भारत और न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्रियों ने 11 जुलाई 2026 को ऑकलैंड में मुलाकात की और भारत-न्यूज़ीलैंड रणनीतिक साझेदारी की स्थापना की घोषणा की। दोनों नेताओं ने अगले चार वर्षों की साझा रूपरेखा के रूप में "2030 तक की रूपरेखा" को स्वीकृति दी। इसे छह स्तंभों में बाँटा गया है — राजनीतिक एवं राजनयिक संपर्क; रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग; व्यापार एवं आर्थिक सहयोग; लोग, संस्कृति और खेल; शिक्षा, अनुसंधान, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा आपदा प्रबंधन; और क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय सहयोग।

व्यापार के मोर्चे पर दोनों देशों ने वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार 2030 तक दोगुना करके NZ$7 अरब (35,000 करोड़ रुपये) तक ले जाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। भारत-न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौते को जल्द लागू करने के लिए आगे के कदमों पर काम होगा। सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए 2024 की सीमा शुल्क सहयोग व्यवस्था (CCA) के तहत 2025 की अधिकृत आर्थिक संचालक पारस्परिक मान्यता व्यवस्था (AEO-MRA) को अमल में लाया जाएगा।

सुरक्षा सहयोग का केंद्र समुद्री क्षेत्र है। दोनों देश समुद्री सहयोग व्यवस्था, जल-सर्वेक्षण एवं नौवहन मानचित्रण की कार्यान्वयन व्यवस्था तथा पारस्परिक रसद सहायता व्यवस्था लागू करेंगे। हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) के समुद्री सुरक्षा स्तंभ के तहत भी समुद्री सहयोग बढ़ाया जाएगा। भारत के विदेश मंत्रालय और न्यूज़ीलैंड के विदेश एवं व्यापार मंत्रालय की अगुवाई में हर साल समुद्री सुरक्षा संवाद होगा। आतंकवाद-रोधी संयुक्त कार्य समूह बनाने वाली व्यवस्था को अमल में लाया जाएगा तथा भारत के राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) और न्यूज़ीलैंड पुलिस के बीच समझौते की दिशा में काम होगा।

अन्य प्रतिबद्धताओं में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन और आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के ज़रिए गहरा सहयोग; भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और न्यूज़ीलैंड की राष्ट्रीय आपात प्रबंधन एजेंसी (NEMA) के बीच सहयोग ज्ञापन; तथा संशोधित वायु सेवा समझौते के तहत सीधी उड़ानें शामिल हैं। दोनों पक्ष नियम-आधारित हिंद-प्रशांत, संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुरूप विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और सुधार के बाद बनने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन करते हैं। यह रूपरेखा अपने आप में कोई वित्तीय प्रतिबद्धता या कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार-दायित्व पैदा नहीं करती।