मुख्य तथ्य

  • पटवार सामान्य हिंदी में उपसर्ग और प्रत्यय को परिभाषा से अधिक शब्द-रचना और पृथक्करण के औजार की तरह पूछता है।
  • उपसर्ग मूल शब्द से पहले लगता है और नकार, अधिकता, दिशा, गुण, दोष, निकटता या संबंध का अर्थ जोड़ता है।
  • प्रत्यय मूल शब्द या धातु के बाद लगता है और भाववाचक संज्ञा, विशेषण, व्यक्ति-सूचक शब्द या गुण-सूचक शब्द बना सकता है।
  • निर्माण-प्रश्न में उपसर्ग और मूल शब्द, मूल शब्द और प्रत्यय, या तीनों को मिलाकर मानक हिंदी शब्द बनाना पड़ सकता है।
  • पृथक्करण तभी सही है जब उपसर्ग या प्रत्यय हटाने पर बचा हुआ आधार सार्थक हो और अर्थ-परिवर्तन समझ में आए।

मुख्य बिंदु

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    पटवार सामान्य हिंदी में उपसर्ग और प्रत्यय को परिभाषा से अधिक शब्द-रचना और पृथक्करण के औजार की तरह पूछता है।

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    उपसर्ग मूल शब्द से पहले लगता है और नकार, अधिकता, दिशा, गुण, दोष, निकटता या संबंध का अर्थ जोड़ता है।

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    प्रत्यय मूल शब्द या धातु के बाद लगता है और भाववाचक संज्ञा, विशेषण, व्यक्ति-सूचक शब्द या गुण-सूचक शब्द बना सकता है।

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    निर्माण-प्रश्न में उपसर्ग और मूल शब्द, मूल शब्द और प्रत्यय, या तीनों को मिलाकर मानक हिंदी शब्द बनाना पड़ सकता है।

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    पृथक्करण तभी सही है जब उपसर्ग या प्रत्यय हटाने पर बचा हुआ आधार सार्थक हो और अर्थ-परिवर्तन समझ में आए।

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    प्र, सम्, वि, निर्, अति, सु, दुर् और उप जैसे संस्कृत-उत्पन्न उपसर्ग औपचारिक परीक्षा-शब्दों में बार-बार मिलते हैं।

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    अन, अध, बिन, बे, हम, ला और पर जैसे प्रचलित उपसर्ग बोलचाल और मिश्रित हिंदी के शब्दों में उपयोगी हैं।

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    ता, पन, त्व, ई, आई, कार, दार, वान, मान, मय, युक्त, हीन और शील अधिक उपयोगी प्रत्यय हैं।

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    ध्वनि-परिवर्तन सामान्य है: सम् और योग से संयोग, दुर् और कर्म से दुष्कर्म, अति और अधिक से अत्यधिक बनता है।

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    अभ्यास में उपसर्ग पहचानना, प्रत्यय पहचानना, शब्द बनाना और पूरा पृथक्करण करना चारों रूप शामिल रखें।

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    मिथ्या उपसर्ग-प्रत्यय से बचने के लिए हटाओ और अर्थ समझाओ कसौटी लगाएँ।

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    हिंदी व्याकरण के उदाहरण देवनागरी में ही पढ़ें, क्योंकि परीक्षा में शब्द उसी रूप में दिखाई देता है।

पटवार में उपसर्ग और प्रत्यय कैसे पढ़ने चाहिए?

पटवार में उपसर्ग और प्रत्यय को परिभाषा रटने की जगह पहचान, शब्द-रचना और पृथक्करण के व्यावहारिक कौशल की तरह पढ़ना चाहिए। पटवार की सामान्य हिंदी में उपसर्ग और प्रत्यय केवल परिभाषा रटने वाला अध्याय नहीं है। आधिकारिक सिलेबस का संकेत साफ है: परीक्षार्थी को उपसर्ग और प्रत्यय पहचानने हैं, उनसे शब्द बनाने हैं और दिए गए शब्द में उन्हें अलग करना है। इसलिए तैयारी केवल अति, सु, ता, पन जैसी सूचियाँ याद करके पूरी नहीं होती। असली कौशल यह है कि शब्द की बनावट दिखे: मूल शब्द कौन-सा है, उसके पहले क्या जुड़ा है, उसके बाद क्या जुड़ा है और अर्थ में क्या बदलाव आया है। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के आधिकारिक पटवार पाठ्यक्रम में सामान्य हिंदी और अंग्रेज़ी खंड के लिए २२ प्रश्न बताए गए हैं।

