भारत में पंजीकृत भौगोलिक संकेत यानी जीआई उत्पादों की संख्या 800 से अधिक हो गई है। 2014 से अब तक 607 जीआई दिए गए हैं। पिछले 10 वर्षों में इनके अधिकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या 365 से बढ़कर जनवरी 2025 तक 29,000 हो गई। जीआई किसी उत्पाद को उसके मूल स्थान से जोड़ता है, पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करता है, दुरुपयोग रोकता है और खरीदारों का भरोसा बढ़ाता है। इससे कारीगरों, बुनकरों, किसानों और उत्पादक समूहों को बेहतर पहचान, अच्छे बाज़ार और अधिक मोलभाव की ताकत मिल सकती है।

भारत ने वस्तुओं का भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 तथा 2002 में अधिसूचित नियमावली से कानूनी ढाँचा बनाया। यह व्यवस्था 2003 में लागू हुई और जीआई पंजीकरण 2004-05 में शुरू हुआ। पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग चाय जीआई पाने वाला भारत का पहला उत्पाद था। इसके उत्पाद और प्रतीक चिह्न, दोनों को संरक्षण मिला। जीआई पंजीकरण 10 वर्ष तक मान्य रहता है और इसे रिन्यू कराया जा सकता है।

2025 के संशोधन ने जीआई आवेदन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं का शुल्क 80 प्रतिशत घटा दिया। रिन्यू करने का शुल्क भी ₹3,000 से घटाकर ₹500 कर दिया गया। पंजीकृत उत्पादों में 445 हस्तशिल्प उत्पाद और 27 उत्पाद प्रतीक चिह्न, 251 कृषि उत्पाद, 64 विनिर्मित उत्पाद, 66 खाद्य उत्पाद और 5 प्राकृतिक उत्पाद शामिल हैं। दिसंबर 2025 तक उत्तर प्रदेश 81 जीआई उत्पादों के साथ पहले स्थान पर था। तमिलनाडु के 76 और महाराष्ट्र के 55 उत्पाद थे। सरकारी सहायता में बिक्री मंच, रेलवे के विशेष स्टॉल, पर्यटन, वित्तीय मदद और निर्यात प्रोत्साहन शामिल हैं। भारत ने 2030 तक 10,000 जीआई पंजीकरण का लक्ष्य रखा है।