तत्सम, अर्ध-तत्सम, तद्भव, देशज एवं विदेशी शब्द
मुख्य तथ्य
- आरपीएससी एसआई में शब्द-उत्पत्ति के प्रश्न सामान्यतः प्रत्यक्ष वर्ग, अपवाद और मिश्रित सूची के रूप में आते हैं।
- तत्सम शब्द संस्कृत रूप को सुरक्षित रखते हैं और उनमें क्ष, त्र, ज्ञ, द्य, द्व जैसे समूह प्रायः मजबूत संकेत देते हैं।
- औपचारिक प्रयोग से कोई शब्द तत्सम सिद्ध नहीं होता; अदालत और कानून जैसे शब्द प्रशासनिक होते हुए भी विदेशी मूल के हैं।
- अर्ध-तत्सम शब्द संस्कृत-मूल के होते हैं, पर उनमें सीमित ध्वनि-परिवर्तन होता है; वे तत्सम और तद्भव के बीच की परत हैं।
- तद्भव शब्द संस्कृत स्रोतों से बदले हुए हिंदी रूप हैं, जैसे दन्त से दाँत और हस्त से हाथ।
मुख्य बिंदु
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आरपीएससी एसआई में शब्द-उत्पत्ति के प्रश्न सामान्यतः प्रत्यक्ष वर्ग, अपवाद और मिश्रित सूची के रूप में आते हैं।
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तत्सम शब्द संस्कृत रूप को सुरक्षित रखते हैं और उनमें क्ष, त्र, ज्ञ, द्य, द्व जैसे समूह प्रायः मजबूत संकेत देते हैं।
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औपचारिक प्रयोग से कोई शब्द तत्सम सिद्ध नहीं होता; अदालत और कानून जैसे शब्द प्रशासनिक होते हुए भी विदेशी मूल के हैं।
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अर्ध-तत्सम शब्द संस्कृत-मूल के होते हैं, पर उनमें सीमित ध्वनि-परिवर्तन होता है; वे तत्सम और तद्भव के बीच की परत हैं।
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तद्भव शब्द संस्कृत स्रोतों से बदले हुए हिंदी रूप हैं, जैसे दन्त से दाँत और हस्त से हाथ।
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तत्सम और तद्भव अलग करने का सबसे तेज तरीका युग्म उदाहरण याद करना है।
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देशज शब्दों की पहचान संस्कृत-व्युत्पन्न और विदेशी मूल शब्दों को हटाने के बाद करनी चाहिए।
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सामान्य बोलचाल में प्रयोग होने से कोई शब्द देशज नहीं हो जाता; घर, हाथ, दूध और आग मानक तद्भव उदाहरण हैं।
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हिंदी में विदेशी मूल के शब्द अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेजी संपर्क-परतों से बहुत आते हैं।
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वाक्य-संदर्भ पहचान में सहायता करता है, पर उत्पत्ति-वर्गीकरण का स्थान नहीं ले सकता।
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मिश्रित सूची में हर शब्द की जाँच करें, क्योंकि एक गलत वर्ग का शब्द पूरी सूची को अमान्य कर सकता है।
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अर्ध-तत्सम की प्रत्यक्ष प्रश्न-दृश्यता तत्सम और तद्भव से कम हो सकती है, पर पाठ्यक्रम में नामित होने के कारण इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
आरपीएससी एसआई हिंदी में शब्द-उत्पत्ति के कौन-कौन से वर्ग पूछे जाते हैं?
