सन्धि एवं सन्धि-विच्छेद
मुख्य तथ्य
- सन्धि दो ध्वनियों के मिलन पर होने वाला परिवर्तन है और सन्धि-विच्छेद संयुक्त रूप को मूल सार्थक भागों में लौटाता है।
- हर प्रश्न में पहला कदम सन्धि-स्थल और मिलने वाली दो ध्वनियों को पहचानना है।
- स्वर सन्धि में मूल स्वर-युग्म और बने हुए स्वर या य्/व् जैसे बदले हुए रूप से भेद तय होता है।
- दीर्घ सन्धि समान कुल के स्वरों को दीर्घ करती है, जैसे हिम + आलय = हिमालय।
- गुण सन्धि में अ/आ के साथ इ/ई, उ/ऊ या ऋ से ए, ओ या अर् बनता है, जैसे महा + उत्सव = महोत्सव।
मुख्य बिंदु
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सन्धि दो ध्वनियों के मिलन पर होने वाला परिवर्तन है और सन्धि-विच्छेद संयुक्त रूप को मूल सार्थक भागों में लौटाता है।
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हर प्रश्न में पहला कदम सन्धि-स्थल और मिलने वाली दो ध्वनियों को पहचानना है।
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स्वर सन्धि में मूल स्वर-युग्म और बने हुए स्वर या य्/व् जैसे बदले हुए रूप से भेद तय होता है।
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दीर्घ सन्धि समान कुल के स्वरों को दीर्घ करती है, जैसे हिम + आलय = हिमालय।
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गुण सन्धि में अ/आ के साथ इ/ई, उ/ऊ या ऋ से ए, ओ या अर् बनता है, जैसे महा + उत्सव = महोत्सव।
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वृद्धि सन्धि में अ/आ के साथ ए/ऐ या ओ/औ से ऐ या औ बनता है, जैसे सदा + एव = सदैव।
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यण सन्धि में इ/ई, उ/ऊ या ऋ भिन्न स्वर से पहले य्, व् या र् में बदल जाते हैं, जैसे सु + आगत = स्वागत।
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अयादि सन्धि में ए, ऐ, ओ या औ से अय, आय, अव या आव रूप बनते हैं।
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व्यंजन सन्धि में त् का द्, च्च या ज्ज जैसे रूपों में बदलना महत्त्वपूर्ण परीक्षा-संकेत है।
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विसर्ग सन्धि का निर्णय मूल ः से करें; केवल ओ देखकर गुण सन्धि मान लेना गलत हो सकता है।
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सन्धि-विच्छेद में दोनों भाग अर्थपूर्ण होने चाहिए और प्रस्तावित विच्छेद से बदला हुआ अक्षर समझ में आना चाहिए।
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सन्धि-रूप वाले प्रश्न में विकल्प देखने से पहले बदला हुआ संयुक्त रूप स्वयं बना लें।
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भेद पहचानते समय अंतिम अक्षर या मात्रा नहीं, परिवर्तन का कारण देखें।
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गलत विकल्प अक्सर दोनों मूल स्वरों को बचाते हैं, द्वित्व छोड़ते हैं, निरर्थक विग्रह देते हैं या गुण-विसर्ग में भ्रम कराते हैं।
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दोहराव सूची में स्वर, व्यंजन और विसर्ग सन्धि के साथ दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण और अयादि के उदाहरण अवश्य रखें।
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सन्धि और सन्धि-विच्छेद को सही तरीके से कैसे समझें?
