माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 (धाराएँ 1–25)
मुख्य तथ्य
- MWPSC अधिनियम 2007 को बुजुर्गों को बच्चों और रिश्तेदारों से भरण-पोषण दिलाने के लिए सरल, त्वरित और सस्ती कानूनी व्यवस्था देने के लिए बनाया गया;
- "वरिष्ठ नागरिक" (धारा 2(h)) भारत का कोई नागरिक जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक है;
- "बच्चे" (धारा 2(a)) में पुत्र, पुत्री, पोता, पोती शामिल हैं
- "संबंधी" (धारा 2(g)) वरिष्ठ नागरिक का कोई भी कानूनी उत्तराधिकारी जो बच्चा नहीं है परंतु उसकी संपत्ति पाएगा
- भरण-पोषण न्यायाधिकरण (धारा 7) — उपखंड मजिस्ट्रेट स्तर पर; आवेदन प्राप्ति के 90 दिनों में (30 दिन और बढ़ाई जा सकती है) आदेश पारित करना अनिवार्य।
मुख्य बिंदु
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MWPSC अधिनियम 2007 को बुजुर्गों को बच्चों और रिश्तेदारों से भरण-पोषण दिलाने के लिए सरल, त्वरित और सस्ती कानूनी व्यवस्था देने के लिए बनाया गया; 29 दिसंबर 2007 को राष्ट्रपति की स्वीकृति।
- 2
"वरिष्ठ नागरिक" (धारा 2(h)) भारत का कोई नागरिक जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक है; "माता-पिता" (धारा 2(d)) में जैविक, दत्तक, या सौतेले माता-पिता शामिल हैं।
- 3
"बच्चे" (धारा 2(a)) में पुत्र, पुत्री, पोता, पोती शामिल हैं — प्रमुख दायित्व वयस्क बच्चों का; बच्चों की अनुपस्थिति/असमर्थता में पोते-पोतियाँ उत्तरदायी।
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"संबंधी" (धारा 2(g)) वरिष्ठ नागरिक का कोई भी कानूनी उत्तराधिकारी जो बच्चा नहीं है परंतु उसकी संपत्ति पाएगा — संपत्ति के अपेक्षित उत्तराधिकारियों पर भरण-पोषण का दायित्व।
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भरण-पोषण न्यायाधिकरण (धारा 7) — उपखंड मजिस्ट्रेट स्तर पर; आवेदन प्राप्ति के 90 दिनों में (30 दिन और बढ़ाई जा सकती है) आदेश पारित करना अनिवार्य।
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न्यायाधिकरण अधिकतम ₹10,000 प्रति माह का आदेश दे सकता है (केंद्रीय अधिनियम); राज्य इसे बढ़ा सकते हैं — राजस्थान सहित कई राज्यों ने बढ़ाया है।
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अपीलीय न्यायाधिकरण (धारा 16) — भरण-पोषण न्यायाधिकरण के आदेश के विरुद्ध 60 दिनों में जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील; DM का निर्णय अंतिम।
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संपत्ति हस्तांतरण और भरण-पोषण (धारा 23): यदि वरिष्ठ नागरिक ने शर्त के साथ संपत्ति हस्तांतरित की और हस्तांतरणकर्ता भरण-पोषण नहीं करे, तो हस्तांतरण शून्य माना जाएगा।
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वरिष्ठ नागरिक को अकेला छोड़ना (धारा 24): जो व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक को जानबूझकर छोड़ता है — 3 माह कारावास या ₹5,000 जुर्माना। यह बढ़ती बुजुर्ग उपेक्षा की समस्या को अपराध घोषित करता है।
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वृद्धाश्रम (धारा 19): राज्य सरकारें प्रत्येक जिले में कम-से-कम एक वृद्धाश्रम स्थापित और रखरखाव करेंगी — न्यूनतम 150 व्यक्तियों को आश्रय देने योग्य।
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चिकित्सा सुविधाओं का दायित्व (धारा 20): सरकारी अस्पताल/संस्थान दीर्घकालिक बीमार वरिष्ठ नागरिकों को बेड उपलब्ध कराएँ; सभी सरकारी अस्पताल में इलाज का अधिकार।
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2019 संशोधन प्रस्ताव: कई राज्यों और केंद्र सरकार ने भरण-पोषण सीमा बढ़ाने, आधार-आधारित पहचान और वृद्ध देखभाल के प्रावधान मजबूत करने पर काम किया है।
परिचय और संदर्भ
