संवैधानिक इतिहास — भारत शासन अधिनियम 1919 एवं 1935
मुख्य तथ्य
- 1919 और 1935 अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में नियंत्रित औपनिवेशिक प्रतिनिधित्व से संविधान सभा तक की कड़ियाँ हैं।
- भारत शासन अधिनियम 1919 ने मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को कानून बनाया और प्रांतों में द्वैध शासन शुरू किया।
- 1919 में आरक्षित विषय गवर्नर और कार्यकारिणी परिषद के पास रहे, जबकि हस्तांतरित विषय निर्वाचित सदस्यों से बने मंत्रियों को दिए गए।
- 1919 अधिनियम ने केंद्र में राज्य परिषद और विधान सभा वाला द्विसदनीय विधानमंडल बनाया, पर केंद्रीय कार्यपालिका उत्तरदायी नहीं बनी।
- 1919 का मताधिकार बहुत सीमित था; संपत्ति, कर, शिक्षा और अन्य योग्यताएँ मतदाता बनने की शर्त थीं।
मुख्य बिंदु
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1919 और 1935 अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में नियंत्रित औपनिवेशिक प्रतिनिधित्व से संविधान सभा तक की कड़ियाँ हैं।
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भारत शासन अधिनियम 1919 ने मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को कानून बनाया और प्रांतों में द्वैध शासन शुरू किया।
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1919 में आरक्षित विषय गवर्नर और कार्यकारिणी परिषद के पास रहे, जबकि हस्तांतरित विषय निर्वाचित सदस्यों से बने मंत्रियों को दिए गए।
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1919 अधिनियम ने केंद्र में राज्य परिषद और विधान सभा वाला द्विसदनीय विधानमंडल बनाया, पर केंद्रीय कार्यपालिका उत्तरदायी नहीं बनी।
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1919 का मताधिकार बहुत सीमित था; संपत्ति, कर, शिक्षा और अन्य योग्यताएँ मतदाता बनने की शर्त थीं।
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भारत शासन अधिनियम 1935 ने अखिल भारतीय संघ की योजना दी, पर देशी रियासतों के सम्मिलन के अभाव में वह संघ लागू नहीं हुआ।
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1935 अधिनियम ने प्रांतीय द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता दी, पर गवर्नरों की विशेष और विवेकाधीन शक्तियाँ बनी रहीं।
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1935 में केंद्र के लिए द्वैध शासन प्रस्तावित था, पर लागू नहीं हुआ; यह RPSC-शैली के कथन-प्रश्नों का सामान्य भ्रम है।
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संघीय न्यायालय 1935 अधिनियम से जुड़ा था और 1937 से 1950 तक कार्य करता रहा; सर्वोच्च न्यायालय उससे अलग संवैधानिक संस्था है।
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भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 के तहत कार्य शुरू किया; संविधान ने उसे नहीं बनाया।
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संविधान ने संघीय सूचियों, लोक सेवा आयोगों और संस्थागत ढाँचे की उपयोगी विरासत ली, पर औपनिवेशिक विवेकाधीन नियंत्रण अस्वीकार किए।
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1909 = पृथक निर्वाचक मंडल, 1919 = प्रांतीय द्वैध शासन, साइमन आयोग = समीक्षा, 1935 = प्रांतीय स्वायत्तता, 1947 = सत्ता-हस्तांतरण।
१९१९ और १९३५ के अधिनियमों को संवैधानिक विकास में कैसे पढ़ें?
