मुख्य तथ्य

  • राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 का अध्याय 12 नगरीय शक्तियां और अपराध से जुड़ा है;
  • धारा 49 मुख्य नगरपालिका अधिकारी को अभिलेखों का संरक्षक, लाइसेंस और अनुमतियों का प्रमाणीकरण अधिकारी तथा अवैध प्रस्तावों या आदेशों पर वैधानिक असहमति दर्…
  • धारा 55, 59 और 61 समिति-आधारित प्रशासन बनाती हैं, लेकिन समितियां नगरपालिका के निर्देशों, बजट और निर्धारित प्रत्यायोजन सीमा के अधीन रहती हैं।
  • धारा 245 सार्वजनिक भूमि की मुख्य धारा है; अतिक्रमण, अस्थायी बाधा, हटाना, खर्च की वसूली, जब्ती और अधिहरण इसी में जुड़े हैं।
  • धारा 285 व्यक्तिगत सूचना की अवज्ञा पर सामान्य दंड देती है और चूक होने पर नगरपालिका को काम कराकर खर्च वसूलने की शक्ति भी देती है।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    आधिकारिक कार्यपालक अधिकारी-राजस्व अधिकारी पाठ्यक्रम में नगरीय शक्तियां, अपराध, अभियोजन, वाद और नियंत्रण अलग-अलग शीर्षक हैं; इसलिए इस topic को एक जुड़े हुए वैधानिक समूह की तरह पढ़ना चाहिए।

  2. 2

    राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 का अध्याय 12 नगरीय शक्तियां और अपराध से जुड़ा है; इसमें नालियां, सड़कें, भवन, सार्वजनिक भूमि, स्वच्छता, खतरनाक रोग, कारोबार, सूचनाएं और दंड आते हैं।

  3. 3

    धारा 49 मुख्य नगरपालिका अधिकारी को अभिलेखों का संरक्षक, लाइसेंस और अनुमतियों का प्रमाणीकरण अधिकारी तथा अवैध प्रस्तावों या आदेशों पर वैधानिक असहमति दर्ज करने वाला अधिकारी बनाती है।

  4. 4

    धारा 55, 59 और 61 समिति-आधारित प्रशासन बनाती हैं, लेकिन समितियां नगरपालिका के निर्देशों, बजट और निर्धारित प्रत्यायोजन सीमा के अधीन रहती हैं।

  5. 5

    धारा 245 सार्वजनिक भूमि की मुख्य धारा है; अतिक्रमण, अस्थायी बाधा, हटाना, खर्च की वसूली, जब्ती और अधिहरण इसी में जुड़े हैं।

  6. 6

    धारा 285 व्यक्तिगत सूचना की अवज्ञा पर सामान्य दंड देती है और चूक होने पर नगरपालिका को काम कराकर खर्च वसूलने की शक्ति भी देती है।

  7. 7

    धारा 297क सार्वजनिक दृश्य में संपत्ति के विरूपण को दंडित करती है; धारा 297ख और 297ग प्रयास तथा दुष्प्रेरण को कवर करती हैं और धारा 297घ निशान मिटाने या हटाने की शक्ति देती है।

  8. 8

    शमन अपने-आप नहीं होता; धारा 299 में समझौता, अभियोजन वापसी और शमन वैधानिक रास्ते से ही संभव हैं, और जहां नियम आवश्यक हों वहां अपराध का शमनीय घोषित होना जरूरी है।

  9. 9

    धारा 301 के अनुसार धारा 167, 236, 245, 297क, 297ख और 297ग के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय और जमानतीय हैं।

  10. 10

    धारा 304 आधिकारिक क्षमता में किए गए कार्यों के लिए नगरपालिका या अधिकारियों के विरुद्ध वाद से पहले दो महीने की सूचना और सामान्यतः छह महीने की सीमा तय करती है, लेकिन निषेधाज्ञा का सीमित अपवाद है।

  11. 11

    धारा 310 राज्य के प्राधिकृत अधिकारी को निरीक्षण, अभिलेख मांगने, आपत्ति पर नगरपालिका से उत्तर मांगने और जांच के लिए अभिलेख कब्जे में लेने की शक्ति देती है।