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम २००७ इसलिए बनाया गया क्योंकि भारत में वृद्धजन आबादी बढ़ रही थी, संयुक्त परिवार कमजोर हो रहे थे और सामान्य न्यायालयी उपाय वृद्ध माता-पिता के लिए धीमे तथा कठिन साबित हो रहे थे।
१.१ जनसांख्यिकीय संदर्भ
भारत में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। पीआईबी ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के हवाले से बताया कि जनगणना २०११ के अनुसार भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या १०.३८ करोड़ थी, जो कुल जनसंख्या का ८.६ प्रतिशत थी। यही आँकड़ा अधिनियम की जरूरत समझाता है, क्योंकि वृद्धजन अब केवल पारिवारिक नैतिकता के भरोसे छोड़ देने वाला छोटा समूह नहीं रहे।
- २०११ जनगणना: ६०+ आयु वर्ग में १०.४ करोड़ लोग, लगभग ८.६ प्रतिशत जनसंख्या
- २०२१ अनुमान: लगभग १३.८ करोड़
- २०३१ प्रक्षेपण: लगभग १९.४ करोड़ — लगभग १३ प्रतिशत जनसंख्या
- राजस्थान: ग्रामीण वृद्ध जनसंख्या उल्लेखनीय है; संयुक्त परिवार प्रणाली भी कमजोर हो रही है
अधिनियम द्वारा संबोधित प्रमुख समस्याएँ:
१. एकल परिवार की प्रवृत्ति: पारंपरिक संयुक्त परिवारों के विघटन से वृद्ध माता-पिता बिना सहारे रह जाते हैं।
२. शहरी प्रवास: वयस्क संतान शहरों में चली जाती है, इसलिए गाँवों में वृद्ध माता-पिता देखभाल और धन के अभाव से जूझते हैं।
३. संपत्ति विवाद: वयस्क संतान पैतृक या माता-पिता की संपत्ति लेकर बाद में माता-पिता की उपेक्षा कर सकती है।
४. विद्यमान कानूनी उपाय अत्यंत धीमे: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा १४४ माता-पिता को भरण-पोषण का उपाय देती हैं, पर सामान्य आपराधिक न्यायालयों के ज़रिए; वृद्धों के लिए यह प्रक्रिया धीमी, महंगी और भयावह हो सकती है।
१.२ अधिनियम से पहले की स्थिति
२००७ के इस अधिनियम से पहले:
- दंड प्रक्रिया संहिता, धारा १२५ — माता-पिता भरण-पोषण का दावा कर सकते थे, किंतु प्रक्रिया धीमी थी और न्यायालयी ढाँचा वृद्धों के लिए सहज नहीं था।
- हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम १९५६ — केवल हिंदुओं पर लागू; स्वयं भरण-पोषण में असमर्थता का प्रमाण आवश्यक।
- दंड प्रक्रिया संहिता की कार्यवाही — दांडिक न्यायालय की प्रक्रिया वृद्धों के लिए भय पैदा करने वाली और खर्चीली हो सकती थी।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम २००७ ने सरकारी अधिकारियों की अध्यक्षता वाले भरण-पोषण अधिकरणों के ज़रिए एक सिविल-प्रशासनिक तंत्र बनाया। यह विरोधात्मक न्यायालयी कार्यवाही नहीं थी, इसलिए निरक्षर, गरीब और ग्रामीण वृद्धों के लिए अधिक सुलभ बनी।
१.३ संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद ४१: वृद्धावस्था, बीमारी और निःशक्तता में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार — अधिनियम इस निदेशक तत्व को व्यावहारिक रूप देता है।
- अनुच्छेद ४६: राज्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा।
- अनुच्छेद २१: सम्मान के साथ जीवन का अधिकार; वृद्धावस्था में जीवन, स्वास्थ्य, आश्रय और सुरक्षा इसी व्यापक गरिमा से जुड़े हैं।
- अनुच्छेद १५(३): राज्य महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है — सामाजिक न्याय की इसी सोच का विस्तार वृद्धों के संरक्षण तक दिखाई देता है।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M MWPSC अधिनियम 2007 के तहत "संबंधी" और "बच्चे" को परिभाषित करें। प्राथमिक भरण-पोषण दायित्व किस पर है?
आदर्श उत्तर
MWPSC 2007 के तहत: "बच्चे" (धारा 2(a)) — वयस्क पुत्र, पुत्री, पोता, पोती; बच्चे न हों तो पोते उत्तरदायी। "संबंधी" (धारा 2(g)) — कोई भी कानूनी उत्तराधिकारी जो संपत्ति पाएगा, बच्चा नहीं। प्राथमिक दायित्व: वयस्क बच्चों पर; संबंधी तभी जब निःसंतान।
~50 शब्द • 5 अंक
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