राजस्थान नगर पालिका (समितियों की शक्तियाँ, कर्तव्य एवं कार्य) नियम 2009
मुख्य तथ्य
- 2009 के समिति-कार्य नियम आधिकारिक पाठ्यक्रम के भाग बी का अलग स्रोत हैं; इन्हें सामान्य नगरपालिका परिचय में नहीं मिलाना चाहिए।
- धारा 55 कार्यकारी समिति और नामित विषय समितियों का मुख्य अधिनियम-आधार है।
- धारा 61 प्रत्यायोजन का आधार है: शक्तियां, कर्तव्य और कार्यकारी कार्य प्रतिबंधों, सीमाओं और शर्तों के अधीन समितियों को सौंपे जा सकते हैं।
- धारा 337 राज्य सरकार को समिति शक्तियों, कर्तव्यों, कार्यों, बैठक प्रक्रिया और प्रत्यायोजन सीमाओं पर नियम बनाने की शक्ति देती है।
- धारा 55 की विषय समितियों में सामान्यतः सदस्यों की संख्या दस से अधिक नहीं होती।
मुख्य बिंदु
- 1
2009 के समिति-कार्य नियम आधिकारिक पाठ्यक्रम के भाग बी का अलग स्रोत हैं; इन्हें सामान्य नगरपालिका परिचय में नहीं मिलाना चाहिए।
- 2
धारा 55 कार्यकारी समिति और नामित विषय समितियों का मुख्य अधिनियम-आधार है।
- 3
धारा 61 प्रत्यायोजन का आधार है: शक्तियां, कर्तव्य और कार्यकारी कार्य प्रतिबंधों, सीमाओं और शर्तों के अधीन समितियों को सौंपे जा सकते हैं।
- 4
धारा 337 राज्य सरकार को समिति शक्तियों, कर्तव्यों, कार्यों, बैठक प्रक्रिया और प्रत्यायोजन सीमाओं पर नियम बनाने की शक्ति देती है।
- 5
प्रत्येक नगर पालिका में कार्यकारी समिति होती है और मुख्य नगरपालिका अधिकारी उसका पदेन सचिव होता है।
- 6
धारा 55 की विषय समितियों में सामान्यतः सदस्यों की संख्या दस से अधिक नहीं होती।
- 7
समितियां नगर पालिका के गठन के नब्बे दिन के भीतर बननी चाहिए; असफलता पर राज्य सरकार गठन कर सकती है।
- 8
अतिरिक्त समितियों की सीमा वर्गवार है: नगर निगम में आठ, नगर परिषद में छह और नगर पालिका मंडल में चार, जब तक राज्य सरकार सीमा न बढ़ाए।
- 9
विशेष योग्यता वाले गैर-सदस्य कार्यकारी समिति को छोड़कर धारा 55 की समितियों में लगाए जा सकते हैं, पर उनकी संख्या समिति के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी।
- 10
सामान्य समिति बैठक में काम के लिए आधे सदस्यों की उपस्थिति जरूरी है।
- 11
वार्ड समितियां धारा 54 के अधीन क्षेत्रीय भागीदारी निकाय हैं; वे धारा 55 की विषय समितियों जैसी नहीं हैं।
- 12
वार्ड समितियां सफाई, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, लाभार्थी पहचान, पार्क और सड़क रोशनी के रख-रखाव जैसे स्थानीय कार्यों में सहायता करती हैं।
- 13
समितियां नगरपालिका निर्देशों के अधीन रहती हैं और नगरपालिका निधि से खर्च तभी स्वीकृत कर सकती हैं जब वह बजट में पहले से स्वीकृत हो।
- 14
समिति संकल्प नगर पालिका द्वारा पुनरीक्षण और नगर पालिका के समक्ष अपील के अधीन हो सकते हैं।
- 15
सुरक्षित कार्य-मानचित्र है: वित्त को बजट और राजस्व से, स्वास्थ्य को सफाई से, निर्माण कार्य को भवन अनुमति से, नियम समिति को उपविधियों से और अपराध समिति को शमन तथा समझौते से जोड़ें।
राजस्थान नगर पालिका समिति-कार्य नियम, २००९ किस अधिनियम से जुड़े हैं?
