महाद्वीप, महासागर एवं उनकी विशेषताएँ; वैश्विक पवन तंत्र
मुख्य तथ्य
- क्षेत्रफल के घटते क्रम में महाद्वीप हैं: एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया।
- आकार के घटते क्रम में महासागर हैं: प्रशांत, अटलांटिक, हिंद, दक्षिणी और आर्कटिक।
- उत्तरी गोलार्ध में स्थल अधिक और दक्षिणी गोलार्ध में महासागर अधिक हैं; इससे तापांतर, पवनों और महासागरीय परिसंचरण पर असर पड़ता है।
- एशिया में हिमालय, तिब्बती पठार, मानसूनी मैदान, मरुस्थल और बड़े नदी बेसिन सहित सबसे अधिक भौतिक और जलवायु विविधता है।
- अफ्रीका पठार-प्रधान महाद्वीप है, जिसे भूमध्य रेखा और दोनों उष्णकटिबंधीय रेखाएँ काटती हैं;
मुख्य बिंदु
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क्षेत्रफल के घटते क्रम में महाद्वीप हैं: एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया।
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आकार के घटते क्रम में महासागर हैं: प्रशांत, अटलांटिक, हिंद, दक्षिणी और आर्कटिक।
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उत्तरी गोलार्ध में स्थल अधिक और दक्षिणी गोलार्ध में महासागर अधिक हैं; इससे तापांतर, पवनों और महासागरीय परिसंचरण पर असर पड़ता है।
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एशिया में हिमालय, तिब्बती पठार, मानसूनी मैदान, मरुस्थल और बड़े नदी बेसिन सहित सबसे अधिक भौतिक और जलवायु विविधता है।
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अफ्रीका पठार-प्रधान महाद्वीप है, जिसे भूमध्य रेखा और दोनों उष्णकटिबंधीय रेखाएँ काटती हैं; इसमें वर्षावन, सवाना, मरुस्थल और भूमध्यसागरीय जलवायु पट्टियाँ साफ दिखती हैं।
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प्रशांत सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर है; मारियाना खाई और खाई-द्वीपीय चाप तंत्र इसके किनारों की प्रमुख पहचान हैं।
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अटलांटिक को उसके घुमावदार बेसिन और मध्य-अटलांटिक कटक से पहचाना जाता है; गल्फ स्ट्रीम और उत्तरी अटलांटिक प्रवाह पश्चिमी यूरोप की जलवायु को सम बनाते हैं।
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हिंद महासागर पर मानसूनी पवनों का गहरा प्रभाव है, विशेषकर इसलिए कि इसका उत्तरी भाग एशिया से घिरा है।
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सीमांत सागर, जलडमरूमध्य और नहरें मानचित्र में उच्च-उपयोगी विषय हैं, क्योंकि वे भौतिक भूगोल को व्यापार, नौवहन और सामरिक महत्त्व से जोड़ते हैं।
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भूमध्य रेखा से ध्रुव की ओर दाब-पट्टियों का क्रम है: भूमध्यरेखीय निम्न दाब, उपोष्ण उच्च दाब, उपध्रुवीय निम्न दाब और ध्रुवीय उच्च दाब।
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व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर, पछुआ पवनें उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर और ध्रुवीय पूर्वी पवनें ध्रुवीय उच्च दाब से बाहर की ओर चलती हैं।
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कोरिऑलिस बल चलती वायु को उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मोड़ता है; यह पवन शुरू नहीं करता, केवल दिशा बदलता है।
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अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र मौसमी रूप से खिसकता है और उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टियों तथा भारतीय मानसून को समझने में केंद्रीय भूमिका रखता है।
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गर्म महासागरीय धाराएँ सामान्यतः तटीय ऊष्मा और नमी बढ़ाती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ शुष्क तट, कुहासा और समृद्ध मत्स्य क्षेत्रों से जुड़ सकती हैं।
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उपजाऊ मैदानों, नदी घाटियों, मानसूनी पट्टियों और तटीय-बंदरगाह क्षेत्रों में बसावट घनी होती है; मरुस्थल, ध्रुवीय क्षेत्र, ऊँचे पर्वत और घने भूमध्यरेखीय वन विरल बसावट रखते हैं।
विश्व मानचित्र में महाद्वीप, महासागर और गोलार्ध कैसे समझें?
