राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने 3 अगस्त 2026 को वैधानिक निर्देश संख्या 86 में संशोधन किया। इसका उद्देश्य 500 वर्ग मीटर से कम क्षेत्रफल वाले भूखंडों पर चल रहे निर्माण एवं ध्वस्तीकरण स्थलों में धूल नियंत्रण के गंभीर उल्लंघनों पर कार्रवाई मज़बूत करना है। संशोधन से पूरे एनसीआर के अतिरिक्त नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, नगर परिषदों, नगर बोर्डों और शहरी स्थानीय निकायों को ऐसे उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा शुरू करने का अधिकार मिला है। इसके दायरे में मानेसर, करनाल, पानीपत, रोहतक, मेरठ, अलवर, भरतपुर, भिवाड़ी और नीमराणा भी शामिल हैं।
यह निर्देश पहले 2 जनवरी 2025 को जारी हुआ था और 24 जून 2025 को इसमें संशोधन किया गया था। इसके तहत दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद तथा गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और सोनीपत के संबंधित अधिकारियों को क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत या मुकदमा दर्ज करने का अधिकार दिया गया था। गंभीर उल्लंघन होने पर वे स्थल बंद करने का आदेश भी दे सकते थे और पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगा या वसूल सकते थे। इसमें श्रेणीबद्ध प्रतिक्रिया कार्य योजना की अनुसूची से जुड़े उल्लंघन भी शामिल थे।
आयोग ने यह दायरा इसलिए बढ़ाया क्योंकि एनसीआर के दूसरे शहरों और कस्बों में भी 500 वर्ग मीटर से कम क्षेत्रफल वाले भूखंडों पर बड़ी संख्या में निर्माण कार्य चल रहे हैं। निर्माण एवं ध्वस्तीकरण क्षेत्र से निकलने वाले कुल पीएम10 और पीएम2.5 में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। अब संबंधित एजेंसियों को पहले से दी जा रही मासिक प्रगति रिपोर्ट के साथ शिकायतों और मुकदमों की मासिक स्थिति रिपोर्ट भी देनी होगी। अप्रैल–जून 2026 में दिल्ली में 16,195, हरियाणा के एनसीआर क्षेत्र में 909, उत्तर प्रदेश के एनसीआर क्षेत्र में 230 और राजस्थान के एनसीआर जिलों में 160 स्थलों का निरीक्षण किया गया। विस्तारित व्यवस्था से अनुपालन, जवाबदेही और निगरानी बेहतर होने तथा धूल उत्सर्जन घटने की उम्मीद है।