१९१९ और १९३५ के भारत शासन अधिनियमों को संवैधानिक विकास में दो जुड़ी हुई कड़ियों की तरह पढ़ना चाहिए, क्योंकि पहला अधिनियम सीमित प्रांतीय उत्तरदायित्व का प्रयोग था और दूसरा अधिनियम प्रांतीय स्वायत्तता व संघीय रूपरेखा का बड़ा औपनिवेशिक खाका था। भारत शासन अधिनियम १९१९ और १९३५ को अलग-अलग ब्रिटिश कानून मानकर नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक विकास की दो जुड़ी हुई कड़ियों के रूप में पढ़ना चाहिए। राज्यसभा सचिवालय के संविधान सभा विवरण के अनुसार विभाजन के बाद संविधान सभा की सदस्य-संख्या २९९ थी; यह आँकड़ा दिखाता है कि औपनिवेशिक सुधारों की सीमित प्रतिनिधि व्यवस्था अंततः भारतीयों के अपने संविधान-निर्माण तक पहुँची। १९१९ का अधिनियम अगस्त १९१७ की मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद आया। उस घोषणा में भारत में स्वशासी संस्थाओं के क्रमिक विकास और ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई थी। यह भाषा महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि अब बात केवल प्रशासनिक सलाह-मशविरे की नहीं रही; सीमित राजनीतिक विकास का वादा भी सरकारी शब्दावली में आ गया। इसी आधार पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रस्ताव कानून बने और प्रांतों में भारतीय भागीदारी का नियंत्रित प्रयोग शुरू हुआ।
१९३५ का अधिनियम १९१९ की व्यवस्था से भारतीय जनमत की असंतुष्टि, साइमन आयोग, गोलमेज सम्मेलनों और ब्रिटिश श्वेतपत्र प्रक्रिया के बाद आया। साइमन आयोग १९२७ में १९१९ की व्यवस्था की समीक्षा के लिए नियुक्त किया गया था, पर उसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए उसका व्यापक बहिष्कार हुआ और 'साइमन वापस जाओ' का नारा चला। फिर भी उसकी रिपोर्ट ने आगे की संवैधानिक रूपरेखा को प्रभावित किया। उसने प्रांतीय स्वायत्तता, प्रांतीय द्वैध शासन की समाप्ति और संघीय विचार का समर्थन किया, पर केंद्र में पूर्ण संसदीय उत्तरदायित्व स्वीकार नहीं किया। यही बातें १९३५ के अधिनियम की धुरी बनीं।
परीक्षा के लिए क्रम साफ रखें: भारतीय परिषद अधिनियम १९०९ ने विधान परिषदों का विस्तार किया और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल शुरू किए; भारत शासन अधिनियम १९१९ ने प्रांतों में द्वैध शासन और अधिक विकसित केंद्रीय विधानमंडल दिया; साइमन आयोग ने १९१९ की व्यवस्था की समीक्षा की; भारत शासन अधिनियम १९३५ ने अखिल भारतीय संघ की योजना और प्रांतीय स्वायत्तता दी; भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ ने सत्ता-हस्तांतरण और विभाजन की कानूनी रूपरेखा बनाई। संविधान सभा दिसंबर १९४६ में कैबिनेट मिशन योजना के तहत बनी और उसी ने वह लोकतांत्रिक संविधान बनाया जो २६ जनवरी १९५० को लागू हुआ।
इसलिए औपनिवेशिक सुधारों से संविधान सभा तक की यात्रा नियंत्रित प्रतिनिधित्व से संप्रभु संविधान-निर्माण तक की यात्रा थी। ब्रिटिश सुधारों ने विधानमंडल, विषय-सूचियाँ, लोक सेवा आयोग, न्यायालय, निर्वाचन-व्यवस्था और संघीय विचार जैसी संस्थागत शब्दावली दी, पर जनसत्ता नहीं दी। वास्तविक शक्ति सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, गवर्नर-जनरल, गवर्नरों और आपात शक्तियों से सुरक्षित रखी गई। संविधान सभा ने उपयोगी संस्थागत ढाँचे अपनाए, पर औपनिवेशिक तर्क को अस्वीकार किया। सीमित उत्तरदायी शासन को संसदीय लोकतंत्र में, नियंत्रित प्रांतीय स्वायत्तता को संवैधानिक संघवाद में, और अधिकारों व न्यायिक समीक्षा को साम्राज्यिक विवेक की जगह स्वतंत्र संविधान के अधीन रखा गया। मुख्य निष्कर्ष यही है: १९१९ और १९३५ संस्थाओं के पूर्वज हैं, पर पूर्ण लोकतांत्रिक वैधता के स्रोत नहीं।
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