विश्व मानचित्र में महाद्वीप, महासागर और गोलार्ध को सही ढंग से समझने का तरीका यह है कि सात महाद्वीपों, पाँच महासागरों, प्रमुख अक्षांशीय रेखाओं, गोलार्धों और मार्ग-द्वारों को एक जुड़े हुए पृथ्वी-तंत्र के रूप में रखा जाए। नासा पृथ्वी आँकड़ा पोर्टल के अनुसार पृथ्वी की सतह का लगभग ७१ प्रतिशत भाग जल से ढका है, इसलिए मानचित्र पढ़ते समय स्थल और जल के असमान वितरण को साथ-साथ देखना जरूरी है। इस विषय की शुरुआत मानचित्र की रूपरेखा से करनी चाहिए, क्योंकि परीक्षा में अक्सर पहले यह परखा जाता है कि विद्यार्थी किसी भौगोलिक तत्व को सही जगह रख पा रहा है या नहीं। पृथ्वी को सामान्यतः सात महाद्वीपों और पाँच महासागरों के आधार पर पढ़ा जाता है। क्षेत्रफल के घटते क्रम में महाद्वीप हैं: एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया। आकार के घटते क्रम में महासागर हैं: प्रशांत, अटलांटिक, हिंद, दक्षिणी और आर्कटिक। यह क्रम सीधे क्रम-प्रश्न, मिलान-प्रश्न और मानचित्र आधारित विलोपन में बार-बार काम आता है।
स्थल और जल का वितरण समान नहीं है। उत्तरी गोलार्ध में विश्व का अधिकांश स्थलभाग आता है; इसमें लगभग पूरा यूरोप और उत्तरी अमेरिका, एशिया और अफ्रीका का बड़ा भाग तथा दक्षिणी अमेरिका का उत्तरी भाग शामिल है। दक्षिणी गोलार्ध अधिक महासागरीय है; इसमें ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका के दक्षिणी भाग तथा प्रशांत, हिंद और दक्षिणी महासागर के विशाल विस्तार आते हैं। जलवायु के लिए यह अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि स्थल जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है, जबकि महासागर तापमान को संतुलित करते हैं और ऊष्मा संचित रखते हैं। इसी कारण महाद्वीपीय आंतरिक भागों में वार्षिक तापांतर अधिक और समुद्री किनारों पर जलवायु अपेक्षाकृत सम रहती है।
पूर्वी गोलार्ध में एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और यूरोप का अधिकांश भाग तथा हिंद महासागर का बड़ा क्षेत्र आता है। पश्चिमी गोलार्ध में दोनों अमेरिका तथा प्रशांत और अटलांटिक के बड़े भाग आते हैं। भूमध्य रेखा दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया को काटती है, पर यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका को नहीं। कर्क रेखा उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया से होकर गुजरती है और भारत भी इसी में आता है; मकर रेखा दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया को काटती है। आर्कटिक वृत्त उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के उत्तरी किनारों से गुजरता है, जबकि अंटार्कटिक वृत्त अंटार्कटिका महाद्वीप को घेरे रहता है। ये अक्षांशीय रेखाएँ स्थिति को ताप कटिबंधों, दाब-पट्टियों और पवनों से जोड़ने में मदद करती हैं।
मानचित्र पहचान केवल नामों से नहीं, सीमाओं और पड़ोस से करनी चाहिए। एशिया के उत्तर में आर्कटिक महासागर, पूर्व में प्रशांत महासागर और दक्षिण में हिंद महासागर है। अफ्रीका को भूमध्य रेखा लगभग बीच से काटती है; इसके पश्चिम में अटलांटिक और पूर्व में हिंद महासागर है। उत्तरी अमेरिका मुख्यतः उत्तरी और पश्चिमी गोलार्ध में है; इसके उत्तर में आर्कटिक, पूर्व में अटलांटिक और पश्चिम में प्रशांत महासागर है। दक्षिणी अमेरिका दक्षिण की ओर केप हॉर्न की तरफ सँकरा होता जाता है और इसके पश्चिमी किनारे पर एंडीज पर्वत है। अंटार्कटिका दक्षिणी ध्रुव के आसपास स्थित है और दक्षिणी महासागर से घिरा है। यूरोप यूरेशिया का पश्चिमी प्रायद्वीपीय भाग है, जबकि ऑस्ट्रेलिया सबसे छोटा महाद्वीप है और पूरा दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है।
दूसरी उपयोगी आदत है मार्ग-द्वारों को पहचानना। बेरिंग जलडमरूमध्य एशिया और उत्तरी अमेरिका को अलग करता है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य अटलांटिक को भूमध्य सागर से जोड़ता है। स्वेज नहर भूमध्य सागर और लाल सागर के रास्ते यूरोप को हिंद महासागर मार्ग से जोड़ती है। पनामा नहर मध्य अमेरिका में अटलांटिक और प्रशांत को जोड़ती है। मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर मार्ग को दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत से जोड़ता है। इसी कारण भूगोल के प्रश्नों में महाद्वीप, महासागर, व्यापार मार्ग और सामरिक महत्त्व साथ-साथ पूछे जाते हैं।
उच्चावच भी इसी मानचित्र रूपरेखा में बैठता है। महाद्वीपों में प्राचीन ढाल, मैदान, पठार, वलित पर्वत, मरुस्थल और नदी बेसिन मिलते हैं। महासागरों में महाद्वीपीय मग्नतट, ढाल, अतल मैदान, मध्य-महासागरीय कटक, खाइयाँ और द्वीपीय चाप पाए जाते हैं। स्थल का सबसे ऊँचा बिंदु माउंट एवरेस्ट एशिया में है; महासागर का सबसे गहरा ज्ञात बिंदु चैलेंजर डीप पश्चिमी प्रशांत की मारियाना खाई में है। इसलिए अच्छा उत्तर महाद्वीपों और महासागरों को अलग-अलग डिब्बों की तरह नहीं पढ़ता, बल्कि एक पृथ्वी-तंत्र के रूप में देखता है, जहाँ स्थलरूप, घेरता हुआ जल, पवनें, धाराएँ, मानव बसावट और परिवहन मार्ग एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
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