अव्यय — क्रिया-विशेषण, सम्बन्धबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक
मुख्य तथ्य
- अव्यय या अविकारी शब्द लिंग, वचन, पुरुष और काल के कारण अपना रूप नहीं बदलता।
- आरपीएससी उपनिरीक्षक में अव्यय के प्रश्न प्रायः वाक्य-स्तर की पहचान पर आधारित होते हैं, केवल परिभाषा पर नहीं।
- क्रिया-विशेषण क्रिया के बारे में कैसे, कब, कहाँ या कितना जैसे प्रश्नों का उत्तर देता है।
- रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कार्य की विधि बताता है, जैसे धीरे चला, स्पष्ट कहा या साहसपूर्वक लड़े।
- कालवाचक क्रिया-विशेषण समय बताता है, जैसे आज, अभी, प्रतिदिन, पहले या बाद में।
मुख्य बिंदु
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अव्यय या अविकारी शब्द लिंग, वचन, पुरुष और काल के कारण अपना रूप नहीं बदलता।
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आरपीएससी उपनिरीक्षक में अव्यय के प्रश्न प्रायः वाक्य-स्तर की पहचान पर आधारित होते हैं, केवल परिभाषा पर नहीं।
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क्रिया-विशेषण क्रिया के बारे में कैसे, कब, कहाँ या कितना जैसे प्रश्नों का उत्तर देता है।
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रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कार्य की विधि बताता है, जैसे धीरे चला, स्पष्ट कहा या साहसपूर्वक लड़े।
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कालवाचक क्रिया-विशेषण समय बताता है, जैसे आज, अभी, प्रतिदिन, पहले या बाद में।
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स्थानवाचक क्रिया-विशेषण क्रिया का स्थान या दिशा बताता है, जैसे यहाँ, बाहर, ऊपर या इधर।
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परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण मात्रा या तीव्रता बताता है, जैसे बहुत, कम, अत्यंत या लगभग।
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सम्बन्धबोधक अव्यय संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर के पास, के साथ, से पहले, के कारण, के लिए जैसे सम्बन्ध बनाता है।
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समुच्चयबोधक अव्यय शब्दों, पदबंधों, उपवाक्यों या वाक्यों को जोड़ता है और जोड़, विकल्प, विरोध, कारण, परिणाम, शर्त या रियायत दिखा सकता है।
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विस्मयादिबोधक अव्यय हर्ष, शोक, आश्चर्य, भय, घृणा आदि मनोभावों को स्वतंत्र रूप से प्रकट करता है।
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विस्मयादिबोधक चिह्न सहायक संकेत हो सकता है, पर केवल विराम-चिह्न से व्याकरणिक श्रेणी तय नहीं होती।
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निपात जैसे ही, भी और तो वाक्य में जुड़कर जोर, समावेश, विरोध या सीमा का भाव देते हैं।
हिन्दी व्याकरण में अव्यय क्या होता है?
हिन्दी व्याकरण में अव्यय वह अविकारी शब्द है जिसका रूप लिंग, वचन, पुरुष या काल बदलने पर भी नहीं बदलता। हिन्दी व्याकरण में अव्यय को अविकारी शब्द भी कहा जाता है। इसका मुख्य परीक्षण रूप की स्थिरता है: शब्द का रूप लिंग, वचन, पुरुष या काल के कारण नहीं बदलता। लड़का से लड़के हो सकता है, विशेषण संज्ञा के अनुसार बदल सकता है और क्रिया पुरुष, वचन, लिंग या काल के अनुसार रूप बदलती है। पर आज, यहाँ, ही, और, वाह या के लिए जैसे अव्यय आसपास के वाक्य के बदलने पर भी अपना रूप बनाए रखते हैं। इसलिए अविकारी का अर्थ यही है कि व्याकरणिक श्रेणियों के प्रभाव से शब्द में विकार नहीं आता।
आरपीएससी उपनिरीक्षक के लिए यह केवल परिभाषा याद करने वाला विषय नहीं है। पेपर प्रथम हिन्दी में अव्यय पदभेद के भीतर आता है और पिछले प्रश्नपत्रों में इसका परीक्षण वाक्य-स्तर पर दिखता है। राजस्थान लोक सेवा आयोग के उपनिरीक्षक/प्लाटून कमांडर संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा पाठ्यक्रम के अनुसार पेपर प्रथम हिन्दी में १०० वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं। प्रश्न यह हो सकता है कि किस वाक्य में अमुक प्रकार का अव्यय है, किस वाक्य में नहीं है, या निपात और विस्मयादिबोधक के बारे में दिया गया कथन सही है या नहीं। इसलिए असली कौशल यह है कि वाक्य में अव्यय को पहचानें और उसका कार्य बताएं। केवल प्रकारों की सूची रटने से ऐसे प्रश्न नहीं निकलते।
इस पाठ में व्यावहारिक वर्गीकरण जरूरी है। क्रिया-विशेषण क्रिया या क्रियात्मक स्थिति की रीति, समय, स्थान या परिमाण बताता है: वह धीरे चला, राम आज आया, सीता बाहर गई, वह बहुत पढ़ता है। सम्बन्धबोधक या संबंधसूचक अव्यय संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य के दूसरे भाग से सम्बन्ध दिखाता है: घर के पास, मित्र के साथ, काम से पहले, वर्षा के कारण, परीक्षा के लिए। समुच्चयबोधक शब्दों, पदबंधों, उपवाक्यों या वाक्यों को जोड़ता है: राम और श्याम आए, पढ़ो अथवा विश्राम करो, वह आया परंतु रुका नहीं, मैं नहीं गया क्योंकि वर्षा हो रही थी। विस्मयादिबोधक स्वतंत्र रूप से मनोभाव प्रकट करता है: वाह!, अरे!, हाय!, छिः!। निपात जोर, सीमा, विरोध या समावेश देता है: ही, भी, तो, तक, मात्र।
पहचान की सबसे सुरक्षित पद्धति तीन चरणों में रखें। पहले देखें कि कर्ता पुल्लिंग से स्त्रीलिंग, एकवचन से बहुवचन या भूतकाल से भविष्यत्काल होने पर वह शब्द बदलता है या नहीं। न बदले तो वह अव्यय हो सकता है। दूसरे, उसका वाक्यगत कार्य पूछें: क्या वह कैसे, कब, कहाँ या कितना का उत्तर देता है; क्या वह सम्बन्ध दिखाता है; क्या वह जोड़ता है; क्या वह मनोभाव व्यक्त करता है; या क्या वह केवल जोर अथवा सीमा जोड़ता है? तीसरे, अव्यय को पास के विकारी शब्दों से अलग करें। राम के साथ सीता भी गई में के साथ संबंधसूचक अव्यय है और भी निपात है; गई अव्यय नहीं है, क्योंकि क्रिया लिंग और काल के अनुसार बदलती है। यही सावधानी हर छोटे शब्द को एक ही प्रकार का अव्यय मानने की सामान्य गलती रोकती है।
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