  12. 12

    धारा 312 अवैध, लोक-हानिकर, शांति-भंगकारी या नगरपालिका हित के विरुद्ध प्रस्तावों और आदेशों के निलंबन की शक्ति देती है; आगे राज्य सरकार की समीक्षा और सुनवाई जरूरी है।

  13. 13

    धारा 327 सरकार या प्राधिकृत अधिकारी को नगरपालिका आदेशों और प्रस्तावों की शुद्धता, वैधता या औचित्य जांचने के लिए अभिलेख मंगाकर उन्हें रद्द, उलट या संशोधित करने की शक्ति देती है।

  14. 14

    उत्तर लिखते समय हमेशा अधिकार-रेखा पहचानें: नगरपालिका, मुख्य नगरपालिका अधिकारी, प्राधिकृत अधिकारी, कलेक्टर, जिला मजिस्ट्रेट, स्थानीय निकाय निदेशक या राज्य सरकार।

कार्यपालक अधिकारी और राजस्व अधिकारी के पाठ्यक्रम में नगरीय शक्तियाँ, अपराध नियंत्रण, अभियोजन और वाद कैसे पढ़ें?

कार्यपालक अधिकारी और राजस्व अधिकारी के पाठ्यक्रम में नगरीय शक्तियाँ, अपराध नियंत्रण, अभियोजन और वाद को शक्ति, उल्लंघन, प्रवर्तन, अभियोजन या वसूली और राज्य नियंत्रण की पूरी जवाबदेही-श्रृंखला के रूप में पढ़ना चाहिए। राजस्थान लोक सेवा आयोग के पाठ्यक्रम पेज पर ३१/०८/२०२२ को स्थानीय स्वशासन विभाग परीक्षा २०२२ के लिए राजस्व अधिकारी ग्रेड द्वितीय और कार्यपालक अधिकारी ग्रेड चतुर्थ का पाठ्यक्रम जारी दर्ज है। कार्यपालक अधिकारी और राजस्व अधिकारी के पाठ्यक्रम में यह विषय सामान्य नागरिकशास्त्र नहीं, बल्कि एक सघन वैधानिक समूह है। भाग बी में राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, २००९ के अधीन नगरीय शक्तियां और अपराध, अभियोजन और वाद तथा नियंत्रण अलग-अलग लिखे गए हैं। यह भाषा तैयारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि अधिनियम को जुड़े हुए खंडों में पढ़ना है। पहले नगरपालिका को नियामक शक्तियां मिलती हैं, फिर उन शक्तियों का पालन सूचना, हटाने की कार्रवाई और दंड से कराया जाता है, उसके बाद अभियोजन या दीवानी वाद का रास्ता आता है और अंत में राज्य सरकार या उसके प्राधिकृत अधिकारी नगरपालिका की वैधता पर निगरानी रखते हैं। इसलिए अच्छे उत्तर में केवल अपराधों की सूची नहीं, बल्कि क्रम दिखना चाहिए: शक्ति, उल्लंघन, प्रवर्तन, अभियोजन या वसूली और फिर पर्यवेक्षी सुधार।

अधिनियम का मानचित्र अध्याय १२ से पहले ही शुरू हो जाता है। धारा ४९ मुख्य नगरपालिका अधिकारी को प्रस्तावों, लाइसेंसों, अनुमतियों और आदेशों के अभिलेख रखने तथा उन्हें विधिक रूप से प्रमाणित करने वाला अधिकारी बनाती है। वही अधिकारी नगरपालिका की अवैध कार्रवाई के विरुद्ध सलाह देता है और असहमति नोट को सरकार या प्राधिकृत अधिकारी तक भेजता है। धारा ५५, ५९ और ६१ समिति-व्यवस्था और प्रत्यायोजन का रास्ता समझाती हैं। ये धाराएं इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि कई प्रश्नों में असली बात यह होती है कि कार्रवाई किसने की: नगरपालिका, मुख्य नगरपालिका अधिकारी, समिति, प्राधिकृत अधिकारी, कलेक्टर, स्थानीय निकाय निदेशक, जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार। सही उत्तर अक्सर इसी अधिकार-रेखा पर निर्भर करता है।

