उर्दू
मुख्य तथ्य
- पेपर-द्वितीय उर्दू में 150 बहुविकल्पीय प्रश्न, 300 अंक, 2 घंटे 30 मिनट और गलत उत्तर पर एक-तिहाई ऋणात्मक अंकन है।
- उर्दू इतिहास को दकनी, दिल्ली, लखनऊ, 1857, अलीगढ़, रोमांटिक, प्रगतिशील और आधुनिकतावादी चरणों में व्यवस्थित करें।
- 1857 के बाद उर्दू का केंद्र दरबारी संरक्षण से हटकर मुद्रण, सुधारवादी गद्य, शिक्षा, पत्रकारिता और सार्वजनिक बहस की ओर बढ़ा।
मुख्य बिंदु
- 1
पेपर-द्वितीय उर्दू में 150 बहुविकल्पीय प्रश्न, 300 अंक, 2 घंटे 30 मिनट और गलत उत्तर पर एक-तिहाई ऋणात्मक अंकन है।
- 2
पाठ्यक्रम विद्यालय-स्तर की भाषा-दक्षता, स्नातक-स्तर के साहित्य, उर्दू साहित्य-इतिहास और शिक्षण-विधियों को साथ लेकर चलता है।
- 3
लिपि की तैयारी में जुड़े हुए अक्षर-रूप, बिंदियाँ, महाप्राण संकेत, हम्जा, नून-गुन्ना, वर्तनी और आधुनिक विराम-चिह्न शामिल करें।
- 4
व्याकरण को प्रयोग से पढ़ें: लिंग, वचन, काल, कारक-संबंध, परसर्ग, वाक्य-संशोधन, मुहावरे और कहावतें प्रमुख हैं।
- 5
बलागत में तशबीह, इस्तिआरा, किनाया, ईहाम, तल्मीह, तजाद और मुबालगा जैसे अलंकार उदाहरणों से पहचानने चाहिए।
- 6
अरूज में बहर, वजन, रुक्न, रदीफ, काफिया, मतला, मकता, मिसरा, शेर और तखल्लुस की कार्यगत समझ जरूरी है।
- 7
गजल, कसीदा, मर्सिया, मसनवी, नज्म और गद्य-विधाओं को परिभाषा, संरचना, उद्देश्य और प्रतिनिधि लेखक से जोड़कर दोहराएँ।
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उर्दू इतिहास को दकनी, दिल्ली, लखनऊ, 1857, अलीगढ़, रोमांटिक, प्रगतिशील और आधुनिकतावादी चरणों में व्यवस्थित करें।
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1857 के बाद उर्दू का केंद्र दरबारी संरक्षण से हटकर मुद्रण, सुधारवादी गद्य, शिक्षा, पत्रकारिता और सार्वजनिक बहस की ओर बढ़ा।
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लेखक-रचना पहचान के लिए शास्त्रीय कवि, आधुनिक कवि, सुधारवादी गद्यकार, अफसाना लेखक, उपन्यासकार और आलोचक अलग-अलग समूहों में पढ़ें।
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राजस्थान संबंध में अजमेर, जयपुर, जोधपुर, टोंक और कोटा जैसे केंद्रों के साथ संस्थाएँ, पांडुलिपियाँ, मुशायरे और उर्दू शिक्षा शामिल हैं।
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उर्दू शिक्षण में सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना चारों कौशलों के साथ गद्य, पद्य, व्याकरण, पाठ-योजना और मूल्यांकन की विधियाँ पूछी जाती हैं।
वरिष्ठ अध्यापक उर्दू प्रश्नपत्र की बनावट और तैयारी कैसे समझें?
