राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की पहाड़ियों पर अंधाधुंध निर्माण और व्यावसायिक परियोजनाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 24 जुलाई को बसंत होटल्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका सुनते हुए न्यायमूर्ति समीर जैन ने सामग्री को उदयपुर के पारिस्थितिक अस्तित्व के लिए बेहद चिंताजनक माना। अदालत ने राज्य सरकार की पहाड़ी नीति पर सवाल उठाए और पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण की मंज़ूरी से जुड़े सभी रिकॉर्ड तलब किए। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को रिकॉर्ड सहित व्यक्तिगत रूप से और अदालत के आयुक्तों को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का निर्देश मिला। मांगे गए दस्तावेज़ों में याचिकाकर्ता की संपत्ति के आसपास व्यावसायिक निर्माणों की मंज़ूरियां तथा 2018 और 2024 की पहाड़ी नीतियां तैयार करने से जुड़े रिकॉर्ड शामिल हैं। व्यापक जनहित को देखते हुए अदालत ने लोक न्यास सिद्धांत के तहत स्वतः जनहित याचिका शुरू करने पर विचार करने का संकेत भी दिया। कंपनी ने अपनी होटल परियोजना पर पहाड़ी नीति लागू किए जाने को चुनौती दी है। उसका कहना है कि निर्माण 2018 में पुरानी नीति और सतत विकास के सिद्धांतों के अनुसार शुरू हुआ था। कंपनी ने आरोप लगाया कि आसपास कई होटल आवश्यक अनुमति के बिना चल रहे हैं, जबकि केवल उसकी परियोजना को निशाना बनाया गया। अदालत के आयुक्त कामिनी जोशी और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राजेंद्र भानावत की अंतरिम रिपोर्ट में पहले से चल रहे होटलों, आसपास बड़े पैमाने पर पहाड़ियों की कटाई और उदयपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों में लागू नीति तथा निर्माण कानूनों की पर्याप्त जानकारी न होने का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार 2018 की नीति निजी एजेंसियों ने बनाई थी और पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, वन्यजीव तथा प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े वैधानिक विभागों से पर्याप्त सलाह नहीं ली गई। अदालत ने 28 जुलाई को मामले को पहाड़ी विकास और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी दो लंबित जनहित याचिकाओं के साथ सुनने का आदेश दिया।