वर्ष 2007 में शुरू हुई ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना भारत की कागज़-आधारित न्यायिक व्यवस्था को डिजिटल, पारदर्शी और आसानी से सुलभ व्यवस्था में बदल रही है। वर्ष 2011–2015 के पहले चरण में 14,000 से अधिक अदालतों का कम्प्यूटरीकरण हुआ और ज़रूरी नेटवर्क ढाँचा तैयार किया गया। वर्ष 2015–2023 के दूसरे चरण में राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र जैसी नागरिक-केंद्रित सेवाएँ जोड़ी गईं। इसी दौरान वीडियो कॉन्फरेंसिंग की सुविधाएँ पांच गुना से अधिक बढ़ीं।
वर्ष 2023–2027 का तीसरा चरण अभी चल रहा है। इसमें पुराने अभिलेखों को बड़े पैमाने पर डिजिटल बनाने, वर्चुअल सुनवाई बढ़ाने, न्याय संस्थानों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और अक्षर पहचान जैसी तकनीकों को अपनाने पर जोर है। ई-फाइलिंग 4,519 अदालतों में लागू है, 7,553 संस्थानों में वीडियो कॉन्फरेंसिंग की सुविधाएँ उन्नत की गई हैं और 6,895 अदालतों में इलेक्ट्रॉनिक समन तथा नोटिस को ट्रैक करने की सुविधा उपलब्ध है। अदालतों के 753 करोड़ से अधिक पृष्ठ डिजिटल किए जा चुके हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड आदेशों, फ़ैसलों, लंबित मामलों, निपटान और देरी के कारणों की सार्वजनिक जानकारी देता है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों के अलग-अलग विवरण-पटल हैं। ई-फाइलिंग से किसी भी स्थान से दस्तावेज़ जमा किए जा सकते हैं और यह अंग्रेजी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध है। 30 जून 2026 तक इसके ज़रिए 1.25 करोड़ से अधिक मामले दायर हुए। वीडियो कॉन्फरेंसिंग से 4.18 करोड़ से अधिक दूरस्थ सुनवाइयाँ हुईं। वहीं 31 वर्चुअल अदालतों ने ₹1,135.79 करोड़ के 11.33 करोड़ यातायात चालान स्वीकार किए। इन उपायों से अदालतों के चक्कर घटे हैं और न्यायिक सेवाओं तक पहुँच तथा पारदर्शिता बढ़ी है।
