राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, जैव संसाधनों तक पहुँच और लाभ-साझाकरण व्यवस्था के तहत अब तक वितरित राशि 200 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। इसी क्रम में प्राधिकरण ने 27 राज्य जैव विविधता बोर्डों और 5 केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों के लिए 8.23 करोड़ रुपये मंज़ूर किए हैं। यह राशि करेला, भिंडी, मिर्च और प्याज के जैव संसाधनों तक पहुँच तथा उनके उपयोग से मिली है।
बीज कंपनियों ने इन संसाधनों का अनुसंधान और व्यावसायिक काम में उपयोग किया था। संसाधन खुले बाज़ार या व्यापारियों से मिले थे, इसलिए किसी एक किसान, समुदाय या भौगोलिक स्रोत की पहचान नहीं हो सकी। ऐसी स्थिति में लाभार्थी हिस्से की राशि उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटी जा रही है, जहाँ संबंधित फ़सलें उगाई जाती हैं।
वितरण का आधार कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आँकड़ों में दर्ज संबंधित फ़सलों का क्षेत्रफल है। चारों फ़सलों को मिलाकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को सबसे अधिक राशि मिली है। सूची में इनके हिस्से क्रमशः 1,17,39,914 रुपये और 1,01,30,649 रुपये हैं। महाराष्ट्र की स्थिति का प्रमुख कारण भारत के प्याज क्षेत्रफल में उसकी 49% से अधिक हिस्सेदारी है।
राशि का इस्तेमाल जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32(2) में बताए गए कामों के लिए होना है। इनमें लोक जैव विविधता रजिस्टर तैयार करना और उन्हें अपडेट करना, संरक्षण, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली, जैव विविधता प्रबंधन समितियों को सहायता तथा सामुदायिक आजीविका में सुधार शामिल हैं। इस व्यवस्था से जैव संसाधनों के उपयोग का लाभ संरक्षण और समुदाय से जुड़े कामों तक पहुँचता है। नई मंज़ूर 8.23 करोड़ रुपये की राशि और अब तक के कुल वितरण का 200 करोड़ रुपये वाला आँकड़ा अलग-अलग हैं।
