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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

मुख्य बिंदु

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, संसद

पेपर III · इकाई 1 अनुभाग 1 / 11 PYQ-शैली 30 मिनट

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मुख्य बिंदु

इस नोट के मुख्य बिंदु राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और संसद की उन संवैधानिक भूमिकाओं को एक जगह बाँधते हैं जिनसे राजस्थान लोक सेवा आयोग के लघु और दीर्घ उत्तर बार-बार बनते हैं।

१. भारत के राष्ट्रपति — संवैधानिक प्रमुख (अनुच्छेद ५२)

  • अनुच्छेद ५२ के अंतर्गत संघीय कार्यपालिका के संवैधानिक प्रमुख
  • अनुच्छेद ५४ के अनुसार निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित
  • निर्वाचक मंडल = दोनों सदनों के निर्वाचित सांसद + राज्यों की विधानसभाओं और दिल्ली तथा पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक
  • निर्वाचन पद्धति: एकल संक्रमणीय मत के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व

२. राष्ट्रपति — कार्यकाल, पुनर्निर्वाचन और महाभियोग

  • अनुच्छेद ५६ के अंतर्गत ५ वर्ष के लिए पद धारण
  • किसी भी संख्या में पुनर्निर्वाचित हो सकते हैं (संविधान में कार्यकाल की कोई सीमा नहीं)
  • संविधान के उल्लंघन पर अनुच्छेद ६१ के अंतर्गत महाभियोग द्वारा हटाया जाता है
  • महाभियोग प्रस्ताव: किसी भी सदन में, १४ दिन की नोटिस के साथ, प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के दो-तिहाई से पारित

३. अनुच्छेद ७४ — मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह

  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य
  • ४४वें संशोधन १९७८ ने राष्ट्रपति को सलाह पुनर्विचार के लिए एक बार वापस भेजने का अधिकार दिया
  • यदि सलाह पुनः भेजी जाए तो राष्ट्रपति उस पर अवश्य कार्य करें — बाध्यकारी दायित्व
  • इससे भारत संसदीय लोकतंत्र है, न कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली

४. विधायी विषयों पर राष्ट्रपति की निषेधाधिकार शक्तियाँ

  • पूर्ण निषेधाधिकार — अनुमति रोककर विधेयक को समाप्त करना; साधारण विधेयकों पर लागू
  • पॉकेट निषेधाधिकार — अनुमति पर कोई निर्णय न देकर विधेयक को अनिश्चितकाल लंबित रखना
  • निलंबन निषेधाधिकार — साधारण विधेयक पुनर्विचार के लिए वापस भेजना; संसद पुनः पारित करके अभिभावी हो सकती है
  • संवैधानिक संशोधन विधेयक: अनुच्छेद ३६८ के अंतर्गत राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य; पुनर्विचार या पॉकेट निषेधाधिकार नहीं
  • धन विधेयक: पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेजा जा सकता; राज्य सभा भी इनमें संशोधन नहीं कर सकती

५. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ

  • राष्ट्रीय आपातकाल — अनुच्छेद ३५२: युद्ध, बाह्य आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न
  • राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद ३५६: किसी राज्य में संवैधानिक शासन विफल होने पर
  • वित्तीय आपातकाल — अनुच्छेद ३६०: भारत या किसी राज्य की वित्तीय स्थिरता के खतरे में होने पर
  • अनुच्छेद ३६० का भारत के इतिहास में कभी प्रयोग नहीं हुआ

६. उपराष्ट्रपति — राज्य सभा के पदेन सभापति

  • अनुच्छेद ६३–६९ उपराष्ट्रपति को नियंत्रित करते हैं; वे राज्य सभा के पदेन सभापति हैं
  • संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित (राज्य विधानसभाएँ नहीं)
  • राज्य सभा द्वारा पूर्ण बहुमत से पारित प्रस्ताव से, लोक सभा की सहमति से हटाया जाता है
  • राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं

७. प्रधानमंत्री — सरकार के प्रमुख और वास्तविक कार्यपालिका

  • अनुच्छेद ७५: प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख और वास्तविक कार्यपालिका प्राधिकरण
  • राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; राष्ट्रपति को लोक सभा में बहुमत दल/गठबंधन के नेता को नियुक्त करना होता है (संवैधानिक परंपरा)
  • राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, किंतु व्यावहारिक रूप से जब तक लोक सभा बहुमत हो तब तक शक्ति रहती है
  • प्रधानमंत्री किसी भी सदन से हो सकते हैं (जैसे डॉ. मनमोहन सिंह २००४–२०१४ में राज्य सभा से थे)

