राज्यसभा ने 11 अगस्त 2026 को अधिकरण सुधार विधेयक, 2026 पारित किया। लोकसभा इसे एक दिन पहले, 10 अगस्त को पारित कर चुकी थी। विधेयक में राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना का प्रावधान है। इसमें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और राष्ट्रीय हरित अधिकरण सहित 16 अधिकरणों के अध्यक्षों तथा सदस्यों की योग्यता, चयन का तरीका, नियुक्ति, वेतन-भत्ते, इस्तीफा, पद से हटाने और सेवा की अन्य शर्तें तय की गई हैं। विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने प्रस्तावित आयोग को विधेयक का मुख्य आधार बताया। उनके अनुसार, आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को सौंपी जाएगी। इसमें दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे। मंत्री ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य नियुक्तियों को पारदर्शी, स्वतंत्र और योग्यता-आधारित बनाना है। उनके मुताबिक, विधेयक आधुनिक, स्वतंत्र और एकरूप अधिकरण व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि अधिकरण शीघ्र न्याय दिलाने में न्याय व्यवस्था की पूरक भूमिका निभाते हैं। साथ ही उन्होंने सदन को भरोसा दिलाया कि विधेयक से अधिकरणों के अधिकार-क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं होगा। सरकार ने इस सुधार को वैश्विक श्रेष्ठ पद्धतियों, न्याय तक आसान पहुंच, कारोबार में सुगमता, समय पर न्याय और देश के कानूनी व संस्थागत ढांचे को मज़बूत करने से जोड़ा। विपक्षी सदस्यों ने राज्यसभा की चर्चा में भाग नहीं लिया। उपसभापति हरिवंश ने विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को यह कहते हुए बोलने की अनुमति नहीं दी कि वे विधेयक पर नहीं बोल रहे थे। इसके बाद विपक्ष ने सदन से बहिर्गमन किया। इंडिया गठबंधन के सदस्य प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से माफी की मांग भी कर रहे थे।