मुख्य तथ्य

  • समाजशास्त्र अलग-थलग व्यक्ति के बजाय प्रतिमानबद्ध सामाजिक संबंधों, संस्थाओं, अर्थों और परिवर्तन का अध्ययन करता है।
  • पश्चिम में समाजशास्त्र आधुनिक औद्योगिक और राजनीतिक परिवर्तनों से विकसित हुआ, जबकि भारत में यह जाति, गाँव, जनजाति, नातेदारी, सुधार और संवैधानिक प्रश्नो…
  • समाज संबंधों का जाल है, समुदाय में स्थानीयता और अपनत्व जुड़ता है, संस्था स्थापित प्रतिमान है और संघ किसी उद्देश्य से बनाया गया संगठित समूह है।
  • ग्रामीण और नगरीय समुदायों को कठोर विभाजन से अधिक ग्रामीण-नगरीय सातत्य के रूप में समझना भारतीय संदर्भ में उपयोगी है।
  • परिवार, विवाह और नातेदारी प्रजनन, देखभाल, उत्तराधिकार, गठबंधन, समाजीकरण और भूमिका-अपेक्षाओं को व्यवस्थित करते हैं।

मुख्य बिंदु

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    समाजशास्त्र अलग-थलग व्यक्ति के बजाय प्रतिमानबद्ध सामाजिक संबंधों, संस्थाओं, अर्थों और परिवर्तन का अध्ययन करता है।

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    पश्चिम में समाजशास्त्र आधुनिक औद्योगिक और राजनीतिक परिवर्तनों से विकसित हुआ, जबकि भारत में यह जाति, गाँव, जनजाति, नातेदारी, सुधार और संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा रहा।

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    समाज संबंधों का जाल है, समुदाय में स्थानीयता और अपनत्व जुड़ता है, संस्था स्थापित प्रतिमान है और संघ किसी उद्देश्य से बनाया गया संगठित समूह है।

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    ग्रामीण और नगरीय समुदायों को कठोर विभाजन से अधिक ग्रामीण-नगरीय सातत्य के रूप में समझना भारतीय संदर्भ में उपयोगी है।

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    परिवार, विवाह और नातेदारी प्रजनन, देखभाल, उत्तराधिकार, गठबंधन, समाजीकरण और भूमिका-अपेक्षाओं को व्यवस्थित करते हैं।

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    संस्कृति सीखी और साझा की जाती है; धर्म पवित्र से जुड़ी व्यवस्था है, जबकि जादू विशेष परिणाम पाने की नियंत्रक तकनीक पर बल देता है।

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    सामाजिक परिवर्तन, गतिशीलता, सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष को कारण, प्रक्रिया और संस्थागत परिणामों से समझाना चाहिए।

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    भारतीय सामाजिक संरचना जाति, वर्ग, लिंग, जनजाति, धर्म, क्षेत्र, नातेदारी और राज्य की परतों से बनी है।

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    समाजीकरण में कूली का दर्पणवत् आत्म, मीड का सामान्यीकृत अन्य और फ्रायड की व्यक्तित्व-संरचना अक्सर अवधारणा-मिलान में पूछी जाती है।

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    जनांकिकीय रूपरेखा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आयु, लिंग-संरचना, साक्षरता, प्रवासन और ग्रामीण-नगरीय वितरण संस्थाओं और नीति-जरूरतों को प्रभावित करते हैं।

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    शोध-पद्धति में सर्वेक्षण, निदर्शन, अवलोकन, साक्षात्कार, अनुसूची, प्रश्नावली और परिकल्पना के अंतर बार-बार पूछे जाते हैं।

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    कॉम्ट, स्पेंसर, दुर्खीम, वेबर, मार्क्स, श्रीनिवास और आंबेडकर को उनके मूल सिद्धांतों और भारतीय उदाहरणों के साथ याद करना चाहिए।

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    समाजशास्त्र शिक्षण में किशोर अनुभव, कक्षा-संचार, शिक्षण प्रतिमान, शिक्षण-अधिगम सामग्री, सहकारी अधिगम, सूचना-संचार तकनीक और आकलन तकनीक को जोड़ा जाता है।

समाजशास्त्र समाज को कैसे समझता है?

समाजशास्त्र समाज को सामाजिक संबंधों, संस्थाओं, संस्कृति, स्तरीकरण और परिवर्तन के व्यवस्थित अध्ययन से समझता है। समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन है। यह देखता है कि मनुष्य संबंध कैसे बनाते हैं, संस्थाएँ कैसे टिकती हैं, अर्थ और नियम कैसे बनते हैं, लोग नियमों का पालन या प्रतिरोध कैसे करते हैं और सामूहिक जीवन में परिवर्तन कैसे आता है। स्कूल व्याख्याता समाजशास्त्र में पहली जरूरत अवधारणात्मक स्पष्टता है। समाजशास्त्र समाज पर सामान्य बातचीत नहीं है; यह अवधारणाओं, प्रमाण, तुलना और तर्क से प्रतिमानबद्ध व्यवहार को समझता है। इसका विषय-क्षेत्र सामाजिक क्रिया, समूह, संस्था, संस्कृति, स्तरीकरण, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक समस्याएँ और सामाजिक शोध पद्धति तक फैला है। इसका क्षेत्र व्यापक है क्योंकि समाज परिवार, काम, धर्म, राजनीति, शिक्षा, बाजार व्यवहार और डिजिटल अंतःक्रिया तक मौजूद रहता है। फिर भी इसकी विशिष्ट दृष्टि व्यक्ति को अलग इकाई मानने के बजाय सामाजिक संबंधों और सामाजिक संदर्भ पर रहती है। जनगणना २०११ के अनुसार राजस्थान की कुल आबादी ६,८५,४८,४३७ थी, इसलिए समाजशास्त्र में समाज को केवल अमूर्त शब्द नहीं, बल्कि बड़े और विविध जनसमूहों के संबंध-जाल के रूप में पढ़ना पड़ता है।