इस अध्याय से प्रश्न छोटे आ सकते हैं, पर वे सीधे अंक काटते हैं। एक रूप में पूछा जा सकता है कि किस शब्द में उपसर्ग है। दूसरे रूप में सही पृथक्करण पूछा जा सकता है, जैसे असफल बराबर अ और सफल, या सफलता बराबर सफल और ता। तीसरे रूप में निर्माण पूछा जाता है: किसी मूल शब्द में दिया गया उपसर्ग या प्रत्यय जोड़कर सही शब्द चुनना। चूँकि सिलेबस में निर्माण और पृथक्करण दोनों हैं, अभ्यास में पहचान, रचना और अलग करना तीनों शामिल होने चाहिए। पटवार के उपलब्ध आधिकारिक प्रश्नपत्रों में उपसर्ग-प्रकार की पहचान का हल्का लेकिन सीधा संकेत मिलता है; इसलिए इसे जीवित विषय मानें, बहुत भारी अध्याय नहीं, पर आसान अंक वाला अध्याय जरूर।

हिंदी व्याकरण पढ़ाते समय उदाहरण उसी लिपि में देखने चाहिए जिसमें परीक्षा पूछती है। उपसर्ग जैसे उप, प्र, अ, सु, दुर्, वि, सम् शब्द के आरंभ में आते हैं। प्रत्यय जैसे ता, पन, ई, कार, वान, हीन शब्द के अंत में आते हैं। देवनागरी रूप देखकर अभ्यास करने से आँख को शब्द की असली बनावट पहचानने की आदत पड़ती है। तरीका यह रखें: शब्द पढ़ें, शुरुआत और अंत को चिह्नित करें, फिर देखें कि बीच का भाग सार्थक मूल शब्द है या नहीं।

एक उपयोगी आरंभिक विभाजन संस्कृत-उत्पन्न और हिंदी में प्रचलित रूपों का है। प्र, सम्, वि, निर्, अति, सु, दुर् और उप जैसे उपसर्ग औपचारिक शब्दों में मिलते हैं: प्रवेश, संयोग, वियोग, निर्दोष, अत्यधिक, सुपुत्र, दुर्गुण, उपकार। अन, अध, भर, बिन, बे, हम, ला और पर जैसे रूप बोलचाल या मिश्रित प्रयोगों में दिखते हैं: अनपढ़, अधपका, भरपूर, बिनब्याहा, बेकार, हमदर्द, लापरवाह, परदादा। परीक्षा में स्रोत की विद्वत चर्चा से अधिक जरूरी है कि आरंभ का अंश सचमुच उपसर्ग की तरह अर्थ दे रहा है या केवल मिलते-जुलते अक्षर हैं।

दूसरा विभाजन अर्थ के आधार पर करें। कुछ उपसर्ग नकार या अभाव बताते हैं, जैसे असत्य और अनुचित। कुछ अधिकता, निकटता, दोष, अच्छाई या दिशा बताते हैं, जैसे अत्यधिक, उपमंत्री, दुर्गुण, सुगंध और प्रस्थान। कुछ प्रत्यय भाववाचक संज्ञा बनाते हैं, जैसे सुंदरता और बचपन। कुछ व्यक्ति या काम बताने वाले शब्द बनाते हैं, जैसे लेखक, दुकानदार और कलाकार। कुछ विशेषण बनाते हैं, जैसे धनवान, दयालु और भारतीय। जब हर रूप के साथ उसका अर्थ-प्रभाव जुड़ जाता है, तब अध्याय सूची-आधारित नहीं रह जाता; वह तर्क से हल होने लगता है।