मुख्य तथ्य

  • महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005 को 13 सितंबर 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 26 अक्तूबर 2006 से लागू हुआ;
  • "घरेलू संबंध" (धारा 2(f)) में रक्त, विवाह, या दत्तक के संबंध में आने वाली महिलाएँ तथा लिव-इन संबंध में रहने वाली महिलाएँ शामिल हैं
  • "घरेलू हिंसा" (धारा 3) में चार रूप: शारीरिक, यौन, मौखिक/भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार।
  • "पीड़ित व्यक्ति" (धारा 2(a)) वह महिला है जो प्रत्यर्थी के साथ घरेलू संबंध में है या रही है;
  • अधिनियम तीन नए पदाधिकारी बनाता है: संरक्षण अधिकारी (धारा 8), सेवा प्रदाता (धारा 10) और मजिस्ट्रेट (धारा 12) जो 60 दिनों में आदेश देते हैं।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005 को 13 सितंबर 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 26 अक्तूबर 2006 से लागू हुआ; यह एक दीवानी कानून है जो आपराधिक कानून के साथ-साथ तत्काल राहत देता है।

  2. 2

    "घरेलू संबंध" (धारा 2(f)) में रक्त, विवाह, या दत्तक के संबंध में आने वाली महिलाएँ तथा लिव-इन संबंध में रहने वाली महिलाएँ शामिल हैं — यह भारत का पहला कानून है जो लिव-इन संबंध को संरक्षण के लिए मान्यता देता है।

  3. 3

    "घरेलू हिंसा" (धारा 3) में चार रूप: शारीरिक, यौन, मौखिक/भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार।

  4. 4

    "पीड़ित व्यक्ति" (धारा 2(a)) वह महिला है जो प्रत्यर्थी के साथ घरेलू संबंध में है या रही है; प्रत्यर्थी (धारा 2(q)) साझा घर का कोई भी वयस्क पुरुष सदस्य हो सकता है।

  5. 5

    अधिनियम तीन नए पदाधिकारी बनाता है: संरक्षण अधिकारी (धारा 8), सेवा प्रदाता (धारा 10) और मजिस्ट्रेट (धारा 12) जो 60 दिनों में आदेश देते हैं।

  6. 6

    संरक्षण आदेश (धारा 18) प्रत्यर्थी को हिंसा जारी रखने, संपर्क करने, कार्यस्थल में प्रवेश से रोकता है; उल्लंघन धारा 31 के तहत संज्ञेय, गैर-जमानती अपराध है।

  7. 7

    निवास आदेश (धारा 19) पीड़ित महिला को साझा घर में रहने का अधिकार सुरक्षित करता है — कानूनी अधिकार न होने पर भी बेदखल नहीं किया जा सकता।

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    आर्थिक राहत (धारा 20) में चिकित्सा व्यय, आय की हानि, बच्चों सहित भरण-पोषण और संपत्ति क्षति शामिल हैं।

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    अभिरक्षा आदेश (धारा 21) मजिस्ट्रेट को पीड़ित महिला के बच्चों की अंतरिम अभिरक्षा देने का अधिकार देता है।

  10. 10

    क्षतिपूर्ति आदेश (धारा 22) मजिस्ट्रेट को मानसिक यातना सहित क्षति के लिए मुआवजा देने का अधिकार देता है।

  11. 11

    अपील प्रावधान (धारा 29) — मजिस्ट्रेट के आदेश के 30 दिन में सत्र न्यायालय में अपील होती है; यह नियमित दीवानी मुकदमेबाजी से तेज प्रक्रिया सुनिश्चित करती है।

  12. 12

    सर्वोच्च न्यायालय — इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा (2013): न्यायालय ने माना कि लिव-इन संबंध अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित हैं।

परिचय और विधायी पृष्ठभूमि

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 उस कानूनी खालीपन को भरता है जिसमें महिला को हिंसा से बचने, घर में रहने और खर्च पाने के लिए केवल लंबी आपराधिक कार्यवाही पर निर्भर रहना पड़ता था।

1.1 इस अधिनियम से कौन-सी कमी पूरी होती है

2005 से पहले भारतीय कानून घरेलू हिंसा को मुख्यतः आपराधिक प्रावधानों से संबोधित करता था — धारा 498ए भारतीय दंड संहिता (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) और धारा 304बी भारतीय दंड संहिता (दहेज मृत्यु)। इन प्रावधानों में आपराधिक कार्यवाही की आवश्यकता होती थी, साक्ष्य का बोझ अधिक था, और वैवाहिक घर में रहने के अधिकार जैसी कोई तत्काल दीवानी राहत नहीं थी। पीड़ितों को अक्सर हिंसा सहने या बेघर होने के बीच चुनाव करना पड़ता था।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़े लगातार बताते हैं कि घरेलू हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019–21 की भारत तथ्य-पत्रिका के अनुसार 18–49 वर्ष की कभी विवाहित महिलाओं में 29.3% ने कभी न कभी वैवाहिक हिंसा का अनुभव बताया। इसी पृष्ठभूमि में नागरिक समाज संगठनों और राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक व्यापक दीवानी कानून की मांग की।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 इन उद्देश्यों से बनाया गया:

1. आपराधिक अभियोजन की आवश्यकता के बिना दीवानी उपाय (संरक्षण आदेश, आवास आदेश, मौद्रिक राहत) प्रदान करना

2. सभी प्रकार के घरेलू संबंधों में महिलाओं की रक्षा करना — केवल विवाहित महिलाओं की नहीं

3. स्थानीय मजिस्ट्रेटों और संरक्षण अधिकारियों से सुलभ, समयबद्ध तंत्र बनाना

4. स्वामित्व की परवाह किए बिना साझा घर में रहने का अधिकार देना

1.2 संवैधानिक आधार

अधिनियम इन प्रावधानों से प्रेरणा लेता है:

  • अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) — यह भेदभाव समाप्त करता है कि केवल विवाहित महिलाओं को संरक्षण मिले
  • अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर गैर-भेदभाव, और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति)
  • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार — गरिमा के साथ जीने और हिंसा से मुक्त रहने का अधिकार)
  • निदेशक सिद्धांत अनुच्छेद 39 — आजीविका के पर्याप्त साधनों का समान अधिकार

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संभावित प्रश्न

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15MPWDVA 2005 के अंतर्गत "घरेलू हिंसा" क्या है? इसके चार रूप बताइए।5 अंक · 50 शब्द

मॉडल उत्तर

PWDVA 2005 की धारा 3 के अनुसार घरेलू हिंसा में कोई भी ऐसा कार्य, चूक या आचरण शामिल है जो स्वास्थ्य, जीवन या सुरक्षा को नुकसान पहुँचाए। चार रूप: (1) शारीरिक — मारपीट; (2) यौन — जबरन संबंध; (3) मौखिक/भावनात्मक — धमकियाँ, अपमान; (4) आर्थिक — संसाधन से वंचित, घर से बेदखल।

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