नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में हरित भारत मिशन के लक्ष्य और उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर रहा। 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले वन आवरण केवल 30,000 हेक्टेयर बढ़ा। इस तरह लक्ष्य में 97.5% की कमी रह गई। भारत के वन आवरण की रक्षा, बहाली और बढ़ोतरी के लिए यह मिशन फरवरी 2014 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत शुरू किया गया था। संसद में रखी गई लेखा-परीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, कमज़ोर वित्तीय योजना और केंद्र व राज्यों की मौजूदा योजनाओं के साथ तालमेल न होना इस कमी के प्रमुख कारण थे। मिशन के तहत किए गए काम की निगरानी भी पर्याप्त नहीं थी। रिपोर्ट में 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए काम को देखा गया। इनके लिए पर्यावरण मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2015-’16 से 2024-’25 के बीच वित्तीय लक्ष्य मंज़ूर किए थे। वन आवरण की गुणवत्ता सुधारने में भी उपलब्धि कम रही। 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1 लाख हेक्टेयर में गुणवत्ता सुधरी और रिपोर्ट ने 91.8% की कमी दर्ज की। 2015 से 2025 के बीच केवल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने कार्बन अवशोषण का आकलन किया। इसका अर्थ हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर सुरक्षित रूप से जमा करना है, ताकि वह वायुमंडल में न रहे। पेड़, मिट्टी और महासागर यह काम प्राकृतिक रूप से करते हैं। लेखा परीक्षक ने यह भी पाया कि जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के बजाय कम या मध्यम संवेदनशीलता वाले क्षेत्र चुने गए। यह मिशन के एक अहम मानदंड के विरुद्ध था। योजनाओं में तालमेल की कमी से प्रस्तावित ₹10,600 करोड़ की वित्तीय सहायता नहीं मिल सकी।