अध्याय १२ का शीर्षक नगरीय शक्तियां और अपराध है। इसमें नालियां, सीवरेज, जलापूर्ति, सड़कें, प्रकाश व्यवस्था, खतरनाक भवन, अतिक्रमण, पशु, बाजार, वधशालाएं, खतरनाक रोग, कब्रिस्तान या श्मशान, कारोबार, सूचनाएं और अवज्ञा जैसे व्यावहारिक नियंत्रण क्षेत्र आते हैं। यह अध्याय प्रशासनिक भी है और दंडात्मक भी। उदाहरण के लिए धारा २०० नालियों और सोख-गड्ढों को नगरपालिका के सर्वेक्षण और नियंत्रण में रखती है। धारा २४५ सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण या अस्थायी बाधा को दंडित करती है और नगरपालिका या प्राधिकृत अधिकारी को अतिक्रमण हटाकर खर्च वसूलने की शक्ति भी देती है। यही ढांचा अध्याय में बार-बार दिखता है: लिखित सूचना, पालन के लिए समय, चूक होने पर नगरपालिका द्वारा काम, खर्च की वसूली और अवज्ञा पर आपराधिक दंड।

अध्याय १२-क संपत्ति के विरूपण की रोकथाम पर अलग खंड है। धारा २९७क सार्वजनिक दृश्य में थूकने, मूत्रत्याग करने, पोस्टर चिपकाने, या स्याही, चाक, रंग अथवा किसी सामग्री या तरीके से लिखकर या निशान लगाकर संपत्ति का विरूपण करने को दंडित करती है। केवल स्वामी या अधिभोगी का नाम और पता लिखना अलग माना गया है। धारा २९७ख और २९७ग प्रयास तथा दुष्प्रेरण तक दायित्व फैलाती हैं, जबकि धारा २९७घ और २९७ङ नगरपालिका या प्राधिकृत अधिकारी को निशान मिटाने तथा अभियोजन वापस लेने या अपराध का शमन करने की अनुमति देती हैं। परीक्षा में यह छोटा खंड इसलिए प्रिय है क्योंकि इसमें न्यूनतम और अधिकतम दंड साफ मिलते हैं।

अध्याय १३, अर्थात अभियोजन, वाद आदि, अध्याय १२ का प्रक्रियात्मक पुल है। धारा २९९ समझौता, अभियोजन-वापसी और घोषित शमनीय अपराधों के शमन की शक्ति देती है। धारा ३०१ कुछ अपराधों को संज्ञेय और जमानतीय घोषित करती है। धारा ३०३ वैधानिक वसूली असफल होने या न अपनाए जाने पर नगरपालिका को वसूली योग्य राशि के लिए वाद दायर करने देती है। धारा ३०४ आधिकारिक क्षमता में किए गए या किए जाने का दावा किए गए कार्यों पर नगरपालिका या उसके अधिकारियों के विरुद्ध वाद से पहले दो महीने की सूचना और छह महीने की सीमा तय करती है, साथ में निषेधाज्ञा का संकीर्ण अपवाद भी है। अध्याय १४ राज्य नियंत्रण देता है: निरीक्षण, अभिलेख मंगाना, अवैध या हानिकारक प्रस्तावों का निलंबन, आपात कार्रवाई, नगरपालिका के कर्तव्य में चूक पर सरकारी निष्पादन, गंभीर स्थिति में विघटन, उपविधियों या नियमों का रद्द या संशोधन, सरकारी शक्तियों का प्रत्यायोजन और नगरपालिका आदेशों या प्रस्तावों को रद्द, उलट या संशोधित करने की पुनरीक्षणीय शक्ति। इस तरह यह विषय पूरी जवाबदेही-श्रृंखला है और इसे उसी रूप में दोहराना चाहिए।