अर्थ, क्षेत्र एवं कक्षा-स्थितियों में शिक्षक हेतु निहितार्थ
मुख्य तथ्य
- शैक्षिक मनोविज्ञान मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को शिक्षण-अधिगम, विद्यार्थी-विकास, कक्षा-व्यवहार, अभिप्रेरणा, मूल्यांकन और समायोजन में लागू करता है।
- सामान्य मनोविज्ञान व्यवहार का व्यापक अध्ययन करता है, जबकि शैक्षिक मनोविज्ञान उसी व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं को शैक्षिक स्थितियों में देखता है।
- इसका क्षेत्र विद्यार्थी की विशेषताओं, वृद्धि-विकास, अधिगम प्रक्रिया, अभिप्रेरणा, बुद्धि, सृजनशीलता, व्यक्तित्व, वैयक्तिक भिन्नताओं, मानसिक स्वास्थ्य,…
- विकास की समझ शिक्षक को आयु-उपयुक्त शिक्षण योजना बनाने और अनुचित अपेक्षाओं से बचने में मदद करती है।
- अभिप्रेरणा भय पर नहीं, बल्कि प्रासंगिकता, संभव चुनौती, प्रतिपुष्टि, कोशिश की पहचान और आत्मविश्वास पर आधारित होनी चाहिए।
मुख्य बिंदु
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शैक्षिक मनोविज्ञान मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को शिक्षण-अधिगम, विद्यार्थी-विकास, कक्षा-व्यवहार, अभिप्रेरणा, मूल्यांकन और समायोजन में लागू करता है।
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सामान्य मनोविज्ञान व्यवहार का व्यापक अध्ययन करता है, जबकि शैक्षिक मनोविज्ञान उसी व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं को शैक्षिक स्थितियों में देखता है।
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इसका क्षेत्र विद्यार्थी की विशेषताओं, वृद्धि-विकास, अधिगम प्रक्रिया, अभिप्रेरणा, बुद्धि, सृजनशीलता, व्यक्तित्व, वैयक्तिक भिन्नताओं, मानसिक स्वास्थ्य, कक्षा-वातावरण और आकलन तक फैला है।
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विकास की समझ शिक्षक को आयु-उपयुक्त शिक्षण योजना बनाने और अनुचित अपेक्षाओं से बचने में मदद करती है।
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अभिप्रेरणा भय पर नहीं, बल्कि प्रासंगिकता, संभव चुनौती, प्रतिपुष्टि, कोशिश की पहचान और आत्मविश्वास पर आधारित होनी चाहिए।
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कक्षा-प्रबंधन दंड से व्यापक है; इसमें दिनचर्या, जुड़ाव, स्पष्ट अपेक्षाएँ, सहपाठी वातावरण और समान प्रतिक्रिया शामिल हैं।
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आकलन का प्रयोग पूर्वज्ञान, भ्रांति, सीखने की कमी और उपचारात्मक या समृद्धि-कार्य की जरूरत पहचानने के लिए निदानात्मक रूप से होना चाहिए।
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त्रुटियाँ शिक्षण-निर्णय का प्रमाण हैं; पूरी कक्षा की दोहराई त्रुटि पुनः शिक्षण मांगती है और व्यक्तिगत त्रुटि लक्षित सहारा मांगती है।
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धीमे विद्यार्थी को छोटे चरण, दोहराव, ठोस उदाहरण और सहायक प्रतिपुष्टि चाहिए; प्रतिभाशाली विद्यार्थी को समृद्धि और उच्च-स्तरीय कार्य चाहिए।
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प्रभावी शिक्षण में उद्देश्य, विधि, सामग्री, मूल्यांकन, परामर्शी दृष्टि और चिंतनशील सुधार का आपसी मेल जरूरी है।
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समावेशी कक्षा-वातावरण गरिमा की रक्षा करता है, भागीदारी बढ़ाता है, वैयक्तिक भिन्नताओं का सम्मान करता है और अनावश्यक चिंता घटाता है।
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परीक्षा में क्षेत्र और निहितार्थ अलग पहचानें: क्षेत्र वह है जिसका अध्ययन होता है, निहितार्थ वह है जो शिक्षक को करना चाहिए।
शैक्षिक मनोविज्ञान का अर्थ और प्रकृति क्या है?
