भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने 13 जुलाई 2026 को पांच दिवसीय संपादकीय कार्यशाला की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप वर्गीकरण (आईसीएचआई) ढांचे के अल्फा प्रारूप की उच्च-स्तरीय संरचना को परिष्कृत करना और उसका विषय-वस्तु मॉडल तैयार करना है। 13 से 17 जुलाई 2026 तक चलने वाली यह कार्यशाला भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज ढांचे में स्थान दिलाने की दिशा में एक अहम कदम है।

यह कार्यशाला केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) द्वारा अपने डब्ल्यूएचओ सहयोगी केंद्र, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा संपदा संस्थान (एनआईआईएमएच), हैदराबाद (सीसी आईएनडी-177) के माध्यम से आयोजित की जा रही है। इसमें प्रमुख वैज्ञानिक विशेषज्ञ, संस्थान प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय सूचना विज्ञान पेशेवर एक साथ जुटे हैं, ताकि आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (एएसयू) पद्धतियों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड (एनएचआईसी) का वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और परतदार पदानुक्रम अंतिम रूप ले सके। यह पहल मई 2026 की परामर्श बैठकों में तैयार आधारभूत प्रारूप पर आधारित है।

विशेषज्ञों द्वारा सत्यापित इस संग्रह में फिलहाल आयुर्वेद के लिए 13 विशेषज्ञता क्षेत्र, 76 चिकित्सा विधियां और 714 प्रक्रियाएं; सिद्ध के लिए 25 विशेषज्ञता क्षेत्र, 130 उपचार पद्धतियां और 996 प्रक्रियाएं; तथा यूनानी के लिए 15 विशेषज्ञता क्षेत्र, 179 उपचार पद्धतियां और 551 प्रक्रियाएं शामिल हैं।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने इसे महज एक कोडिंग प्रक्रिया से कहीं आगे बताया और इसे भारत की पारंपरिक पद्धतियों को वैश्विक वैज्ञानिक, डिजिटल और नीतिगत तंत्र में स्थापित करने वाला परिवर्तनकारी कदम कहा। संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन ने दीर्घकालिक नीतिगत निहितार्थों पर प्रकाश डाला, जबकि डब्ल्यूएचओ प्रतिनिधियों डॉ. रॉबर्ट जैकब और डॉ. स्टीफन एस्पिनोसा ने वैश्विक अंतर-संचालनीयता और डिजिटल सूचना विज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया।