राजस्थान सरकार ने 2024-25 में सरकारी कंपनियों, निगमों और अन्य संस्थाओं के ज़रिए बजट से बाहर 9,410 करोड़ रुपये का कर्ज जुटाया। यह बात जयपुर से 26 अगस्त 2026 को बताई गई, जब चल रहे विधानसभा सत्र में सदन में रखी गई महालेखापरीक्षक (सीएजी) की राज्य वित्त लेखापरीक्षा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ।
2024-25 के बजट में इस ऑफ-बजट उधारी का कोई ज़िक्र नहीं था। महालेखाकार ने सरकारी कंपनियों, निगमों और अन्य संस्थाओं से मिली जानकारी तथा विभागों के कर्ज संबंधी आदेशों की जांच की और पाया कि बजट के बाहर 9,410 करोड़ रुपये जुटाए गए। अलग-अलग संस्थाओं के नाम पर कर्ज लिया गया और उसे सरकार की ज़रूरतों पर खर्च किया गया, जिससे वास्तविक देनदारी बजट में पूरी तरह नहीं दिखी।
सीएजी में हर महीने संधारित राज्य खातों से यह भी सामने आया कि जुलाई 2026 तक राजस्थान के सरकारी बोर्ड, निगम और कंपनियों पर कुल कर्ज 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये से ज़्यादा हो चुका था। इनमें सबसे ज़्यादा कर्ज बिजली कंपनियों पर था—करीब 94 हजार करोड़ रुपये से ऊपर।
रिपोर्ट में जवाबदेही की खामियां भी बताई गईं। विभागों ने 2010-11 से 2023-24 के बीच खर्च किए गए 427.33 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्र (यूसी) जमा नहीं कराए; 31 मार्च 2025 तक 449 यूसी लंबित थे। उसी तारीख तक 75 व्यक्तिगत जमा (पीडी) खाते दो साल से निष्क्रिय थे, जिनमें 17.18 करोड़ रुपये जमा थे; इनमें 23 खातों में दो साल से कोई राशि नहीं थी।
2024-25 के अंत में स्थानीय निकाय निधियों में बड़ी रकम बची रही—जिला परिषद निधि में 1,718.34 करोड़, पंचायत समिति निधि में 1,912.68 करोड़ और नगर निकाय निधि में 1,514.39 करोड़ रुपये। 31 मार्च 2025 तक सरकारी धन के गबन, हेराफेरी, चोरी या नुकसान से जुड़े 765 मामले लंबित थे, जिनमें 152.08 करोड़ रुपये शामिल थे—333 गबन या हेराफेरी और 432 चोरी या नुकसान के मामले।
