धार्मिक आंदोलन एवं दर्शन (प्राचीन एवं मध्यकालीन)
मुख्य तथ्य
- - आस्तिक (वेद-स्वीकारक): न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा, वेदांत — नास्तिक (वेद-अस्वीकारक): बौद्ध, जैन, चार्वाक
- - जन्म: लुम्बिनी, नेपाल (लगभग 563 ई.पू.) — ज्ञान प्राप्ति: बोध गया, पीपल वृक्ष के नीचे — प्रथम उपदेश (धम्मचक्कप्रवत्तन सुत्त): सारनाथ
- - महावीर (लगभग 599–527 ई.पू.), 24वें तीर्थंकर, कुंडग्राम (वैशाली, बिहार) में जन्मे — तीन रत्न: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र
- - विभाजन कनिष्क के अधीन चौथी बौद्ध संगीति (लगभग 100 ई., कुंडलवन, कश्मीर) में हुआ
- - शंकराचार्य (लगभग 788–820 ई.) ने अद्वैत वेदांत की स्थापना की — मूल शिक्षा: एकमात्र ब्रह्म सत्य है; आत्मा ब्रह्म के समान है; जगत् माया है
मुख्य बिंदु
- 1
- आस्तिक (वेद-स्वीकारक): न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा, वेदांत
- नास्तिक (वेद-अस्वीकारक): बौद्ध, जैन, चार्वाक
- सभी छह आस्तिक दर्शन वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करते हैं
- यह वर्गीकरण RPSC 2021 में सीधे पूछा गया था (2 अंक)
- 2
- जन्म: लुम्बिनी, नेपाल (लगभग 563 ई.पू.)
- ज्ञान प्राप्ति: बोध गया, पीपल वृक्ष के नीचे
- प्रथम उपदेश (धम्मचक्कप्रवत्तन सुत्त): सारनाथ
- महापरिनिर्वाण: कुशीनगर (लगभग 483 ई.पू.)
- 3
- चार आर्य सत्य: दुःख, समुदय, निरोध, मार्ग
- अष्टांगिक मार्ग: सम्यक् दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्मान्त, आजीव, व्यायाम, स्मृति, समाधि
- प्रतीत्यसमुत्पाद: सभी घटनाएँ परस्पर आश्रय से उत्पन्न होती हैं
- ये तीनों सभी बौद्ध विद्यालयों की दार्शनिक नींव हैं
- 4
- महावीर (लगभग 599–527 ई.पू.), 24वें तीर्थंकर, कुंडग्राम (वैशाली, बिहार) में जन्मे
- तीन रत्न: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र
- पाँच महाव्रत: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
- महावीर ने पार्श्वनाथ के चार व्रतों में ब्रह्मचर्य जोड़ा
- 5
- विभाजन कनिष्क के अधीन चौथी बौद्ध संगीति (लगभग 100 ई., कुंडलवन, कश्मीर) में हुआ
- हीनयान (थेरवाद): रूढ़िवादी, व्यक्तिगत मुक्ति, पाली ग्रंथ, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया
- महायान: बोधिसत्व आदर्श, संस्कृत ग्रंथ, पूर्व एशिया में प्रसार
- तीसरा स्कूल वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) 5वीं–7वीं शती में उत्तर-पूर्व भारत में उभरा
- 6
- शंकराचार्य (लगभग 788–820 ई.) ने अद्वैत वेदांत की स्थापना की
- मूल शिक्षा: एकमात्र ब्रह्म सत्य है; आत्मा ब्रह्म के समान है; जगत् माया है
- चार मठों की स्थापना: श्रृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), पुरी (पूर्व), बद्रीनाथ (उत्तर)
- उन्होंने भारत भर में दार्शनिक वाद-विवाद में बौद्ध प्रभाव को पराजित किया
- 7
- रामानुज (लगभग 1017–1137 ई.) ने विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन किया
- विशिष्टाद्वैत: ब्रह्म सत्य है; व्यक्तिगत आत्माएँ और जगत् ब्रह्म के वास्तविक अंश हैं, मायिक नहीं
- माधव (लगभग 1238–1317 ई.) ने द्वैत का प्रतिपादन किया
- द्वैत: ईश्वर (विष्णु) और जीव नित्य भिन्न हैं — कभी अभिन्न नहीं
- 8
- 6वीं–17वीं शती की अखिल भारतीय भक्ति क्रांति
- ईश्वर तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण: जाति की बाधाएँ और पुरोहित एकाधिकार को चुनौती
- लोकभाषाओं का उपयोग; कर्मकांड की जगह व्यक्तिगत भक्ति पर जोर
- मुख्य धाराएँ: शैव (नयनमार, तमिलनाडु), वैष्णव (अलवार; वारकरी, महाराष्ट्र), निर्गुण (कबीर, नानक)
