सन्धि एवं सन्धि-विच्छेद
मुख्य तथ्य
- संधि दो ध्वनि-इकाइयों के मिलने पर होने वाला परिवर्तन है; संधि-विच्छेद उसी बने हुए शब्द को सही मूल भागों में अलग करता है।
- आरपीएससी एसआई हिंदी में संधि पर प्रश्न सामान्यतः पहचान, सुधार और विकल्प तुलना के रूप में आते हैं, लंबी सैद्धांतिक व्याख्या के रूप में नहीं।
- दीर्घ स्वर संधि में समान स्वर मिलकर दीर्घ स्वर बनाते हैं, जैसे विद्या + आलय = विद्यालय।
- गुण संधि में अ/आ + इ/ई से ए, अ/आ + उ/ऊ से ओ, और अ/आ + ऋ से अर्-प्रकार का परिणाम मिलता है।
- वृद्धि संधि में अ/आ + ए/ऐ से ऐ और अ/आ + ओ/औ से औ-प्रकार का परिणाम बनता है।
मुख्य बिंदु
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संधि दो ध्वनि-इकाइयों के मिलने पर होने वाला परिवर्तन है; संधि-विच्छेद उसी बने हुए शब्द को सही मूल भागों में अलग करता है।
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आरपीएससी एसआई हिंदी में संधि पर प्रश्न सामान्यतः पहचान, सुधार और विकल्प तुलना के रूप में आते हैं, लंबी सैद्धांतिक व्याख्या के रूप में नहीं।
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दीर्घ स्वर संधि में समान स्वर मिलकर दीर्घ स्वर बनाते हैं, जैसे विद्या + आलय = विद्यालय।
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गुण संधि में अ/आ + इ/ई से ए, अ/आ + उ/ऊ से ओ, और अ/आ + ऋ से अर्-प्रकार का परिणाम मिलता है।
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वृद्धि संधि में अ/आ + ए/ऐ से ऐ और अ/आ + ओ/औ से औ-प्रकार का परिणाम बनता है।
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यण संधि में इ/ई, उ/ऊ और ऋ भिन्न स्वर से पहले क्रमशः य्, व् और र् में बदलते हैं।
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अयादि संधि में ए, ऐ, ओ और औ के बाद स्वर आने पर अय या अव-प्रकार के रूप बनते हैं, जैसे नयन और गायक।
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व्यंजन संधि हल करते समय सीमा-व्यंजन पर ध्यान दें, विशेषकर अंतिम क्, ट्, त्, म् और त्/द् के घोष ध्वनियों से मिलने पर।
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जश्त्व में कठोर अघोष स्पर्श व्यंजन घोष वातावरण में अपने घोष जोड़े में बदल सकता है, जबकि चर्त्व कुछ स्थितियों में उलटी कठोरीकरण प्रवृत्ति दिखाता है।
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विसर्ग संधि के प्रश्नों में देखें कि विसर्ग लुप्त हुआ है, र् बना है, ओ-प्रकार का परिणाम दिया है, या स्/श्/ष् जैसी ध्वनि में बदला है।
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संधि-रहित विकल्प लंबाई या संस्कृतनिष्ठ रूप देखकर तय नहीं होता; सही निर्णय यह है कि ज्ञात नियम से वैध सीमा-परिवर्तन दिखता है या नहीं।
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गलत विच्छेद वाले प्रश्नों में अर्थपूर्ण दिखते विभाजन भी अस्वीकार करें यदि वे वास्तविक ध्वनि-परिवर्तन से वही शब्द पुनः नहीं बनाते।
आरपीएससी एसआई में संधि और संधि-विच्छेद का मूल मतलब क्या है?
