जोधपुर की करीब 200 साल पुरानी पारंपरिक जोधपुरी मोजरी (जूती) को GI टैग मिल गया है। इस टैग से मोजरी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिलेगी, नकली और मशीन से बनी नकल पर रोक लगेगी, कारीगरों को बेहतर कीमत मिलेगी और निर्यात को नई गति मिलेगी।

GI रजिस्ट्री ने यह प्रमाण पत्र जोधपुर हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (JHEA) और ग्राम विकास सेवा संस्थान को जारी किया है। इसके लिए साल 2021 में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय और विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के पास आवेदन किया गया था।

फिलहाल जोधपुरी मोजरी का घरेलू बाजार करीब 100 करोड़ रुपये का है, जबकि सालाना निर्यात लगभग 10 करोड़ रुपये है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि GI टैग मिलने के बाद अगले दो साल में यह कारोबार दोगुना हो सकता है, जिससे जोधपुर और आसपास के गांवों के हजारों कारीगर परिवारों को सीधा फायदा होगा।

इससे पहले जोधपुरी बंधेज को भी GI टैग मिल चुका है। अब जोधपुरी साफा, लकड़ी के हस्तशिल्प, मारवाड़ के जीरे, जोधपुरी पत्थर की कलाकृतियों और पारंपरिक तलवों को भी GI टैग दिलाने की कोशिश जारी है।

राजस्थान के हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए GI टैग केवल एक प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि ब्रांड सुरक्षा का एक ज़रिया है। यह असली कारीगरों को सस्ती और मशीन से बनी नकल के मुकाबले टिकने में मदद करता है और घरेलू व वैश्विक बाजारों में बेहतर कीमत पाने का रास्ता खोलता है।