- 9
- इस्लामी रहस्यवाद — ईश्वर प्रेम, आंतरिक शुद्धि और वजूद की एकता पर जोर
- चिश्ती सिलसिले के साथ 11वीं–12वीं शती में भारत में प्रवेश
- चिश्ती: मोइनुद्दीन चिश्ती, अजमेर (1143–1236); प्रेम और सेवा पर जोर
- सुहरावर्दी (पंजाब/सिंध); कादिरी; नक्शबंदी — अन्य प्रमुख सिलसिले
- RPSC 2021 में सुहरावर्दी सिलसिले का सीधे प्रश्न पूछा गया
- 10
- दोनों 6वीं–9वीं शती में तमिलनाडु में विकसित हुए
- 12 अलवार (वैष्णव): नालायिर दिव्य प्रबंधम — 4,000 तमिल भजन
- 63 नयनमार (शैव): तेवारम (तिरुमुरई की प्रथम 7 पुस्तकें)
- RPSC 2023 में सीधे पूछा गया (5 अंक)
- 11
- वाराणसी के जुलाहे-संत (लगभग 1440–1518); हिंदू कर्मकांड और इस्लामी कट्टरता दोनों को चुनौती दी
- निर्गुण भक्ति का प्रचार — निराकार ईश्वर की भक्ति — हिंदू-मुस्लिम विभाजन पाटने का प्रयास
- दोहे अवधी-ब्रजभाषा में रचे; आदि ग्रंथ और बीजक में संकलित
- उनकी शिक्षाओं ने जाति को आध्यात्मिक रूप से निरर्थक बताया
- 12
- दिल्ली सल्तनत के दरबारी कवि-संगीतकार (1253–1325); निजामुद्दीन औलिया के शिष्य (चिश्ती सिलसिला)
- ख्याल (शास्त्रीय संगीत रूप) और कव्वाली (भक्ति संगीत) के विकास का श्रेय
- सितार और तबला के विकास का भी श्रेय दिया जाता है
- हिंदू-इस्लामी परंपराओं का सबसे महत्त्वपूर्ण संगीत संश्लेषण
परिचय एवं संदर्भ
अवलोकन
धार्मिक आंदोलन और दर्शन भारत की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा को समझने की केंद्रीय कुंजी हैं, क्योंकि इन्हीं से वेदांत, बौद्ध-जैन विचार, भक्ति और सूफी समन्वय की मुख्य धाराएँ निकलीं। वैदिक दार्शनिक परंपरा (लगभग १०००–५०० ई.पू.) से लेकर भक्ति एवं सूफी आंदोलनों (६वीं–१७वीं शती) तक भारत ने आध्यात्मिक जिज्ञासा की एक अटूट परंपरा को जन्म दिया। इस परंपरा ने केवल धर्म को नहीं, बल्कि कला, साहित्य, वास्तुकला, संगीत और सामाजिक संगठन को भी गहराई से आकार दिया। RPSC मुख्य परीक्षा के आधिकारिक पाठ्यक्रम में लिखित परीक्षा के ४ पेपर हैं और हर पेपर २०० अंकों का है; इसी ढाँचे में पेपर १ की भारतीय इतिहास-संस्कृति इकाई में “प्राचीन और मध्यकालीन भारत में धार्मिक आंदोलन और धार्मिक दर्शन“ शामिल है।
परीक्षा में महत्त्व
RPSC मुख्य परीक्षा के पिछले प्रश्न विश्लेषण में यह विषय प्रत्येक वर्ष आया है — पेपर १, इकाई १ का सर्वाधिक नियमित एकल विषय।
- २०२१: एक २-अंकी प्रश्न में चार आस्तिक दर्शनों की जाँच हुई; दूसरे में सुहरावर्दी सूफी सिलसिले की
- २०२३: एक ५-अंकी प्रश्न में नयनमार और अलवार भक्ति संतों की चर्चा हुई
- यह विषय २,५०० वर्षों का फलक समेटे है — प्रश्न किसी भी बिंदु पर केंद्रित हो सकते हैं: एक दार्शनिक, धार्मिक विद्यालय, सूफी सिलसिला अथवा भक्ति संत
परीक्षा रणनीति
५-अंकी प्रश्नों के लिए: तिथि और स्थान सहित ३–४ विशिष्ट उदाहरण तैयार रखो।
१०-अंकी प्रश्नों के लिए: तुलनात्मक ढाँचे का उपयोग करो: पृष्ठभूमि → मूल दर्शन → सामाजिक प्रभाव → साहित्यिक/कलात्मक विरासत।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों के नाम लिखिए और संक्षेप में समझाइए।
आदर्श उत्तर
छह आस्तिक दर्शन वैदिक प्रामाणिकता स्वीकार करते हैं: न्याय (गौतम) — तर्क और 4 प्रमाण; वैशेषिक (कणाद) — परमाणुवाद; सांख्य (कपिल) — पुरुष-प्रकृति द्वैत; योग (पतंजलि) — अष्टांग साधना मार्ग; मीमांसा (जैमिनि) — वैदिक कर्मकांड; वेदांत (बादरायण) — ब्रह्म-आत्मा संबंध। तीन नास्तिक दर्शन (बौद्ध, जैन, चार्वाक) वैदिक सत्ता को अस्वीकार करते हैं।
~50 शब्द • 5 अंक
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