राजस्थान नगर पालिका समिति-कार्य नियम, २००९ राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, २००९ की समिति व्यवस्था को लागू करते हैं और नगर पालिका के काम को वैधानिक नियंत्रण के भीतर अलग-अलग समितियों में बांटते हैं। राजस्थान नगर पालिका (समितियों की शक्तियां, कर्तव्य और कार्य) नियम, २००९ को राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, २००९ के अधीन बने छोटे लेकिन परीक्षा की दृष्टि से बहुत उपयोगी नियमों की तरह पढ़ना चाहिए। आधिकारिक कार्यपालक अधिकारी और राजस्व अधिकारी पाठ्यक्रम में ये नियम भाग बी के अलग स्रोत के रूप में दिए गए हैं, इसलिए इसे केवल शहरी स्थानीय निकायों के सामान्य परिचय में समेट देना गलत होगा। परीक्षा में इसका महत्व तीन बातों से बनता है: नगर पालिका में कौन-कौन सी समितियां बनती हैं, किस समिति से कौन सा काम जुड़ा है, और नगर पालिका अपनी शक्तियां, कर्तव्य तथा कार्यकारी काम समितियों को किस सीमा तक दे सकती है। राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्थानीय स्वशासन विभाग परीक्षा योजना में भाग बी ४० अंकों का है, इसलिए इन समिति-कार्य नियमों को पाठ्यक्रम के अलग और परीक्षा-योग्य हिस्से की तरह पढ़ना चाहिए। ये नियम कोई समानांतर नगर पालिका नहीं बनाते। वे अधिनियम की समिति संबंधी व्यवस्था को काम में लाते हैं और समितियों को नगर पालिका की वैधानिक नियंत्रण-श्रृंखला के भीतर रखते हैं।
अधिनियम का पहला आधार धारा ५५ है। यह प्रत्येक नगर पालिका में कार्यकारी समिति की व्यवस्था करती है और वित्त, स्वास्थ्य तथा सफाई, सार्वजनिक सड़कों-स्थानों-भवनों की रोशनी, भवन अनुमति और निर्माण कार्य, मलिन बस्ती सुधार, महिला और बाल विकास के साथ गरीबी उन्मूलन तथा सार्वजनिक वितरण से जुड़े कार्य, नियम और उपविधियां, तथा अपराधों के शमन और समझौते जैसी विषय समितियों की भी व्यवस्था करती है। धारा ५५ का महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि ये समितियां उनके लिए निर्धारित शक्तियों का प्रयोग, कर्तव्यों का पालन और कार्यों का निर्वहन कर सकती हैं। यही अधिनियम और २००९ के समिति-कार्य नियमों के बीच सीधा पुल है। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में धारा ५५ को गठन और सूची का मुख्य आधार मानें।
दूसरा आधार धारा ६१ है। इसमें कहा गया है कि नगर पालिका द्वारा या उसकी ओर से प्रयोग की जाने वाली शक्तियां, कर्तव्य या कार्यकारी कार्य अधिनियम के अधीन समितियों को प्रत्यायोजित किए जा सकते हैं, पर यह काम निर्धारित प्रतिबंधों, सीमाओं और शर्तों के अधीन ही होगा। यह वाक्य परीक्षा में बहुत काम आता है। प्रत्यायोजन का अर्थ नगर पालिका की शक्ति का बेलगाम हस्तांतरण नहीं है। यह नगर पालिका के वैधानिक उत्तरदायित्व को बनाए रखते हुए काम को अलग-अलग समितियों में बांटने की पद्धति है। इसलिए नियम यह बताते हैं कि किस विषय का सामान्य घर कौन सी समिति है और समिति किस सीमा में काम करेगी।
तीसरा आधार धारा ३३७ है। यह राज्य सरकार को अधिनियम लागू करने के लिए नियम बनाने की शक्ति देती है। इसमें धारा ५५ के अधीन गठित समितियों की शक्तियां, कर्तव्य, कार्य और बैठक प्रक्रिया, तथा समितियों को प्रत्यायोजन पर प्रतिबंध और शर्तें निर्धारित करने जैसी बातें आती हैं। इसलिए यदि प्रश्न सक्षमकारी धाराओं पर हो तो उत्तर को समिति गठन, प्रत्यायोजन और नियम बनाने की शक्ति से जोड़ना चाहिए, न कि सदस्यों के विशेषाधिकार या सामान्य बैठक संबंधी असंबंधित प्रावधानों से।
लघु शीर्षक भी परीक्षा योग्य है। नियमों की पहचान समितियों की शक्तियों, कर्तव्यों और कार्यों से संबंधित राजस्थान नगर पालिका नियम, २००९ के रूप में होती है और ये राजपत्र में प्रकाशन से लागू हुए। पुराने समिति-गठन नियम केवल निरसन और बचत की पृष्ठभूमि के रूप में उपयोगी हो सकते हैं; वर्तमान परीक्षा का केंद्र यह है कि २००९ का ढांचा राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, २००९ के बाद नगर पालिका के काम को समितियों में कैसे बांटता है। याद रखने का सरल सूत्र है: धारा ५५ समितियां बनाती और सूची देती है, धारा ६१ काम का प्रत्यायोजन करती है, और धारा ३३७ राज्य सरकार को नियम बनाने की शक्ति देती है।
एक शुरुआती टॉपिक पाने के लिए मुफ़्त साइन अप करें
जो पहला बंद टॉपिक आप खोलेंगे, वह आपका रहेगा; बाकी के लिए स्टडी पैक या पूरा कोर्स चाहिए।
