दक्षिण कोरिया के बुसान में विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह 2025-26 चक्र के लिए भारत की आधिकारिक दावेदारी थी। इसके साथ सारनाथ देश की 45वीं विश्व धरोहर संपत्ति बना। सूची में शामिल संपत्ति के दो भाग हैं—चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित इन अवशेषों में धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और अशोक स्तंभ शामिल हैं।

बौद्ध परंपरा में सारनाथ को ऋषिपत्तन, इषिपत्तन और मृगदाव भी कहा जाता है। यहीं छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। धर्मचक्र प्रवर्तन कही जाने वाली इस घटना से बौद्ध संघ की शुरुआत हुई और आर्य अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांत स्थापित हुए। सारनाथ बौद्ध तीर्थयात्रा के चार प्रमुख स्थलों में से एक है।

यहाँ के स्मारक 16 सदियों के इतिहास को समेटे हैं, जो 5वीं-4वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक फैला है। सारनाथ को 1998 में विश्व धरोहर की संभावित सूची में रखा गया था और नामांकन प्रस्ताव जनवरी 2025 में भेजा गया। इसके बाद 18 महीने की प्रक्रिया चली, जिसमें तकनीकी बैठकें और आईसीओएमओएस का स्थल निरीक्षण शामिल था। स्थल का नामांकन मानदंड 3 और 6 के अंतर्गत हुआ। ये मानदंड यहाँ की लंबी धार्मिक निर्माण परंपरा और बुद्ध के जीवन की घटनाओं से इसके सीधे संबंध को सामने रखते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 150 से अधिक वर्षों से सारनाथ में खुदाई और संरक्षण का काम कर रहा है। भारत ने टिकाऊ पर्यटन प्रबंधन, स्थल की प्रामाणिकता और अखंडता की रक्षा तथा बफर ज़ोन में बिना योजना के होने वाले विकास को रोकने की प्रतिबद्धता जताई है। 45 विश्व धरोहर संपत्तियों के साथ भारत दुनिया में छठे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है।