भारत की प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा कोयले से पूरा होता है और 70 प्रतिशत से अधिक बिजली भी कोयले से बनती है। घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दो वर्षों से 1 अरब टन के पार रहा है। इस बढ़ोतरी में कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों की बड़ी भूमिका रही। राष्ट्रीय उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2021-22 के 10.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 20.2 प्रतिशत हो गई। मौजूदा व्यवस्था की पृष्ठभूमि 2014 में बनी, जब सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 से 2012 के बीच आवंटित 218 ब्लॉकों में से 204 को रद्द कर दिया। इसके बाद कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 ने दोबारा आवंटन का कानूनी आधार दिया और 18 जून 2020 को वाणिज्यिक कोयला खनन औपचारिक रूप से शुरू हुआ। सफल बोली लगाने वाले अब उपयोग संबंधी रोक के बिना किसी भी क्षेत्र के उपभोक्ता को बाज़ार से तय कीमत पर कोयला बेच सकते हैं। प्रति टन तय शुल्क की जगह राजस्व-साझाकरण व्यवस्था लाई गई। इसमें बोली लगाने वाला सरकार को दिए जाने वाले राजस्व का प्रतिशत बताता है और यह हिस्सा राष्ट्रीय कोयला सूचकांक से जुड़ा रहता है। भागीदारी बढ़ाने के लिए पहले का खनन अनुभव ज़रूरी नहीं रखा गया, संयुक्त उद्यम और संघों को अनुमति दी गई तथा स्वचालित मार्ग से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंज़ूरी दी गई। जून 2020 से 14 चरणों में 141 खदानों की वाणिज्यिक नीलामी हुई है। इनकी संयुक्त अधिकतम उत्पादन क्षमता 366.35 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष है। औसत राजस्व हिस्सेदारी 24.17 प्रतिशत रही, जो 4 प्रतिशत की न्यूनतम दर से छह गुना से भी अधिक है। इनमें 123 खदानें निजी कंपनियों को मिलीं और 44 सफल बोली लगाने वालों को पहले कोयला खनन का अनुभव नहीं था। वित्त वर्ष 2025-26 में कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों का उत्पादन लगभग 210.46 मीट्रिक टन रहा। प्रीमियम से राजस्व भी वित्त वर्ष 2014-15 के ₹461 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में ₹5,553 करोड़ हो गया।