिकार: BNSS पीड़ित अधिकारों का उल्लेखनीय विस्तार करता है — धारा 193(3): पीड़ित को जाँच प्रगति की जानकारी; धारा 230: आरोपी की रिहाई से पहले पीड़ित को सुने जाने का अधिकार; बलात्कार/यौन उत्पीड़न पीड़िता को धारा 397 के तहत निःशुल्क चिकित्सा उपचार का अधिकार।

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    हथकड़ी प्रावधान: BNSS धारा 43(3) के तहत हथकड़ी अब स्पष्ट रूप से विनियमित — केवल आदतन अपराधियों, जघन्य अपराध के आरोपियों, या भागने की विशेष संभावना पर अनुमति; नियमित हथकड़ी प्रतिबंधित।

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    धारा 185 के तहत तलाशी की कार्यवाही को मोबाइल/इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करना होगा; यह रिकॉर्डिंग पंचनामे और आरोप-पत्र के साथ होनी चाहिए — ताकि साक्ष्य से छेड़छाड़ रुके और जवाबदेही तय हो।

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    नार्को-विश्लेषण/पॉलीग्राफ: BNSS स्पष्ट रूप से नार्को-विश्लेषण को अनिवार्य नहीं करता लेकिन सभी फोरेंसिक तकनीकों के लिए न्यायिक अनुमोदन आवश्यक; सर्वोच्च न्यायालय ने सेल्वी बनाम कर्नाटक (2010) में जबरन नार्को/पॉलीग्राफ असंवैधानिक माना।

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    दया याचिका समय-सीमा: BNSS धारा 472 के तहत मृत्युदंड प्राप्त दोषियों को उच्च न्यायालय (या उच्चतम न्यायालय) द्वारा मृत्युदंड की पुष्टि के 30 दिन के भीतर दया याचिका दाखिल करनी होगी; अनिश्चित देरी रोकने के लिए।

दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ को क्यों बदला गया?

दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ को इसलिए बदला गया क्योंकि पचास वर्ष पुराने प्रक्रियात्मक ढाँचे में देरी, कमजोर वैज्ञानिक जाँच, इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया की कमी, विचाराधीन कैदियों की समस्या और पीड़ित-अधिकारों की उपेक्षा जैसी व्यावहारिक कमियाँ जमा हो गई थीं। गृह मंत्रालय के राज्यसभा उत्तर में राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के जेल आँकड़ों के आधार पर बताया गया कि ३१ दिसंबर २०२२ को देश की जेलों में कुल ५,७३,२२० कैदी थे, जिनमें ४,३४,३०२ विचाराधीन कैदी थे; यही संख्या जमानत और समयबद्ध विचारण सुधारों की पृष्ठभूमि समझाती है।

१.१ दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की विरासत

दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ स्वयं ने दंड प्रक्रिया संहिता १८९८ को प्रतिस्थापित किया था। वह स्वतंत्र भारत के लिए बड़ा सुधार था, पर पाँच दशकों में कई संरचनात्मक समस्याएँ सामने आईं।

  • जाँच और मुकदमे के लिए हर चरण पर स्पष्ट समय-सीमा नहीं थी, इसलिए भारतीय न्यायालयों में लगभग ४–५ करोड़ लंबित मामलों की समस्या बनी रही।
  • फोरेंसिक जाँच अनिवार्य नहीं थी; अपराध स्थल के उंगलियों के निशान, डीएनए, बैलिस्टिक और डिजिटल साक्ष्य कई बार अधूरे रह जाते थे।
  • इलेक्ट्रॉनिक प्रथम सूचना रिपोर्ट का स्पष्ट प्रावधान नहीं था; शिकायत पुराने लिखित या मौखिक ढाँचे में फँसी रहती थी।
  • छोटे अपराधों में भी विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेल में रह सकते थे, क्योंकि जमानत और जेल अधीक्षक की सक्रिय भूमिका उतनी स्पष्ट नहीं थी।
  • पीड़ित को गवाह जैसा माना जाता था; जाँच-प्रगति, क्षतिपूर्ति, चिकित्सा सहायता और अभियोजन वापसी में उसकी आवाज सीमित थी।
  • फरार आरोपी कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक रोक सकता था।
  • हथकड़ी पर स्पष्ट वैधानिक सीमाएँ कमजोर थीं, जिससे गरिमा और मनमानी गिरफ्तारी के प्रश्न उठते थे।

१.२ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता २०२३ एक आधुनिकीकरण के रूप में

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता २०२३ आपराधिक प्रक्रिया को अधिक नागरिक-केंद्रित, समयबद्ध, दर्ज, वैज्ञानिक और उत्तरदायी बनाने का प्रयास करती है।

  • गति: जाँच, आरोप-निर्माण, निर्णय और पीड़ित-सूचना पर समय-सीमा।
  • प्रौद्योगिकी: इलेक्ट्रॉनिक सूचना, इलेक्ट्रॉनिक समन, वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग और दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग।
  • जवाबदेही: तलाशी, जब्ती और अपराध-स्थल रिकॉर्डिंग।
  • अधिकार: गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार, पीड़ित की सुनवाई, निःशुल्क उपचार और जमानत सुधार।
  • सम्पूर्णता: फरार आरोपी से मुकदमा न रुके, इसके लिए अनुपस्थिति में विचारण।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 5M भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 क्या है? CrPC की तुलना में इसके प्रमुख सुधार क्या हैं? 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

BNSS 2023 ने 1 जुलाई 2024 से CrPC 1973 को प्रतिस्थापित किया; 531 धाराएँ (CrPC में 484)। प्रमुख सुधार: (1) ई-FIR — ऑनलाइन FIR; (2) शून्य FIR संहिताबद्ध (धा.173); (3) 7+ वर्ष अपराधों में फोरेंसिक अनिवार्य (धा.176); (4) 90 दिन भगोड़े पर अनुपस्थिति में विचारण (धा.356); (5) आधी सजा भुगत चुके विचाराधीन को जमानत का अधिकार (धा.479); (6) अनिवार्य समय-सीमाएँ — 60 दिन में आरोप-पत्र, 45 दिन में निर्णय।

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