राजस्थान मंत्रिमंडल ने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने से जुड़ा विधेयक मंज़ूर किया है। इसमें बहुविवाह पर रोक लगाने और विवाह तथा तलाक का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। विवाह के बिना साथ रहने का संबंध शुरू या खत्म होने पर पंजीकरण अथवा लिखित सूचना देना भी अनिवार्य करने की बात कही गई है। एक अन्य प्रस्ताव में सभी धर्मों के बेटे-बेटियों को उनके व्यक्तिगत कानूनों से अलग, संपत्ति में समान अधिकार देने का प्रावधान है। प्रस्तावित संहिता अनुसूचित जनजातियों और उन समुदायों पर लागू नहीं होगी, जिनके प्रथागत अधिकारों को संविधान का संरक्षण मिला हुआ है। यह विधेयक पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफ़ारिशों पर आधारित है। इसे 20 अगस्त से शुरू होने वाले राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। मंत्रिमंडल ने आगामी पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों की आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले इसे मंज़ूरी दी। राजस्थान समान व्यक्तिगत कानून की दिशा में आगे बढ़ने वाला भारतीय जनता पार्टी शासित पाँचवाँ राज्य है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़े मामलों के लिए एक जैसे कानून बनाना है। अभी अलग-अलग धर्मों के ये मामले समुदाय-विशेष के व्यक्तिगत कानूनों से चलते हैं, जिनका बड़ा हिस्सा धार्मिक ग्रंथों से निकला है। उत्तराखंड जनवरी 2025 में स्वतंत्रता के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बना। गुजरात विधानसभा ने मार्च में ऐसा ही कानून पारित किया। असम विधानसभा ने 27 मई को बहुविवाह पर रोक और विवाह के बिना साथ रहने वाले संबंधों के पंजीकरण से जुड़ा विधेयक पारित किया। गोवा में 1867 में पुर्तगाली नागरिक संहिता अपनाए जाने के बाद से समान नागरिक संहिता लागू है।