शैक्षिक मनोविज्ञान का अर्थ विद्यार्थी, अधिगम प्रक्रिया और शैक्षिक परिस्थिति का वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक अध्ययन है, और इसकी प्रकृति कक्षा-निर्णयों को मनोवैज्ञानिक प्रमाण से जोड़ने वाली है। शैक्षिक मनोविज्ञान विद्यार्थी, अधिगम प्रक्रिया और शैक्षिक परिस्थिति का व्यवस्थित अध्ययन है। वरिष्ठ अध्यापक भर्ती परीक्षा में इसका अर्थ कक्षा-कार्य से जोड़कर समझना चाहिए। राजस्थान लोक सेवा आयोग के वरिष्ठ अध्यापक प्रथम प्रश्नपत्र की आधिकारिक योजना में शैक्षिक मनोविज्ञान के लिए ४० अंक रखे गए हैं। यह मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग शिक्षण-अधिगम, विद्यार्थी के विकास, कक्षा-व्यवहार, अभिप्रेरणा, मूल्यांकन और समायोजन में करता है। सामान्य मनोविज्ञान व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं को व्यापक रूप में पढ़ता है; शैक्षिक मनोविज्ञान इन्हीं प्रक्रियाओं को विद्यालय, कक्षा, सहपाठी समूह, परीक्षा-स्थिति और शिक्षक-विद्यार्थी संबंध में देखता है। यह शिक्षण-शास्त्र का विकल्प नहीं है, बल्कि उसे मनोवैज्ञानिक आधार देता है, ताकि शिक्षक की विधि, सामग्री, प्रश्न, प्रतिपुष्टि और अनुशासन विद्यार्थी के वास्तविक बढ़ने, सोचने, महसूस करने, याद रखने, भूलने, सहयोग करने, विरोध करने और सुधरने के ढंग से जुड़े रहें।
इसकी प्रकृति वैज्ञानिक भी है और व्यावहारिक भी। वैज्ञानिक इसलिए कि यह व्यवहार का अवलोकन करता है, विकास, अधिगम, अभिप्रेरणा, बुद्धि, व्यक्तित्व और आकलन से प्रमाण लेता है तथा केवल निजी अनुमान पर निर्भर नहीं रहता। व्यावहारिक इसलिए कि इसकी अंतिम कसौटी खाली सिद्धांत नहीं, बल्कि बेहतर कक्षा-निर्णय है। उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक जानता है कि ध्यान लगातार एक जैसा नहीं रहता, तो वह विद्यार्थियों की चंचलता को केवल लापरवाही नहीं मानेगा। वह गतिविधि बदलेगा, उद्देश्यपूर्ण प्रश्न पूछेगा, उदाहरणों को पूर्वज्ञान से जोड़ेगा और देखेगा कि काम बहुत आसान, बहुत कठिन या अस्पष्ट तो नहीं है। इसी तरह चिंता को समझने वाला शिक्षक यह फर्क करेगा कि विद्यार्थी को ज्ञान नहीं है या भय के कारण वह प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है। यही इस विषय का कक्षा-मूल्य है।
शैक्षिक मनोविज्ञान बच्चे को एक विकसित होते पूरे व्यक्तित्व के रूप में देखता है। संज्ञानात्मक विकास से उदाहरण समझने, समस्या हल करने और सीखे हुए ज्ञान को नई स्थिति में लगाने की क्षमता प्रभावित होती है। सामाजिक विकास सहयोग, सहपाठी स्वीकृति, भागीदारी और अनुशासन से जुड़ता है। भावनात्मक विकास आत्मविश्वास, चिंता, रुचि, निराशा सहने की क्षमता और समायोजन को प्रभावित करता है। नैतिक और भाषायी विकास नियम-पालन, निष्पक्षता, अभिव्यक्ति और संवाद से जुड़े हैं। शारीरिक विकास थकान, बैठने की व्यवस्था, लिखावट, सक्रियता और कार्य में भागीदारी पर असर डालता है। इसलिए विद्यार्थी को केवल अंकों तक सीमित नहीं किया जा सकता। कम अंक कमजोर पूर्वज्ञान, खराब अध्ययन-आदत, भाषा-कठिनाई, विषय-भय, ध्यान की कमी, पारिवारिक तनाव या शिक्षण-गति और तैयारी के बीच असंगति के कारण भी आ सकते हैं।
इसकी प्रकृति सीमित शैक्षिक अर्थ में मानक-निर्देशक भी है। यह केवल यह नहीं पूछता कि विद्यार्थी क्या कर रहा है, बल्कि यह भी पूछता है कि कौन-सी शैक्षिक प्रतिक्रिया उसे वांछित विकास की ओर ले जाएगी। इसलिए अभिप्रेरणा, पुनर्बलन, प्रतिपुष्टि, उपचारात्मक शिक्षण, समावेशी कक्षा-वातावरण और परामर्शी दृष्टिकोण इस विषय में आते हैं। शिक्षक से अपेक्षा है कि वह मनोवैज्ञानिक समझ का नैतिक उपयोग करे: प्रोत्साहित करने, निदान करने, सहारा देने और मार्गदर्शन करने के लिए; न कि ठप्पा लगाने या अपमानित करने के लिए। बार-बार त्रुटि होने पर शिक्षक को त्रुटि का ढंग पहचानकर सुधार-योजना बनानी चाहिए। तेज विद्यार्थी काम जल्दी पूरा कर दे, तो उसे केवल अनुशासन की समस्या मानने के बजाय समृद्धि-कार्य देना चाहिए। धीमा विद्यार्थी पीछे हट रहा हो, तो छोटे और संभव चरणों से उसका विश्वास बनाना चाहिए।
वरिष्ठ अध्यापक प्रथम प्रश्नपत्र के सिलेबस में प्रकृति, क्षेत्र और प्रभावी शिक्षण के निहितार्थ वाला भाग महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि प्रश्न केवल परिभाषा नहीं, बल्कि कक्षा-स्थिति में शिक्षक की प्रतिक्रिया भी पूछ सकते हैं। सही उत्तर प्रायः सिद्धांत को कार्य से जोड़ता है: विद्यार्थी को जानना, आयु के अनुसार उद्देश्य बनाना, तैयारी के अनुसार विधि चुनना, सार्थक लक्ष्यों से प्रेरित करना, भय के बिना व्यवहार संभालना, निदानात्मक ढंग से मूल्यांकन करना और समावेशी वातावरण बनाना। इस अर्थ में शैक्षिक मनोविज्ञान विषय-ज्ञान और विद्यार्थी-ज्ञान के बीच पुल है।
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