पश्चिम में समाजशास्त्र का विकास प्रबोधन, औद्योगिक क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति और आधुनिक विज्ञान के उदय से जुड़ा था। इन परिवर्तनों ने धार्मिक और सामंती व्यवस्था की पुरानी व्याख्याओं को चुनौती दी। चिंतकों ने पूछा कि औद्योगिक नगरों में नए वर्ग, गरीबी, नौकरशाही, व्यक्तिवाद और राजनीतिक संघर्ष क्यों उभर रहे हैं। ऑगस्त कॉम्ट ने इस अनुशासन को नाम दिया और प्रत्यक्षवाद पर बल दिया। बाद में स्पेंसर ने समाज की तुलना जीव से की, दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों और एकजुटता का अध्ययन किया, वेबर ने अर्थपूर्ण सामाजिक क्रिया और प्रभुत्व को समझाया, तथा मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष को सामाजिक परिवर्तन के केंद्र में रखा। भारत में समाजशास्त्र उपनिवेशकालीन नृवंश-वर्णनों, जनगणना श्रेणियों, भारतविद्या, सामाजिक सुधार-विमर्श, ग्राम अध्ययन, जाति अध्ययन और विश्वविद्यालयी विभागों से विकसित हुआ। भारतीय समाजशास्त्र को जाति, जनजाति, गाँव, नातेदारी, धर्म, औपनिवेशिक कानून, राष्ट्रवादी सुधार, विकास और संवैधानिक समानता से लगातार संवाद करना पड़ा।

समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से जुड़ा है, पर उनसे समान नहीं है। इतिहास समय के साथ परिवर्तन, क्रम और दस्तावेजों पर अधिक केंद्रित रहता है; समाजशास्त्र इतिहास का उपयोग करते हुए यह पूछता है कि सामाजिक संरचनाएँ और प्रक्रियाएँ कैसे काम करती हैं। राजनीति-विज्ञान राज्य, शक्ति, नागरिकता और शासन संस्थाओं का अध्ययन करता है; समाजशास्त्र परिवार, जाति, लिंग, वर्ग, समुदाय और अनौपचारिक जालों में शक्ति को भी देखता है। अर्थशास्त्र उत्पादन, वितरण और उपभोग पर केंद्रित है; समाजशास्त्र पूछता है कि बाजार स्थिति, भरोसा, जाति, लिंग और मूल्यों से कैसे आकार लेते हैं। मनोविज्ञान व्यक्ति के मन और व्यवहार पर अधिक ध्यान देता है, जबकि समाजशास्त्र व्यक्तित्व, भूमिका और मानदंडों के सामाजिक निर्माण को समझता है। सामाजिक मानवशास्त्र समाजशास्त्र के बहुत निकट है क्योंकि दोनों संस्कृति, नातेदारी, जनजाति और समुदाय का अध्ययन करते हैं; अंतर इतना है कि मानवशास्त्र परंपरागत रूप से छोटे समुदायों के गहन क्षेत्र-अध्ययन से विकसित हुआ।

कुछ आधारभूत अवधारणाएँ अलग-अलग समझना जरूरी है। समाज सामाजिक संबंधों और संस्थाओं का व्यापक जाल है। यह केवल भीड़ या भौतिक भू-क्षेत्र नहीं है; इसमें अंतःक्रिया, परस्पर निर्भरता, मानदंड, निरंतरता और सामाजिक व्यवस्था की अनुभूति होती है। समुदाय निश्चित स्थानीयता में रहने वाले लोगों का समूह है जिसमें साझा जीवन और अपनत्व का भाव मिलता है, जैसे गाँव, मुहल्ला या जनजातीय बस्ती। संस्था वह स्थापित प्रतिमान है जो बुनियादी सामाजिक जरूरतों को पूरा करता है, जैसे परिवार, विवाह, धर्म, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति। संस्थाओं में मानदंड, भूमिकाएँ, प्रक्रियाएँ और प्रतिबंध होते हैं। समिति या संघ किसी विशेष उद्देश्य के लिए जान-बूझकर बनाया गया समूह है, जैसे श्रमिक संघ, क्लब, सहकारी संस्था, पेशेवर निकाय या स्वैच्छिक संगठन। समुदाय की सदस्यता सामान्यतः अधिक व्यापक और स्वाभाविक होती है, जबकि संघ अधिक उद्देश्य-केन्द्रित और संगठित होता है।

ग्रामीण और नगरीय समुदाय भारतीय समाजशास्त्र के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। ग्रामीण समुदाय कृषि, नातेदारी, जाति-जाल, स्थानीय परंपरा, आमने-सामने के संबंध और अपेक्षाकृत धीमे व्यावसायिक विभेदन से जुड़ा माना जाता है। नगरीय समुदाय उद्योग, सेवाओं, पेशागत विशेषज्ञता, औपचारिक संगठनों, अनामिता, वर्ग-विविधता और तेज सामाजिक गतिशीलता से जुड़ा है। लेकिन कठोर दो-विभाजन की जगह ग्रामीण-नगरीय सातत्य अधिक यथार्थवादी है। गाँवों में विद्यालय, बाजार, प्रवासी आय, मोबाइल संचार और राजनीतिक दल हो सकते हैं; शहरों में जाति-संघ, क्षेत्रीय मुहल्ले और रिश्तेदारी-आधारित सहायता बनी रह सकती है। परीक्षा में पहले अवधारणा परिभाषित करें, फिर दिखाएँ कि भारतीय वास्तविकता अक्सर साफ विभाजन के बजाय सातत्य बनाती है।