भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) — परिभाषाएँ एवं प्रमुख धाराएँ
मुख्य तथ्य
- भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) को 25 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई, भारतीय दंड संहिता 1860 (IPC) को प्र…
- BNS में 358 धाराएँ हैं (IPC में 511 थीं); यह कमी पुनर्गठन एवं एकीकरण के कारण है, न कि अपराधमुक्ति के;
- हत्या जो IPC धारा 302 थी, अब BNS धारा 103 है; परिभाषा अपरिवर्तित — "आपराधिक मानव-वध जो हत्या के बराबर हो"
- बलात्कार जो IPC धारा 375/376 था, अब BNS धारा 63/64 है; नई वृद्धि: 18 वर्ष से कम की महिला से सामूहिक बलात्कार (BNS धारा 70) पर मृत्युदंड या आजीवन काराव…
- संगठित अपराध एक नई स्वतंत्र धारा BNS 111 के तहत अपराध है
मुख्य बिंदु
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भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) को 25 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई, भारतीय दंड संहिता 1860 (IPC) को प्रतिस्थापित करते हुए 164 वर्षों के औपनिवेशिक आपराधिक कानून का अंत हुआ।
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BNS में 358 धाराएँ हैं (IPC में 511 थीं); यह कमी पुनर्गठन एवं एकीकरण के कारण है, न कि अपराधमुक्ति के; BNS ने 21 नए अपराध जोड़े और कुछ पुराने प्रावधान हटाए।
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हत्या जो IPC धारा 302 थी, अब BNS धारा 103 है; परिभाषा अपरिवर्तित — "आपराधिक मानव-वध जो हत्या के बराबर हो" — केवल धारा संख्या बदली है; दंड: मृत्युदंड या आजीवन कारावास साथ जुर्माना।
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बलात्कार जो IPC धारा 375/376 था, अब BNS धारा 63/64 है; नई वृद्धि: 18 वर्ष से कम की महिला से सामूहिक बलात्कार (BNS धारा 70) पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास; वैवाहिक बलात्कार अपवाद BNS धारा 63 अपवाद 2 में आयु 18 वर्ष से अधिक की गई (IPC में 15 वर्ष था — यह सुधार था, केवल यथावत रखना नहीं; विवादास्पद बना हुआ)।
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संगठित अपराध एक नई स्वतंत्र धारा BNS 111 के तहत अपराध है — पहले IPC में कोई समकक्ष नहीं था (केवल राज्य MCOCA/UAPA ही संगठित अपराध से निपटता था); यह किसी गिरोह या संगठित आपराधिक समूह द्वारा व्यवस्थित तरीके से किए अपराधों को कवर करता है।
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आतंकवाद अपराध अब BNS धारा 113 में शामिल हैं (UAPA प्रावधान समेकित); पहले IPC में आतंकवाद की कोई धारा नहीं थी; अब BNS भारत की एकता और संप्रभुता को खतरे में डालने वाले कार्यों को सीधे आपराधिक कानून से जोड़ता है।
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हिट-एंड-रन BNS धारा 106(2) के तहत नया प्रावधान — मृत्यु कारित करके भागने वाले चालक को 10 वर्ष कारावास; धारा 106(1) (लापरवाह वाहन चालन से मृत्यु) IPC धारा 304A थी — इस प्रावधान ने जनवरी 2024 में देशव्यापी ट्रक-चालक हड़ताल कराई।
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राजद्रोह — IPC धारा 124A (देशद्रोह) BNS में बनाए नहीं रखी गई; इसे BNS धारा 152 से प्रतिस्थापित किया जो "भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले" कार्यों को अपराध मानती है — औपनिवेशिक राजद्रोह शब्द हटाया, व्यापक अर्थ बना रहा।
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BNS धारा 111(3) के तहत, संगठित अपराध जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हो, मृत्युदंड या आजीवन कारावास — IPC से बड़ा उन्नयन; यह कई राज्यों में काम करने वाले संगठित आपराधिक गिरोहों को लक्षित करता है।
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सामुदायिक सेवा भारतीय आपराधिक कानून में पहली बार BNS धाराओं 4 एवं 23 के तहत दंड के रूप में शामिल — छोटे अपराधों के लिए; यह छोटे अपराधों के लिए अल्पकालिक कारावास को सामाजिक रूप से उत्पादक विकल्पों से प्रतिस्थापित करता है।
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डकैती जो IPC धारा 391 थी, अब BNS धारा 310 है; परिभाषा अपरिवर्तित — पाँच या अधिक व्यक्तियों द्वारा लूट; दंड: कठोर कारावास दस वर्ष तक एवं जुर्माना। लूट IPC 390, अब BNS धारा 309।
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लघु संगठित अपराध BNS धारा 112 एक नया अपराध है जो मोबाइल चोरी, चेन स्नैचिंग, और संगठित जेबकतरी को लक्षित करता है — पहले साधारण चोरी/लूट माना जाता था; अब संगठित गिरोह द्वारा किए जाने पर बढ़ी सजा और जमानत प्रतिबंध।
आपराधिक कानून सुधार की जरूरत क्यों पड़ी?