वरिष्ठ अध्यापक उर्दू प्रश्नपत्र की तैयारी को प्रश्नपत्र की बनावट, भाषा-दक्षता, साहित्य और शिक्षण-विधि को एक साथ जोड़कर समझना चाहिए। राजस्थान लोक सेवा आयोग के वरिष्ठ अध्यापक द्वितीय श्रेणी उर्दू पाठ्यक्रम के अनुसार संबंधित विषय की शिक्षण-विधि के लिए ४० अंक निर्धारित हैं। वरिष्ठ अध्यापक परीक्षा में उर्दू कोई संकीर्ण भाषा-विषय नहीं है। प्रश्नपत्र-द्वितीय पूरा विषय-प्रश्नपत्र है: १५० बहुविकल्पीय प्रश्न, ३०० अंक, समय २ घंटे ३० मिनट और गलत उत्तर पर एक-तिहाई ऋणात्मक अंकन। इसलिए तैयारी केवल व्याकरण दोहराने या प्रसिद्ध शायरों के नाम याद करने तक सीमित नहीं रह सकती। गंभीर अभ्यर्थी को विद्यालय-स्तर की भाषा-दक्षता, स्नातक-स्तर का साहित्यिक ज्ञान, उर्दू का इतिहास, अलंकार और छंद, राजस्थान से जुड़ा योगदान तथा शिक्षण-विधियों को एक साथ जोड़कर पढ़ना होगा। परीक्षा एक ही क्रम में वर्तनी-नियम, अलंकार, साहित्यिक विधा, १८५७ का प्रभाव, लेखक-रचना मिलान या कविता पढ़ाने की उपयुक्त कक्षा-पद्धति पूछ सकती है।
पाठ्यक्रम तीन बड़े स्तरों में समझना चाहिए। पहला स्तर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक उर्दू की भाषा-दक्षता है: लिपि, लेखन-परंपरा, अक्षर और ध्वनियाँ, वर्तनी, विराम-चिह्न, गद्य-पठन, पद्य-पठन, मुहावरे, कहावतें और सामान्य व्याकरण। यह भाग अधिक अंकदायी है, क्योंकि यहाँ छोटे तथ्य और सूक्ष्म भेद निर्णायक होते हैं। उर्दू अक्षर कैसे जुड़ते हैं, बिंदियों से अक्षर कैसे बदलते हैं, महाप्राण और मूर्धन्य ध्वनियों का संकेत कैसे होता है, तथा अरबी-फारसी शब्द-संपदा वर्तनी को कैसे प्रभावित करती है, इन बातों का नियमित अभ्यास चाहिए। पठन-बोध केवल अर्थ बताने का अभ्यास नहीं है; उसमें भाव, संकेत, व्यंजना, मुहावरेदार प्रयोग और विराम-चिह्न की उपयुक्तता भी पूछी जा सकती है।
दूसरा स्तर साहित्य का है। इसमें अलंकार, छंद, साहित्यिक विधाएँ, साहित्य-इतिहास और लेखक शामिल हैं। उर्दू साहित्य में अरबी-फारसी पारिभाषिक शब्द खूब मिलते हैं, पर उसका विकास भारतीय परिवेश में हुआ, विशेषकर गजल, मर्सिया, मसनवी, कसीदा, नज्म, दास्तान, उपन्यास, अफसाना, निबंध, खाका, नाटक, आत्मकथा, पत्र और यात्रा-वृत्तांत जैसी विधाओं के माध्यम से। केवल परिभाषाएँ याद करना कमजोर तैयारी है। हर विधा को उसकी रचना-रूपरेखा, उद्देश्य और प्रमुख रचनाकारों से जोड़ें: गजल को शेर, मतला, मकता, रदीफ और काफिया से; मर्सिया को करबला-शोक और लखनऊ परंपरा से; मसनवी को कथात्मक दोहों से; कसीदे को प्रशंसा या व्यंग्य से; और नज्म को विषयगत एकता तथा आधुनिक सामाजिक अभिव्यक्ति से।
तीसरा स्तर शिक्षाशास्त्र है। वरिष्ठ अध्यापक से अपेक्षा केवल साहित्य-विद्यार्थी जैसी नहीं, भावी कक्षा-शिक्षक जैसी होती है। शिक्षण-विधि के प्रश्न पूछते हैं कि सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना कैसे विकसित किया जाए; गद्य-पाठ और पद्य-पाठ की योजना में क्या अंतर होगा; व्याकरण को नियम रटाकर नहीं, उदाहरण और प्रयोग से कैसे पढ़ाया जाए; श्यामपट्ट-कार्य, प्रश्नोत्तर, व्याख्या और प्रदर्शन को किस क्रम में रखा जाए; तथा मूल्यांकन स्मरण-शक्ति के बजाय भाषा-कौशल को कैसे जाँचे। तैयारी करते समय यह मूल ढाँचा सामने रखें: भाषा की शुद्धता आधार देती है, साहित्य विषय की पहचान बनाता है, और शिक्षण-विधि उस ज्ञान को कक्षा में उपयोगी बनाती है।
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