सन्धि और सन्धि-विच्छेद को सही तरीके से समझने के लिए पहले सन्धि-स्थल, फिर मूल सार्थक भाग और अंत में लागू ध्वनि-नियम को पहचानना चाहिए। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के लिपिक/कनिष्ठ सहायक के आधिकारिक प्रश्नपत्र-द्वितीय का प्रारूप वस्तुनिष्ठ है: 150 प्रश्न, 100 अंक, सामान्य हिन्दी और सामान्य अंग्रेज़ी के 75-75 प्रश्न, और 3 घंटे की अवधि। सन्धि का अर्थ है दो ध्वनियों के मिलने पर होने वाला ध्वनि-परिवर्तन। हिन्दी व्याकरण के प्रश्नों में यह मिलन दो शब्दों के बीच, उपसर्ग और शब्द के बीच, धातु या शब्दांश और अगले अंश के बीच, या किसी समस्त पद के दो भागों के बीच हो सकता है। इसका दिखाई देने वाला रूप ऐसा संयुक्त पद होता है जैसे देव + आलय से देवालय, महा + इन्द्र से महेन्द्र और सु + आगत से स्वागत। सन्धि-विच्छेद इसी प्रक्रिया का उलटा काम है। इसमें बने हुए पद को उसके मूल सार्थक भागों में तोड़ा जाता है और यह बताया जाता है कि सन्धि-स्थल पर कौन-सा ध्वनि-परिवर्तन हुआ। लिपिक श्रेणी की हिन्दी तैयारी में केवल उदाहरण याद करना पर्याप्त नहीं है; विद्यार्थी को सन्धि-रूप बनाना, बने हुए पद का विच्छेद करना और सन्धि का भेद पहचानना, तीनों आने चाहिए।
सबसे पहला काम सन्धि-स्थल पकड़ना है। देवालय में उपयोगी सन्धि-स्थल देव + आलय है; यहाँ अ + आ से आ बना, इसलिए सन्धि-स्थल पर दीर्घ स्वर दिखाई देता है। महेश में सन्धि-स्थल महा + ईश है; आ + ई से ए बना, इसलिए यह गुण प्रकार का स्वर-परिवर्तन है। इत्यादि में सन्धि-स्थल इति + आदि है; इ के बाद भिन्न स्वर आने पर इ, य् में बदल जाता है, इसलिए रूप में त्य दिखाई देता है। यदि सन्धि-स्थल गलत पकड़ लिया गया तो आगे का पूरा उत्तर संदिग्ध हो जाता है। किसी परिचित शब्द को केवल सुविधा के लिए बीच से काट देना सही विच्छेद नहीं है। सन्धि-विच्छेद में दोनों भाग सार्थक होने चाहिए और ध्वनि-नियम भी ठीक बैठना चाहिए।
परीक्षा में सन्धि की तीन बड़ी श्रेणियाँ काम आती हैं: स्वर सन्धि, व्यंजन सन्धि और विसर्ग सन्धि। स्वर सन्धि में स्वर मिलते हैं और स्वर का रूप बदलता है, जैसे अ + अ = आ, अ + इ = ए, अ + ए = ऐ, इ + अ में इ, य् में बदलता है और ए + अ में अय बनता है। व्यंजन सन्धि में सन्धि-स्थल का व्यंजन अगले वर्ण के प्रभाव से बदलता है, जैसे जगत् + ईश से जगदीश। विसर्ग सन्धि में अन्त का ः बदलता है, लुप्त होता है या अगले वर्ण को प्रभावित करता है, जैसे मनः + रथ से मनोरथ। छोटे वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में केवल भेद पूछा जा सकता है, इसलिए प्रारम्भिक वर्गीकरण बहुत महत्त्वपूर्ण है।
सन्धि बनाना और सन्धि-विच्छेद करना एक-दूसरे की उलटी दिशाएँ हैं। सन्धि बनाते समय पहले पहले पद की अन्तिम ध्वनि और दूसरे पद की प्रथम ध्वनि लिखिए, फिर नियम लगाइए और शेष वर्ण जोड़ दीजिए। सन्धि-विच्छेद में पहले संयुक्त शब्द में बदली हुई ध्वनि पहचानिए, फिर सम्भावित मूल ध्वनियों को जाँचिए। महोत्सव में हो देखकर महा + उत्सव याद आता है, क्योंकि आ + उ से गुण सन्धि में ओ बनता है। नयन में अय देखकर परम्परागत अयादि व्याख्या में ने + अन सम्भव हो सकता है, पर तभी जब प्रश्न उसी स्वीकृत उदाहरण को लक्ष्य कर रहा हो। सामान्य शब्दावली में हर शब्द को जबरन तोड़ना ठीक नहीं है।
अध्ययन सामग्री में प्रायः पहला पद + दूसरा पद = सन्धि-रूप का तरीका दिया जाता है। परीक्षा में यही बात चार उत्तर-विकल्पों के साथ आ सकती है: कहीं विग्रह देकर संयुक्त रूप पूछेंगे, कहीं संयुक्त शब्द देकर विच्छेद पूछेंगे, और कहीं शब्द देकर सन्धि-भेद पूछेंगे। RSSB के व्यापक वस्तुनिष्ठ प्रारूप में पाँचवाँ ‘अनुत्तरित प्रश्न’ विकल्प भी हो सकता है, लेकिन व्याकरण का नियम वही रहता है। विकल्पों में एक मात्रा, हलन्त, द्वित्व या विसर्ग का छोटा-सा अन्तर उत्तर बदल सकता है। सामान्य गलतियाँ भी इसी कारण होती हैं। हर दीर्घ स्वर दीर्घ सन्धि से नहीं बना होता, हर ओ गुण नहीं होता, और हर य या व देखकर यण नहीं मान लेना चाहिए। सही क्रम है: सार्थक भाग पहचानना, मिलने वाली दो ध्वनियाँ अलग करना, नियम लगाना या उलटना, और फिर भेद का नाम देना.
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