मुख्य तथ्य

  • गजवंश के शासक सर्वतात की मुख्य जानकारी चित्तौड़गढ़ जिले के नगरी ग्राम के समीप मिले घोसुण्डी शिलालेख से प्राप्त होती है।
  • घोसुण्डी शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख है।
  • इस अभिलेख में सर्वतात द्वारा संकर्षण और वासुदेव के पूजन-स्थल के चारों ओर प्रस्तर की परिकोट-भित्ति बनवाने का उल्लेख है।
  • घोसुण्डी अभिलेख राजस्थान में वैष्णव उपासना और संकर्षण-वासुदेव पूजा का प्राचीन अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है।
  • अभिलेख में सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ के सम्पादन का उल्लेख उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और वैदिक राजसत्ता के दावे को दिखाता है।

मुख्य बिंदु

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    गजवंश के शासक सर्वतात की मुख्य जानकारी चित्तौड़गढ़ जिले के नगरी ग्राम के समीप मिले घोसुण्डी शिलालेख से प्राप्त होती है।

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    घोसुण्डी शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख है।

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    इस अभिलेख में सर्वतात द्वारा संकर्षण और वासुदेव के पूजन-स्थल के चारों ओर प्रस्तर की परिकोट-भित्ति बनवाने का उल्लेख है।

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    घोसुण्डी अभिलेख राजस्थान में वैष्णव उपासना और संकर्षण-वासुदेव पूजा का प्राचीन अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है।

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    अभिलेख में सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ के सम्पादन का उल्लेख उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और वैदिक राजसत्ता के दावे को दिखाता है।

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    संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि के कारण घोसुण्डी अभिलेख राजस्थान के प्राचीन राजनीतिक, धार्मिक और लिपिकीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

गजवंश के सर्वतात और घोसुण्डी अभिलेख से क्या जानकारी मिलती है?

गजवंश के सर्वतात और घोसुण्डी अभिलेख से क्या जानकारी मिलती है?

गजवंश के शासक सर्वतात के बारे में मुख्य जानकारी चित्तौड़गढ़ जिले के नगरी ग्राम के समीप मिले घोसुण्डी शिलालेख से मिलती है, जिसमें उनके संकर्षण-वासुदेव पूजन-स्थल और अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख सुरक्षित है। एएसआई की १९२१-२२ की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार घोसुण्डी पत्थर-लेख संकर्षण और वासुदेव, इन दो वैष्णव देव-रूपों का उल्लेख करता है और प्रारम्भिक वैष्णव इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है।

गजवंश के शासक सर्वतात की लगभग समस्त जानकारी चित्तौड़गढ़ जिले के नगरी ग्राम के समीप मिले घोसुण्डी शिलालेख से प्राप्त होती है। यह अभिलेख किसी सामान्य दान या प्रशस्ति तक सीमित नहीं है; इससे सर्वतात की धार्मिक नीति, वैदिक प्रतिष्ठा और राजस्थान में प्रारम्भिक वैष्णव उपासना के प्रमाण एक साथ सामने आते हैं। इसलिए राजस्थान के प्राचीन इतिहास में सर्वतात को समझने के लिए घोसुण्डी अभिलेख मुख्य आधार माना जाता है।

अभिलेखीय विवरण

पक्ष विवरण
अभिलेख घोसुण्डी शिलालेख
प्राप्ति-स्थान चित्तौड़गढ़ जिले के नगरी ग्राम के समीप
भाषा संस्कृत भाषा
लिपि ब्राह्मी लिपि
काल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व
संबंधित शासक गजवंश के शासक सर्वतात

धार्मिक कृत्य

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में संस्कृत भाषा तथा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण यह लेख इस राजा के दो धार्मिक कृत्यों को सुरक्षित रखता है। इन दोनों कृत्यों से स्पष्ट होता है कि सर्वतात केवल स्थानीय सत्ता का नाम नहीं था, बल्कि वह धार्मिक वैधता और राजनीतिक प्रतिष्ठा को जोड़कर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा था।

१. संकर्षण-वासुदेव पूजन-स्थल: उन्होंने संकर्षण अर्थात् बलराम तथा वासुदेव के पूजन-स्थल को घेरकर प्रस्तर की परिकोट-भित्ति निर्मित करवाई। यह उल्लेख बताता है कि संकर्षण-वासुदेव की पूजा राजस्थान में ईसा पूर्व काल तक पहुँचती थी और पूजन-स्थल को स्थायी पत्थर की घेराबंदी से सुरक्षित या प्रतिष्ठित किया गया था।
२. अश्वमेध यज्ञ: उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन किया, जिसे वैदिक परम्परा सार्वभौम सत्ता पर अधिकार जताने वाले शासकों के लिए ही निर्धारित मानती थी। इसलिए अभिलेख में अश्वमेध का उल्लेख सर्वतात की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और वैदिक राजसत्ता के दावे को समझने में बहुत उपयोगी है।

ऐतिहासिक महत्त्व

  • घोसुण्डी अभिलेख राजस्थान की भूमि पर वैष्णव उपासना का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य है।
  • संकर्षण-वासुदेव पूजन को यहाँ ईसा पूर्व काल तक ले जाता है।
  • सर्वतात के अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख यह संकेत देता है कि उस समय स्थानीय शासक भी वैदिक कर्मकाण्ड के माध्यम से सार्वभौम सत्ता का दावा स्थापित करना चाहते थे।
  • संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे होने के कारण यह अभिलेख राजस्थान के प्राचीन राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ धार्मिक और लिपिकीय इतिहास के लिए भी महत्त्वपूर्ण स्रोत बन जाता है।