4 सितंबर 2026 को अमर उजाला ने जयपुर से बताया कि राजस्थान शिक्षा विभाग ने श्रीगंगानगर और अलवर जिलों में विशेष शिक्षा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों से मुक्त करने के निर्देश जारी किए हैं। इन जिलों में संस्थान प्रधान अब ऐसे शिक्षकों को कार्यक्रमों और परीक्षाओं के प्रबंधन जैसे अतिरिक्त कामों में नहीं लगाएंगे।
विभाग का यह कदम उन विद्यार्थियों की बड़ी संख्या से जुड़ा है जिन्हें विशेष सहायता की ज़रूरत है। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 75 हजार से ज़्यादा विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। विभाग का मानना है कि शिक्षकों का समय गैर-शैक्षणिक कामों के बजाय इन बच्चों से जुड़े कार्यों पर लगना चाहिए।
जिला स्तर पर नियुक्त विशेष शिक्षा शिक्षक और रिसोर्स पर्सन अपने स्कूल के अलावा आसपास के क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी पढ़ाई में मदद देते हैं। समावेशी शिक्षा से जुड़ी उनकी जिम्मेदारियों में परिवहन, एस्कॉर्ट, रीडर और छात्रवृत्ति भत्ते की सुविधाएं संभालना शामिल है। विशेष सहायता की ज़रूरत वाले बच्चों की पहचान करना भी इनकी मुख्य जिम्मेदारी है।
राजस्थान प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विपिन प्रकाश शर्मा ने कहा कि विशेष शिक्षक स्कूल में बच्चों के व्यवहार को संभालने और उन्हें सहज बनाने में मदद करते हैं। स्कूल के बाद ब्लॉक स्तर पर तैनात शिक्षक अन्य बच्चों की पहचान कर उन्हें पढ़ाई से जोड़ते हैं, इसलिए उन पर अतिरिक्त बोझ नहीं होना चाहिए।
पिछले साल नवंबर में सरकार ने 242 विशेष शिक्षा शिक्षकों की भर्ती और पदोन्नति को वित्तीय मंज़ूरी दी थी, ताकि कक्षा 11 और 12 के विद्यार्थियों को भी विशेष शिक्षक मिलें। विभाग ने पहली बार विशेष शिक्षा शिक्षकों को व्याख्याता पद पर भर्ती और पदोन्नत किया है। इससे पहले वर्ष 2007 में ग्रेड-थर्ड और वर्ष 2015 में कक्षा 9 व 10 के लिए भर्तियां हुई थीं। नए निर्देशों के बाद इन शिक्षकों से उम्मीद है कि वे विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की शिक्षा, पहचान और सहायता पर ज़्यादा समय दें।
