केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना ‘समुद्र मंथन’ को मंज़ूरी दी है। केंद्रीय क्षेत्र की इस योजना के पहले चरण पर 31 मार्च 2031 तक ₹84,084 करोड़ खर्च किए जाएंगे। इसका उद्देश्य बेहतर भूकंपीय आँकड़ों, जोखिम में सरकारी भागीदारी, साझा बुनियादी ढाँचे और घरेलू विनिर्माण क्षमता के सहारे अपतटीय हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं उत्पादन में तेजी लाना है। भारत कच्चे तेल का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इसका वार्षिक आयात बिल लगभग 144 अरब अमेरिकी डॉलर, यानी करीब ₹13 लाख करोड़ है। अन्वेषण में भारी पूँजी लगती है और किसी खंड के आवंटन से व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने तक सामान्यतः 5–10 वर्ष लगते हैं। मौजूदा तेल और गैस क्षेत्रों का प्राकृतिक उत्पादन भी हर साल करीब 6–7 प्रतिशत घटता है। इसलिए समुद्र मंथन के तहत गहरे पानी के अन्वेषण कुओं की पात्र खुदाई लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत या प्रति कुआँ ₹675 करोड़, जो भी कम हो, सरकारी सहायता के रूप में दिया जाएगा। योजना के चार मुख्य घटकों में अपतटीय भूकंपीय आँकड़ों के संकलन और अभिलेख के लिए ₹28,534 करोड़, गहरे पानी के 60 अन्वेषण कुओं की खुदाई के लिए ₹43,200 करोड़, साझा अपतटीय बुनियादी ढाँचा केंद्रों के लिए ₹10,000 करोड़ और तेल-गैस विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रों के लिए ₹2,000 करोड़ रखे गए हैं। निगरानी और सहायक गतिविधियों के लिए अलग से ₹350 करोड़ हैं। अन्वेषण सफल रहने पर घरेलू तेल और गैस उत्पादन लगभग 62 एमएमटीओई से बढ़ाकर 80 एमएमटीओई सालाना तथा हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार 1.6 टीओई से बढ़ाकर 2.2 टीओई करने का लक्ष्य है। इससे कच्चे तेल के वार्षिक आयात में करीब ₹1 लाख करोड़ की कमी आ सकती है।