आरपीएससी एसआई में संधि का मूल मतलब दो ध्वनियों या शब्दांशों के मिलने पर जोड़-बिंदु पर होने वाला नियमबद्ध परिवर्तन है, और संधि-विच्छेद उसी बने हुए शब्द को उसके सही स्रोत-अंगों में वापस खोलना है। संधि का अर्थ है दो ध्वनियों या शब्दांशों के मिलने पर जोड़-बिंदु पर होने वाला सुनाई या दिखाई देने वाला परिवर्तन। प्रतियोगी परीक्षा की हिंदी व्याकरण में इसका व्यावहारिक प्रश्न दो बातों पर टिकता है: कौन-से दो अंग मिले, और मिलने की सीमा पर कौन-सा परिवर्तन हुआ। संधि-शब्द वह बना हुआ रूप है, जैसे विद्यालय, सदाचार, जगदीश, निस्संदेह या मनोरंजन। संधि-विच्छेद उसका उल्टा विश्लेषण है: विद्यालय = विद्या + आलय, सदाचार = सत् + आचार, जगदीश = जगत् + ईश, निस्संदेह = नि: + संदेह और मनोरंजन = मन: + रंजन। परीक्षा में केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि दो शब्द जुड़ गए; सही अंक उसी विकल्प को मिलते हैं जिसमें सीमा और नियम दोनों ठीक हों।
आरपीएससी के आधिकारिक पाठ्यक्रम के अनुसार उप निरीक्षक और प्लाटून कमांडर प्रतियोगी परीक्षा के हिंदी प्रश्नपत्र में १०० वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं। आरपीएससी उप निरीक्षक प्रश्नपत्र प्रथम के हिंदी पाठ्यक्रम में संधि एवं संधि-विच्छेद शब्द-रचना के अंतर्गत आता है, और प्रश्नपत्र वस्तुनिष्ठ होता है। इसलिए तैयारी का ढंग भी पहचान-केंद्रित होना चाहिए। अभ्यर्थी से सामान्यतः पूछा जाता है कि कौन-सी संधि गलत है, कौन-सा संधि-विच्छेद गलत है, कौन-सा निर्माण सही है, या कौन-सा शब्द संधि-रहित है। अतः पहले सामान्य रूपांतरण याद करें, हर नियम के साथ दो-तीन पक्के उदाहरण जोड़ें, और विकल्पों की तुलना जोड़-बिंदु के अक्षर से करें। लंबी परिभाषाएँ तभी उपयोगी हैं जब आम उदाहरण स्थिर हो चुके हों।
तीन शब्द अलग रखने चाहिए। संयोग केवल साथ आना है, पर संधि में ध्वनि-परिवर्तन आवश्यक है। यदि दो पद बिना परिवर्तन के साथ लिखे गए हैं, तो वह समास या पदबंध हो सकता है; वह अनिवार्य रूप से संधि नहीं है। संधि-शब्द परिवर्तन के बाद बना रूप है। संधि-विच्छेद कोई भी अर्थपूर्ण काट नहीं, बल्कि वही विभाजन है जिससे नियम लगाकर फिर वही शब्द बन जाए। उदाहरण के लिए सदाचार बना हुआ देखकर सद् + आचार लिखना आकर्षक लग सकता है, पर परीक्षोपयोगी स्रोत सत् + आचार है, क्योंकि स्वर-आरंभ वाले वातावरण में अंतिम त् का द् हो जाता है। इसी प्रकार सज्जन स + जन नहीं है; यह सत् + जन से व्यंजन परिवर्तन द्वारा बना है।
प्रश्न हल करते समय पहले दिखाई दे रहे जोड़ को खोजें। यदि बीच में आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ या औ जैसा स्वर-परिणाम दिखे, तो पहले स्वर संधि जाँचें। यदि बीच में दोहरे व्यंजन, घोष ध्वनि, अनुस्वार, या त्/द् के आसपास परिवर्तन दिखे, तो व्यंजन संधि पर जाएँ। यदि स्रोत पद विसर्ग पर समाप्त हो सकता है, तो विसर्ग संधि की संभावना देखें। हर संस्कृतनिष्ठ शब्द को संधि-शब्द मान लेना गलत है; कोई शब्द तत्सम या औपचारिक हो सकता है, पर दिए गए विकल्प में संधि से निर्मित न हो। दूसरी ओर उपदेश, सदाचार, नमस्कार और मनोरंजन जैसे सामान्य शब्द इसलिए पूछे जाते हैं क्योंकि उनके परंपरागत विच्छेद नियमबद्ध हैं।
विकल्प जाँचने की भरोसेमंद विधि यह है: प्रस्तावित दोनों भाग पहचानिए, उनके सीमा-स्वरों या सीमा-व्यंजनों को मिलाइए, संबंधित नियम लगाइए और देखिए कि मुद्रित शब्द ठीक-ठीक लौटता है या नहीं। यदि विकल्प कहे जगदीश = जग + दीश, तो वह असफल है, क्योंकि दीश वास्तविक दूसरा पद नहीं है और त् से द् का परिवर्तन छूट गया है। यदि विकल्प कहे जगदीश = जगत् + ईश, तो वह सही है, क्योंकि त् स्वर-आरंभ वाले पद से पहले द् बनता है। संधि के प्रश्न छोटे होते हैं, पर अनुमान से नहीं चलते; सही विकल्प को उल्टा जोड़कर फिर वही शब्द बनाना ही पड़ता है।
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