आरपीएससी एसआई हिंदी में शब्द-उत्पत्ति के पाँच मुख्य वर्ग पूछे जाते हैं: तत्सम, अर्ध-तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी मूल के शब्द। राजस्थान लोक सेवा आयोग के उपनिरीक्षक और प्लाटून कमांडर के आधिकारिक सिलेबस में शब्द प्रकार के अंतर्गत यही ५ वर्ग साफ़-साफ़ दिए गए हैं। आरपीएससी एसआई में शब्द-उत्पत्ति का वर्गीकरण भाषा-इतिहास का लंबा निबंध नहीं, बल्कि पहचान का कौशल है। अभ्यर्थी को किसी शब्द या छोटी सूची को देखकर तय करना होता है कि वह तत्सम है, अर्ध-तत्सम है, तद्भव है, देशज है या विदेशी मूल का शब्द है। प्रश्नपत्र प्रथम के हिंदी पाठ्यक्रम में ये वर्ग शब्द-भेद के अंतर्गत दिए गए हैं, और पूर्व-वर्षीय प्रश्नों का ढंग भी सीधा रहता है: वर्ग पहचानना, अपवाद चुनना, या यह देखना कि किसी विकल्प-सूची के सभी शब्द एक ही वर्ग में आते हैं या नहीं। इसलिए तैयारी की व्यावहारिक पद्धति है कि परिभाषाएँ, सामान्य ध्वनि-संकेत, प्रचलित युग्म उदाहरण और हर संकेत की सीमा साथ-साथ याद रखी जाए। कोई शब्द औपचारिक, ग्रामीण या रोजमर्रा का लग सकता है, पर परीक्षा में वर्गीकरण मूल और रूप पर आधारित होता है, केवल शैली पर नहीं।
इन पाँच वर्गों को एक क्रम के रूप में समझना सबसे आसान है। एक छोर पर तत्सम शब्द हैं, जो संस्कृत से लगभग उसी रूप में हिंदी में आए हैं; जैसे कर्म, अग्नि, नदी, सूर्य, पत्र और पुष्प। इन शब्दों में व्यंजन-समूह, स्वर-रूप और शिक्षित उच्चारण प्रायः सुरक्षित रहते हैं। इसके बाद अर्ध-तत्सम आता है, जहाँ शब्द संस्कृत-मूल का होता है, लेकिन सामान्य हिंदी प्रयोग में उसमें सीमित ध्वनि-परिवर्तन हो चुका होता है। वह न तो शुद्ध तत्सम की तरह बिल्कुल सुरक्षित रूप है और न तद्भव की तरह पूरी तरह बदला हुआ सामान्य हिंदी रूप। फिर तद्भव है, जिसमें संस्कृत स्रोत प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी व्यवहार के रास्ते बदलकर परिचित आधुनिक हिंदी रूप बन जाता है; जैसे दन्त से दाँत या पाद से पाँव। देशज शब्द ऐसे स्थानीय या देशी शब्द हैं जिनका सामान्य परीक्षा-वर्गीकरण संस्कृत से नहीं जोड़ा जाता और जो किसी ज्ञात विदेशी भाषा से आए हुए भी नहीं माने जाते। विदेशी मूल के शब्द बाहरी भाषाओं से आए हुए शब्द हैं, विशेषतः अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेजी से आए शब्द।
सबसे सामान्य भूल यह है कि हर कठिन दिखने वाले शब्द को तत्सम और हर आम बोलचाल के शब्द को देशज मान लिया जाए। यह छोटा रास्ता गलत उत्तर देता है। दाँत जैसा सरल शब्द तद्भव है, क्योंकि वह संस्कृत दन्त से बना है; वह सिर्फ आम प्रयोग में होने के कारण देशज नहीं हो जाता। अदालत जैसा औपचारिक प्रशासनिक शब्द विदेशी मूल का है, तत्सम नहीं, क्योंकि वह अरबी-फारसी व्यवहार से आया है। गुलाब भी विदेशी मूल का शब्द है, यद्यपि हिंदी में बहुत सामान्य और साहित्यिक संदर्भों में भी प्रचलित है। इसके विपरीत गृह या मित्र जैसे शब्द तत्सम रहते हैं, क्योंकि उनका रूप संस्कृत से निकटता रखता है।
परीक्षा में पहले तीन प्रश्न पूछें। पहला, क्या शब्द संस्कृत रूप को बचाए हुए है, जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, द्य, द्व जैसे समूह या त्र, त्व, ता, क जैसे प्रत्यय-संकेत? यदि हाँ, तो तत्सम की जाँच करें। दूसरा, क्या संस्कृत स्रोत मालूम है लेकिन वर्तमान हिंदी रूप बहुत बदल गया है, जैसे मुख से मुँह, कर्ण से कान, या हस्त से हाथ? यदि हाँ, तो तद्भव की जाँच करें। तीसरा, क्या शब्द फारसी-अरबी प्रशासनिक, सांस्कृतिक या दैनिक व्यवहार से, अथवा पुर्तगाली या अंग्रेजी आधुनिक शब्दावली से आया लगता है? यदि हाँ, तो विदेशी मूल की जाँच करें। इन जाँचों के बाद ही देशज पर जाएँ। इससे वह सामान्य गलती बचती है जिसमें अभ्यर्थी किसी भी गैर-संस्कृत जैसे दिखने वाले शब्द को विदेशी मूल की छानबीन किए बिना देशज मान लेता है।
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