८. मंत्रिपरिषद — सामूहिक उत्तरदायित्व और आकार सीमा

  • अनुच्छेद ७४–७५ मंत्रिपरिषद को नियंत्रित करते हैं; अनुच्छेद ७५(३) के अंतर्गत लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी
  • प्रत्येक मंत्री राष्ट्रपति के प्रति व्यक्तिगत रूप से भी उत्तरदायी है
  • ९१वाँ संशोधन २००३: मंत्रिपरिषद का आकार लोक सभा की शक्ति के १५% से अधिक नहीं हो सकता
  • राज्य मंत्रिपरिषदों के लिए भी १५% की सीमा और न्यूनतम १२ सदस्य का नियम लागू होता है

९. संसद — संरचना और संघटन (अनुच्छेद ७९)

  • संसद में राष्ट्रपति + राज्य सभा (राज्यों की परिषद) + लोक सभा (जनता का सदन) शामिल हैं
  • राज्य सभा: अधिकतम २५० सदस्य (२३८ निर्वाचित + कला/विज्ञान/साहित्य/समाज सेवा के लिए राष्ट्रपति द्वारा १२ मनोनीत)
  • लोक सभा: अधिकतम ५५० निर्वाचित सदस्य; व्यवहार में ५४३ निर्वाचित सीटें
  • १०४वें संशोधन २०१९ ने लोक सभा से एंग्लो-इंडियन मनोनयन प्रावधान हटाया

१०. धन विधेयक — अनुच्छेद ११०
- केवल लोक सभा में पुरःस्थापित किए जा सकते हैं; राष्ट्रपति की अनुशंसा आवश्यक
- राज्य सभा केवल १४ दिनों के भीतर सिफारिश कर सकती है (संशोधन या अस्वीकृति नहीं)
- यदि राज्य सभा १४ दिन में कार्यवाही न करे तो विधेयक पारित माना जाता है
- अध्यक्ष का किसी विधेयक को धन विधेयक प्रमाणित करना अंतिम कहा गया है, पर न्यायिक समीक्षा की सीमा आधार और रोजर मैथ्यू मामलों के बाद विवादित है

११. विधायी प्रक्रिया — संयुक्त बैठक (अनुच्छेद १०८)
- विधेयक को दोनों सदनों से पारित होना और राष्ट्रपति की अनुमति मिलना आवश्यक है
- यदि दोनों सदनों के बीच साधारण विधेयक पर गतिरोध हो तो राष्ट्रपति अनुच्छेद १०८ के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुला सकते हैं
- संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा के अध्यक्ष करते हैं
- निर्णय उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों के बहुमत से — लोक सभा प्रायः राज्य सभा पर प्रभावी होती है

१२. कार्यपालिका की जवाबदेही के लिए संसदीय साधन
- प्रश्नकाल: प्रत्येक बैठक का पहला घंटा — तारांकित (मौखिक + अनुपूरक), अतारांकित (केवल लिखित), अल्पसूचना
- शून्यकाल: प्रश्नकाल के बाद; कोई पूर्व सूचना नहीं; अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्त्व के मामले; प्रक्रिया नियमों में नहीं
- ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव: अत्यावश्यक मामलों की ओर ध्यान खींचने के लिए
- अविश्वास प्रस्ताव (केवल लोक सभा); निंदा प्रस्ताव किसी विशेष मंत्री के विरुद्ध

१३. राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ (लोक सभा से साझा नहीं)
- अनुच्छेद २४९: राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर संसद को राज्य सूची विषय पर कानून बनाने में सक्षम कर सकती है (१ वर्ष तक वैध)
- अनुच्छेद ३१२: राज्य सभा दो-तिहाई प्रस्ताव द्वारा नई अखिल भारतीय सेवाएँ बना सकती है
- स्थायी सदन: भंग नहीं होता; लोक सभा के भंग होने पर भी संसद की निरंतरता सुनिश्चित करता है
- एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक २ वर्ष में सेवानिवृत्त; प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल ६ वर्ष

१४. संसदीय विशेषाधिकार — अनुच्छेद १०५
- सदस्यों को संसद में वाक्-स्वतंत्रता प्राप्त है; किसी न्यायालय में कार्यवाही पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता
- किसी भी सदस्य को सत्र के दौरान सिविल मामलों में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता (आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी संभव है)
- न्यायालय सामान्यतः संसदीय कार्यवाहियों की प्रक्रियागत वैधता की जाँच नहीं करते — विधायी स्वतंत्रता की सुरक्षा
- ये विशेषाधिकार दोनों सदनों और उनकी समितियों पर लागू होते हैं