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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

मुख्य बिंदु

सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता, आभासी/ई-अदालतें

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मुख्य बिंदु

इस अध्याय के मुख्य बिंदु सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अतिक्रमण और ई-अदालतों को परीक्षा-उपयोगी ढाँचे में जोड़ते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक इतिहास सामग्री के अनुसार न्यायाधीशों की संख्या १९५० में ८ से बढ़कर २०१९ में ३४ की वर्तमान स्वीकृत संख्या हुई।

१. सर्वोच्च न्यायालय — स्थापना

  • २८ जनवरी १९५० को अनुच्छेद १२४–१४७ के अंतर्गत स्थापित
  • मूल, अपीलीय और परामर्शदात्री अधिकारिता है
  • अंतिम अपीलीय न्यायालय और संविधान का संरक्षक

२. न्यायिक समीक्षा — संवैधानिक आधार

  • विधायी और कार्यकारी कृत्यों की संवैधानिक वैधता परखने की शक्ति
  • अनुच्छेद १३ के अंतर्गत निहित (मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून शून्य)
  • अनुच्छेद ३२/२२६ (रिट अधिकारिता) के अंतर्गत भी
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (१९७३) में संविधान की मूल संरचना का भाग घोषित

३. न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका — उद्भव

  • अधिकारों की रक्षा और शासन दायित्वों के प्रवर्तन में न्यायालयों की सक्रिय भूमिका
  • जनहित याचिका से सबसे अधिक दृश्यमान
  • १९७० के दशक के उत्तरार्ध में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा प्रारंभ

४. उच्च न्यायालय — मूल तथ्य

  • अनुच्छेद २१४–२३१ के अंतर्गत गठित
  • २०२६ तक भारत में २५ उच्च न्यायालय
  • नवीनतम: अमरावती में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (२०१९ में स्थापित)
  • प्रत्येक उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों पर मूल, अपीलीय और पर्यवेक्षी अधिकारिता

५. पाँच रिट — अनुच्छेद ३२ एवं २२६

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण — बंदी को प्रस्तुत करो (अवैध हिरासत से सुरक्षा)
  • परमादेश — कानूनी कर्तव्य पालन का आदेश
  • उत्प्रेषण — अवर न्यायाधिकरण के आदेश को अपास्त करो
  • प्रतिषेध — अवर न्यायाधिकरण को अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोको
  • अधिकार-पृच्छा — इस पद पर किस अधिकार से हो?

६. ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय निर्णय

  • शंकरी प्रसाद (१९५१) — संसद मौलिक अधिकार संशोधित कर सकती है
  • गोलकनाथ (१९६७) — संसद मौलिक अधिकार संशोधित नहीं कर सकती
  • केशवानंद भारती (१९७३) — मूल संरचना सिद्धांत स्थापित
  • मेनका गांधी (१९७८) — अनुच्छेद २१ को गरिमा तक विस्तारित किया
  • विशाखा (१९९७) — कार्यस्थल यौन उत्पीड़न दिशानिर्देश

७. ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना — तीन चरण

  • चरण एक (२०११–२०१५): जिला और अधीनस्थ न्यायालयों का कम्प्यूटरीकरण
  • चरण दो (२०१५–२०२३): राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, केस प्रबंधन प्रणाली, ई-फाइलिंग, संदेश अलर्ट
  • चरण तीन (२०२३–२०२७): बजट ७,२१० करोड़ रुपये — डिजिटल कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई, आईसीजेएस, कागज़रहित न्यायालय

८. वर्चुअल कोर्ट — कोविड-१९ और आगे

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोविड-१९ के दौरान मार्च २०२० में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई तेज हुई
  • ३१ अक्टूबर २०२४ तक जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों ने २,४८,२१,७८९ और उच्च न्यायालयों ने ९०,२१,६२९ मामले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुने; सर्वोच्च न्यायालय ने २३ मार्च २०२० से ४ जून २०२४ तक ७.५४ लाख से अधिक सुनवाई कीं
  • फास्टर प्रणाली न्यायालय आदेशों का जेलों और पुलिस तक डिजिटल प्रेषण सक्षम करती है

९. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड

  • सभी न्यायालयों में लंबित मामलों का वास्तविक समय डेटा प्रदान करता है
  • ११ जून २०२६ को राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड पर जिला न्यायालयों में ४,९४,३७,८५७ और उच्च न्यायालयों में ६४,२३,७१५ लंबित मामले दिखे; सर्वोच्च न्यायालय डेटा ग्रिड पर ९२,३१३ लंबित मामले दिखे
  • केस प्रबंधन प्रणाली मामले की प्रगति ट्रैक करती है
  • ई-फाइलिंग प्रणाली न्यायालय याचिकाओं का डिजिटल प्रस्तुतीकरण सक्षम करती है

१०. कॉलेजियम प्रणाली — विकास
- सर्वोच्च और उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया
- तीन न्यायाधीश मामलों से विकसित: एस.पी. गुप्ता (१९८२), सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (१९९३), राष्ट्रपति संदर्भ (१९९८)
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम (२०१४) को २०१५ में न्यायिक स्वतंत्रता (मूल संरचना) का उल्लंघन मानते हुए निरस्त किया गया

११. न्यायिक अतिक्रमण — अवधारणा
- जब न्यायालय विधायी या कार्यकारी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं
- न्यायिक सक्रियता से भिन्न
- उदाहरण: क्रिकेट प्रशासन का सूक्ष्म प्रबंधन (बीसीसीआई मामला), गड्ढे मरम्मत के आदेश, स्पीड गवर्नर अनिवार्य करना
- परीक्षा की मूल थीम: न्यायिक सक्रियता (अधिकार संरक्षण) बनाम न्यायिक अतिक्रमण (शक्ति पृथक्करण) का विवाद

१२. हालिया महत्त्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय निर्णय
- नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (२०१८) — समलैंगिकता अपराध-मुक्त (भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७)
- जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (२०१८) — व्यभिचार कानून निरस्त
- सबरीमला (२०१८) — सभी आयु की महिलाओं का प्रवेश
- इलेक्टोरल बॉन्ड्स मामला (२०२४) — योजना असंवैधानिक घोषित