राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 के अंतर्गत नगरीय वित्त, निधियाँ, राजस्व और कराधान
मुख्य तथ्य
- 1992 के 74वें संविधान संशोधन ने नगरपालिकाओं को संवैधानिक आधार दिया और शहरी स्वशासन के लिए भाग 9-क जोड़ा।
- 1 जून 1993 से भाग 9-क लागू हुआ, इसलिए नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका को स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक इकाई माना जाता है।
- राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 राजस्थान में नगरीय निकायों के गठन, वित्त, राजस्व, कराधान, लेखों और अंकेक्षण का मुख्य राज्य कानून है।
- 1992 के संवैधानिक ढाँचे में अनुच्छेद 243-य राज्य वित्त आयोग को नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा का आधार देता है।
- 2009 के अधिनियम में नगरीय निधि वह मुख्य कोष है जिसमें नगरपालिका की कर, शुल्क, किराया, अनुदान और अन्य प्राप्तियाँ जमा होती हैं।
मुख्य बिंदु
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1992 के 74वें संविधान संशोधन ने नगरपालिकाओं को संवैधानिक आधार दिया और शहरी स्वशासन के लिए भाग 9-क जोड़ा।
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1 जून 1993 से भाग 9-क लागू हुआ, इसलिए नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका को स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक इकाई माना जाता है।
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राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 राजस्थान में नगरीय निकायों के गठन, वित्त, राजस्व, कराधान, लेखों और अंकेक्षण का मुख्य राज्य कानून है।
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1992 के संवैधानिक ढाँचे में अनुच्छेद 243-य राज्य वित्त आयोग को नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा का आधार देता है।
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2009 के अधिनियम में नगरीय निधि वह मुख्य कोष है जिसमें नगरपालिका की कर, शुल्क, किराया, अनुदान और अन्य प्राप्तियाँ जमा होती हैं।
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राजस्थान स्थानीय निधि अंकेक्षण अधिनियम 1954 नगरपालिका खातों के वैधानिक अंकेक्षण से जुड़ा महत्वपूर्ण कानून है।
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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित 1971 का केंद्रीय कानून नगरपालिका खातों के तकनीकी मार्गदर्शन और अंकेक्षण व्यवस्था में प्रासंगिक है।
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नगरीय वित्त का संवैधानिक आधार क्या है?
नगरीय वित्त का संवैधानिक आधार 74वें संविधान संशोधन से बना स्थानीय स्वशासन है, जिसके तहत राज्य कानून नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका को कार्यों के साथ वित्तीय साधन भी देता है। जनगणना 2011 के अनुसार राजस्थान की नगरीय आबादी 1,70,48,085 थी, इसलिए नगरपालिका वित्त को केवल लेखा-विधि नहीं, बल्कि बड़ी शहरी सेवा-व्यवस्था का आधार माना जाता है। राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 को समझने के लिए पहले 74वें संविधान संशोधन की पृष्ठभूमि याद रखनी चाहिए। इस संशोधन ने नगरपालिकाओं को केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि संवैधानिक स्थानीय स्वशासन की इकाई माना। राज्य सरकार कानून बनाकर नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका जैसी संस्थाओं को अधिकार, कार्य और वित्तीय साधन देती है। इसलिए नगरपालिका की वित्तीय व्यवस्था राज्य कानून, राज्य सरकार के नियंत्रण और संविधान में दिए गए विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के बीच काम करती है।
वित्तीय दृष्टि से नगर निकायों के सामने दो स्थायी प्रश्न होते हैं: पहला, स्थानीय सेवाओं के लिए धन कहाँ से आए; दूसरा, उस धन का खर्च किस प्रक्रिया और नियंत्रण में हो। अधिनियम इन्हीं प्रश्नों का उत्तर नगरीय निधि, कराधान, शुल्क, बजट, लेखे और अंकेक्षण के माध्यम से देता है। भर्ती परीक्षा में इस अध्याय को केवल लेखा-विधि की तरह नहीं, बल्कि शहरी शासन की रीढ़ के रूप में पढ़ना चाहिए।
याद रखने योग्य बात यह है कि नगरीय वित्त स्वायत्तता और जवाबदेही दोनों का विषय है।
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