मुख्य तथ्य

  • POCSO अधिनियम 2012 बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से निपटने के लिए पहला समर्पित भारतीय कानून है
  • धारा 2(d) के तहत "बच्चा" 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति है
  • "प्रवेशन यौन हमला" (धारा 3) — सबसे गंभीर अपराध — बच्चे के शरीर में प्रवेश; धारा 4 के तहत न्यूनतम 10 वर्ष कठोर कारावास (आजीवन या मृत्युदंड तक)।
  • "गुरुतर प्रवेशन यौन हमला" (धारा 5) — विश्वास के पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध; धारा 6 — न्यूनतम 20 वर्ष कारावास।
  • "यौन हमला" (धारा 7) — बिना प्रवेश के, यौन इरादे से स्पर्श; धारा 8 — न्यूनतम 3 वर्ष से अधिकतम 5 वर्ष; गुरुतर यौन हमला (धारा 9/10) — 5–7 वर्ष।

मुख्य बिंदु

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    POCSO अधिनियम 2012 बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से निपटने के लिए पहला समर्पित भारतीय कानून है — यह 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर लागू है; 14 नवंबर 2012 (बाल दिवस) को लागू हुआ।

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    धारा 2(d) के तहत "बच्चा" 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति है — यह अधिनियम पीड़ितों के लिए लिंग-तटस्थ है (लड़के, लड़कियाँ, ट्रांसजेंडर बच्चे); अपराधी पुरुष या महिला हो सकते हैं।

  3. 3

    "प्रवेशन यौन हमला" (धारा 3) — सबसे गंभीर अपराध — बच्चे के शरीर में प्रवेश; धारा 4 के तहत न्यूनतम 10 वर्ष कठोर कारावास (आजीवन या मृत्युदंड तक)।

  4. 4

    "गुरुतर प्रवेशन यौन हमला" (धारा 5) — विश्वास के पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध; धारा 6 — न्यूनतम 20 वर्ष कारावास।

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    "यौन हमला" (धारा 7) — बिना प्रवेश के, यौन इरादे से स्पर्श; धारा 8 — न्यूनतम 3 वर्ष से अधिकतम 5 वर्ष; गुरुतर यौन हमला (धारा 9/10) — 5–7 वर्ष।

  6. 6

    "यौन उत्पीड़न" (धारा 11) — गैर-संपर्क अपराध; अश्लील टिप्पणियाँ, पोर्नोग्राफी दिखाना, शरीर अंग उजागर करवाना; धारा 12 — 3 वर्ष तक कारावास।

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    "पोर्नोग्राफिक उद्देश्यों के लिए बच्चे का उपयोग" (धारा 13) — बाल यौन दुर्व्यवहार सामग्री; धारा 14 — न्यूनतम 5 वर्ष; धारा 15 — भंडारण पर 3 वर्ष या जुर्माना।

  8. 8

    अधिनियम दोषिता की उपधारणा (धारा 29) बनाता है — न्यायालय मान लेगा कि अभियुक्त ने अपराध किया; निर्दोषता अभियुक्त को साबित करनी होगी।

  9. 9

    विशेष न्यायालय (धारा 28) बच्चों के अनुकूल माहौल में — बंद कमरे में सुनवाई, दुभाषिया, बच्चे का बयान उसके घर या किसी निष्पक्ष जगह पर (धारा 26)।

  10. 10

    अनिवार्य रिपोर्टिंग (धारा 19): किसी भी व्यक्ति को ऐसे अपराध की जानकारी होने पर पुलिस को सूचित करना अनिवार्य — रिपोर्ट न करने पर 6 महीने कारावास (धारा 21)।

  11. 11

    झूठी शिकायत पर दंड (धारा 22): झूठी शिकायत करने या जानकारी देने पर 6 महीने कारावास; नाबालिग की झूठी शिकायत दंडनीय नहीं।

  12. 12

    2019 संशोधन: 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे पर गंभीर भेदक यौन उत्पीड़न में मृत्युदंड जोड़ा; न्यूनतम सजा 10 से 20 वर्ष बढ़ाई।

पॉक्सो अधिनियम २०१२ की जरूरत क्यों पड़ी और यह कब लागू हुआ?

