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व्यवहार एवं विधि

मुख्य बिंदु

भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) — परिभाषाएँ एवं प्रमुख धाराएँ

पेपर III · इकाई 3 अनुभाग 1 / 15 PYQ-शैली 24 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग प्रीव्यू

मुख्य बिंदु

१. भारतीय न्याय संहिता २०२३ को २५ दिसंबर २०२३ को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह १ जुलाई २०२४ से प्रभावी हुई, लेकिन धारा १०६(२) को उस तारीख से लागू नहीं किया गया; इसने भारतीय दंड संहिता १८६० को प्रतिस्थापित किया — इस प्रकार १६४ वर्षों के औपनिवेशिक दंड कानून का अंत हुआ; भारतीय दंड संहिता के सभी अपराधों के भारतीय न्याय संहिता में समकक्ष प्रावधान हैं। गृह मंत्रालय के इंडिया कोड के अनुसार भारतीय न्याय संहिता २०२३ का अधिनियम क्रमांक ४५ है और प्रवर्तन तिथि १ जुलाई २०२४ दर्ज है।

२. भारतीय न्याय संहिता में ३५८ धाराएँ हैं (भारतीय दंड संहिता में ५११ थीं); यह कमी पुनर्गठन और समेकन के कारण है, न कि वास्तविक अपराधमुक्ति के कारण। उपलब्ध सरकारी प्रशिक्षण-सामग्री इसे नए अपराधों, आंशिक रूप से जोड़े गए प्रावधानों और हटाए गए औपनिवेशिक प्रावधानों के रूप में समझाती है; इसलिए परीक्षा में “धाराएँ कम हुईं, अपराध खत्म हो गए” जैसा निष्कर्ष नहीं लिखना है।

३. हत्या जो भारतीय दंड संहिता की धारा ३०२ में थी, अब भारतीय न्याय संहिता की धारा १०३ में है; मूल परिभाषा वही है — ऐसा आपराधिक मानव-वध जो हत्या की श्रेणी में आता है। दंड: मृत्युदंड या आजीवन कारावास एवं जुर्माना।

४. बलात्कार जो भारतीय दंड संहिता की धारा ३७५/३७६ में था, अब भारतीय न्याय संहिता की धारा ६३/६४ में है; एक प्रमुख संशोधन है — १८ वर्ष से कम आयु की महिला का सामूहिक बलात्कार (भारतीय न्याय संहिता धारा ७०(२)) जिसमें मृत्युदंड या शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास का प्रावधान है; वैवाहिक बलात्कार अपवाद अब धारा ६३ अपवाद २ में १८ वर्ष से अधिक आयु की पत्नी तक सीमित है।

५. संगठित अपराध अब भारतीय न्याय संहिता की धारा १११ के अंतर्गत एक स्वतंत्र अपराध है; पहले भारतीय दंड संहिता में कोई समकक्ष केंद्रीय प्रावधान नहीं था और संगठित अपराध को मकोका, राज्य कानूनों या यूएपीए जैसे विशेष कानूनों के ज़रिए नियंत्रित किया जाता था। यह धारा संगठित अपराध सिंडिकेट की ओर से हिंसा, धमकी, दबाव या अन्य अवैध माध्यमों से किए गए निरंतर अवैध कार्यों को कवर करती है।

६. आतंकवादी कृत्य अब भारतीय न्याय संहिता की धारा ११३ में है; पहले भारतीय दंड संहिता में आतंकवाद का कोई अलग प्रावधान नहीं था और ऐसे अपराधों पर मुख्यतः यूएपीए १९६७ के तहत अभियोग चलाया जाता था। भारतीय न्याय संहिता ११३ आपराधिक संहिता और आतंकवादी कृत्य के बीच सीधा संबंध स्थापित करती है।

७. हिट-एंड-रन के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा १०६(२) नया प्रावधान है जो लापरवाही से मृत्यु कारित करने के बाद घटनास्थल से भागने वाले चालकों को १० वर्ष तक के कारावास का दंड देती है; पर गृह मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि धारा १०६(२) को १ जुलाई २०२४ से लागू प्रावधानों से बाहर रखा गया था। धारा १०६(१) (लापरवाही से मृत्यु) पुराने भारतीय दंड संहिता धारा ३०४ए के समतुल्य है और अधिकतम ५ वर्ष का दंड देती है।

८. राजद्रोह — भारतीय दंड संहिता की धारा १२४ए — भारतीय न्याय संहिता में उसी नाम से बनाए नहीं रखा गया है। इसे भारतीय न्याय संहिता की धारा १५२ से प्रतिस्थापित किया गया है जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने, अलगाववादी गतिविधि, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को दंडित करती है।

९. संगठित अपराध से मृत्यु: भारतीय न्याय संहिता की धारा १११(२)(क) के अंतर्गत, संगठित अपराध के परिणामस्वरूप मृत्यु होने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास और कम-से-कम १० लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है — भारतीय दंड संहिता से एक महत्वपूर्ण सुधार। यह बहु-राज्यीय आपराधिक संगठनों और आर्थिक-साइबर अपराधी नेटवर्क को लक्षित करता है।

१०. सामुदायिक सेवा के रूप में दंड को भारतीय आपराधिक कानून में पहली बार भारतीय न्याय संहिता की धारा ४(च) के अंतर्गत दंडों की सूची में रखा गया है; धारा ३०३(२), ३५५, ३५६ और २२६ जैसे छोटे अपराधों में इसका उपयोग दिखता है। यह अल्पकालिक कारावास को सामाजिक रूप से उत्पादक विकल्पों से प्रतिस्थापित करती है।

११. डकैती जो भारतीय दंड संहिता की धारा ३९१ में थी, अब भारतीय न्याय संहिता की धारा ३१० में है; परिभाषा वही है — पाँच या अधिक व्यक्तियों द्वारा लूट करना या लूट का प्रयास करना। दंड: आजीवन कारावास या १० वर्ष तक का कठोर कारावास एवं जुर्माना। लूट भारतीय दंड संहिता धारा ३९० से भारतीय न्याय संहिता की धारा ३०९ में आ गई है।

१२. छोटे संगठित अपराध के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा ११२ नया अपराध है जो मोबाइल चोरी, चेन छीनना, संगठित जेबकतरी, वाहन से चोरी, टिकटों की अवैध बिक्री, अवैध सट्टा-जुआ, सार्वजनिक परीक्षा के प्रश्नपत्र बेचना और कार्ड स्किमिंग जैसी गिरोह-आधारित गतिविधियों को लक्षित करती है। पूर्व में ये साधारण चोरी या लूट मानी जाती थीं; अब संगठित गिरोह द्वारा किए जाने पर १ वर्ष से ७ वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।