केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने कहा है कि राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का मानगढ़ धाम राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित होने के लिए ज़रूरी पुरातात्त्विक विशेषताएँ, प्रामाणिकता और अखंडता अब बरकरार नहीं रखता। लोकसभा सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख हनुमान बेनीवाल के संसदीय सवाल के जवाब में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्त्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत यह दर्जा देने के लिए पहले अनुरोध मिले थे। फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। मंत्रालय ने स्थल निरीक्षण के आधार पर कहा कि वहाँ बड़े पैमाने पर आधुनिक विकास और निर्माण हुआ है। उसके अनुसार इन व्यापक आधुनिक बदलावों के कारण राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने की ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं होतीं। मानगढ़ धाम का भील समुदाय के लिए गहरा ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है। राजस्थान-गुजरात सीमा पर मानगढ़ की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना ने 17 नवंबर 1913 को सैकड़ों भील आदिवासियों को मार दिया था। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 8 अगस्त 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में मृतकों की संख्या 1,500 बताई थी। हत्याकांड के बड़े पैमाने के कारण मानगढ़ को कभी-कभी ‘आदिवासी जलियांवाला’ कहा जाता है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के भील इसे पवित्र स्थल तथा आदिवासी पहचान का अहम हिस्सा मानते हैं। बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार रोत ने मंत्रालय के जवाब को 1,500 आदिवासियों के बलिदान का अपमान बताया और कहा कि इससे मानगढ़ में आस्था रखने वाले समुदायों की भावनाएँ आहत हुई हैं।