भारतीय आपराधिक कानून सुधार की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि १८६० की भारतीय दंड संहिता औपनिवेशिक शासन, पुरानी भाषा और आधुनिक अपराधों की नई प्रकृति के बीच फँसी हुई थी। गृह मंत्रालय के इंडिया कोड के अनुसार भारतीय न्याय संहिता २०२३ का अधिनियमन २५ दिसंबर २०२३ को हुआ।
१.१ औपनिवेशिक विरासत और सुधार की आवश्यकता
भारतीय दंड संहिता १८६० को लॉर्ड मैकॉले के प्रथम विधि आयोग (१८३४–३७) ने तैयार किया था और १८६० में ब्रिटिश भारतीय विधानमंडल ने अधिनियमित किया। अपने समय में यह महत्त्वपूर्ण संहिताकरण था, पर इसमें औपनिवेशिक पूर्वाग्रह स्पष्ट दिखते थे:
- संप्रभुता-रक्षक अपराध (राजद्रोह — धारा १२४ए, सरकारी प्राधिकार का अपमान) भारतीय असहमति को दबाने के लिए बनाए गए थे
- भाषा विक्टोरियाई अंग्रेज़ी में थी, इसलिए सामान्य नागरिकों के लिए दुर्बोध रही
- समुदाय-आधारित दंड का अभाव था — केवल कारावास या जुर्माना
- संगठित अपराध या आतंकवाद के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं था
- महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के प्रावधान अपर्याप्त थे (बलात्कार: धारा ३७५ में वैवाहिक बलात्कार को अपवाद, पीछा करने का स्वतंत्र अपराध बाद के संशोधनों से आया)
- साइबर-सक्षम अपराधों के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं था
१.२ संसदीय समिति प्रक्रिया
गृह मंत्रालय ने २०२० में दिल्ली पुलिस के पूर्व महानिदेशक की अध्यक्षता में तीनों औपनिवेशिक आपराधिक कानूनों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की:
१. भारतीय दंड संहिता १८६० → भारतीय न्याय संहिता २०२३ द्वारा प्रतिस्थापित
२. दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ → भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता २०२३ द्वारा प्रतिस्थापित (विषय १३८)
३. भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ → भारतीय साक्ष्य अधिनियम २०२३ द्वारा प्रतिस्थापित
तीनों विधेयक अगस्त २०२३ में संसद में प्रस्तुत हुए। उन्हें गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया, सिफारिशों के आधार पर संशोधित किया गया और दिसंबर २०२३ में पारित किया गया।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M भारतीय न्याय संहिता 2023 क्या है? यह IPC 1860 से कैसे भिन्न है?
आदर्श उत्तर
भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) ने 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता 1860 को प्रतिस्थापित किया — 164 वर्षों के औपनिवेशिक आपराधिक कानून का अंत। प्रमुख अंतर: BNS में 358 धाराएँ (IPC में 511); 21 नए अपराध — संगठित अपराध (धा.111), आतंकवाद (धा.113), हिट-एंड-रन (धा.106(2)); सामुदायिक सेवा नई सजा; औपनिवेशिक "राजद्रोह" शब्द हटाया; सभी प्रमुख अपराधों की धारा संख्या बदली।
~50 शब्द • 5 अंक
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