पॉक्सो अधिनियम २०१२ की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पुराने आपराधिक कानून बाल यौन शोषण को अधूरा कवर करते थे, और यह कानून १४ नवम्बर २०१२ को लागू हुआ। भारत कोड के अनुसार लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, २०१२ को २०१२ का अधिनियम संख्या ३२ दर्ज किया गया है।

१.१ समर्पित कानून की आवश्यकता

पॉक्सो २०१२ से पहले, भारत में बाल यौन शोषण को अपूर्ण रूप से संबोधित किया जाता था:

  • धारा ३७५ भारतीय दंड संहिता — मुख्य रूप से बालिकाओं पर लागू; भेदन आवश्यक; बालक पीड़ित असुरक्षित रह जाते थे
  • धारा ३५४ भारतीय दंड संहिता — शील भंग की अस्पष्ट श्रेणी; दंड अपेक्षाकृत कम
  • धारा ३७७ भारतीय दंड संहिता — लड़कों से जुड़े कुछ मामलों में लागू, किन्तु व्यापक बाल-सुरक्षा ढाँचा नहीं
  • किशोर न्याय अधिनियम २००० — शोषणकर्ताओं के अभियोजन से अधिक पुनर्वास पर केंद्रित

परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर कम रिपोर्टिंग और कम दोषसिद्धि दर रही। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े दिखाते थे कि बाल यौन शोषण के मामले वार्षिक रूप से बढ़ रहे थे, किन्तु भारतीय दंड संहिता के प्रावधान अपर्याप्त थे। पुराने ढाँचे में लड़कों, ट्रांसजेंडर बच्चों, गैर-प्रवेशन शारीरिक हमला, गैर-संपर्क लैंगिक उत्पीड़न और बाल अश्लीलता जैसे क्षेत्रों को साफ और एकसमान भाषा में नहीं रखा गया था।

भारत ने १९९२ में बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय का अनुसमर्थन किया, जो सदस्य राज्यों को बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बाध्य करता है। इसी अंतरराष्ट्रीय दायित्व और घरेलू कानूनी खालीपन ने एक अलग, बच्चों पर केंद्रित अधिनियम की जरूरत साफ की।

१.२ अधिनियमन

पॉक्सो का मसौदा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया। इसे १९ जून २०१२ को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई और १४ नवम्बर २०१२ — बाल दिवस — को अधिसूचित किया गया, जो बाल संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह तारीख परीक्षा में इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अधिनियम के लागू होने को बाल दिवस से जोड़ा गया है और बाल-संरक्षण की नीति-संवेदना वहीं से स्पष्ट होती है।

१.३ प्रमुख विशेषताएँ

१. लिंग-तटस्थ पीड़ित परिभाषा — लड़के, लड़कियाँ, ट्रांसजेंडर बच्चे समान रूप से संरक्षित
२. व्यापक अपराध ढाँचा — गैर-संपर्क लैंगिक उत्पीड़न से गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला तक
३. विशेष न्यायालय — बाल-संवेदनशील विचारण के लिए समर्पित त्वरित न्यायालय
४. बाल-सुलभ प्रक्रियाएँ — बंद कमरे में विचारण, दुभाषिया, विशेष शिक्षक, बच्चे के घर या पसंदीदा स्थान पर बयान जैसी व्यवस्था
५. अनिवार्य रिपोर्टिंग — रिपोर्ट करने का सभी नागरिकों पर आपराधिक दायित्व
६. साक्ष्य भार का उत्क्रमण — कुछ अपराधों में अभियुक्त के विरुद्ध दोष की उपधारणा
७. २०१९ संशोधन — १६ वर्ष से कम बच्चे पर प्रवेशन लैंगिक हमला के लिए न्यूनतम दंड २० वर्ष और गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला के लिए मृत्युदंड तक का प्रावधान


संभावित RAS प्रश्न

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1 5M POCSO अधिनियम 2012 के तहत "प्रवेशन यौन हमला" क्या है? उत्तेजित प्रवेशन यौन हमले की सजा क्या है? 5 अंक · 50 शब्द

आदर्श उत्तर

POCSO की धारा 3 के तहत प्रवेशन यौन हमले में बच्चे के शरीर में लिंग/वस्तु/शरीर का अंग डालना शामिल है। दंड: न्यूनतम 10 वर्ष कठोर कारावास। उत्तेजित प्रवेशन यौन हमला (धारा 5) — विश्वास की स्थिति में, रिश्तेदार, गिरोह — धारा 6: न्यूनतम 20 वर्ष, 2019 के बाद मृत्युदंड तक।

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