प्रागैतिहासिक स्थल एवं प्राचीन राजस्थान
मुख्य तथ्य
- राजस्थान के प्रागैतिहास का पुनर्निर्माण लिखित स्रोतों से नहीं, बल्कि औजार, आवास-स्तर, अस्थि, राख, मृद्भांड और भू-दृश्य से होता है।
- अरावली, बनास और चंबल ने खनिज, जल, मार्ग और नदी-छज्जों के कारण शुरुआती बसावट की दिशा तय की।
- नागौर का डीडवाना 16आर ड्यून गहरे प्लाइस्टोसीन संदर्भ और एच्युलियन औजारों से निम्न पुरापाषाण का मुख्य आधार है।
- कोठारी नदी का बागोर लंबा मध्यपाषाण क्रम दिखाता है, जहाँ लघुपाषाण आखेट परंपरा पशुपालन और ताम्र संकेतों से जुड़ती गई।
- मेवाड़ की आहड़-बनास संस्कृति काला-लाल मृद्भांड, स्थायी बस्ती और तांबा गलाने की प्रक्रिया से पहचानी जाती है।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान के प्रागैतिहास का पुनर्निर्माण लिखित स्रोतों से नहीं, बल्कि औजार, आवास-स्तर, अस्थि, राख, मृद्भांड और भू-दृश्य से होता है।
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अरावली, बनास और चंबल ने खनिज, जल, मार्ग और नदी-छज्जों के कारण शुरुआती बसावट की दिशा तय की।
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नागौर का डीडवाना 16आर ड्यून गहरे प्लाइस्टोसीन संदर्भ और एच्युलियन औजारों से निम्न पुरापाषाण का मुख्य आधार है।
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कोठारी नदी का बागोर लंबा मध्यपाषाण क्रम दिखाता है, जहाँ लघुपाषाण आखेट परंपरा पशुपालन और ताम्र संकेतों से जुड़ती गई।
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मेवाड़ की आहड़-बनास संस्कृति काला-लाल मृद्भांड, स्थायी बस्ती और तांबा गलाने की प्रक्रिया से पहचानी जाती है।
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हनुमानगढ़ का कालीबंगा दो-टीला योजना, जोते हुए खेत, अग्नि-वेदियों और मानकीकृत ईंटों वाला राजस्थान का प्रमुख हड़प्पा नगर है।
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गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति उत्तर-पूर्वी राजस्थान का ताम्र-शिल्प क्षितिज है, जो अरावली के खनिज क्षेत्र से जुड़ा था।
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बैराठ में भाब्रू अभिलेख और बीजक की पहाड़ी परिसर राजस्थान में अशोककालीन लेख तथा बौद्ध स्थापत्य का ठोस प्रमाण देते हैं।
राजस्थान के प्रागैतिहास को काल-विभाजन और अरावली-बनास-चंबल भू-दृश्य से कैसे समझें?
राजस्थान के प्रागैतिहास को काल-विभाजन, औजारों के बदलाव और अरावली-बनास-चंबल भू-दृश्य के मेल से समझना चाहिए, क्योंकि लिखित इतिहास से पहले यही तीन आधार मानवीय बसावट और तकनीक का क्रम बताते हैं। राजस्थान का प्रागैतिहास उस समय से शुरू होता है जब लिखित अभिलेख, सिक्के या राजवंशी वृत्तांत उपलब्ध नहीं थे, इसलिए उसका पुनर्निर्माण औजारों, आवास-स्तरों, अस्थियों, राख की परतों, मृद्भांडों और भू-दृश्य के सहारे किया जाता है।
- इस विषय में प्राचीन राजस्थान वहां से आरम्भ माना जाता है जहां अभिलेखीय और आरंभिक ऐतिहासिक साक्ष्य स्पष्ट होने लगते हैं, और यह क्रम लगभग ६०० ईस्वी तक जाता है।
- इसलिए एक ही जिला कभी पाषाणयुगीन पड़ाव, ताम्रपाषाण बस्ती और बाद का अभिलेखीय स्थल एक साथ दे सकता है, पर तीनों की साक्ष्य-प्रकृति अलग होती है।
कालक्रम और तकनीकी परिवर्तन
| कालक्रम | समय | तकनीकी संकेत |
|---|---|---|
| निम्न पुरापाषाण | लगभग २५ लाख-१,००,००० वर्ष पूर्व | आरंभिक चरणों में बड़े कोर और शल्क औजार प्रमुख |
| मध्य पुरापाषाण | लगभग १,००,०००-४०,००० वर्ष पूर्व | आरंभिक चरणों में बड़े कोर और शल्क औजार प्रमुख |
| उच्च पुरापाषाण | लगभग ४०,०००-१०,००० वर्ष पूर्व | पुरापाषाण क्रम का उच्च चरण |
| मध्यपाषाण | लगभग १०,०००-५००० ईसा पूर्व | लघुपाषाण फलक अधिक मिलते हैं |
| नवपाषाण | लगभग ७०००-३००० ईसा पूर्व | घिसे-पॉलिश किए पत्थर और कृषि की स्पष्टता बढ़ती है |
| राजस्थान का ताम्रपाषाण | लगभग ३५००-१५०० ईसा पूर्व | पत्थर के साथ तांबे का उपयोग दिखाई देता है |
- यह केवल समय का क्रम नहीं है, बल्कि तकनीकी परिवर्तन का भी क्रम है।
अरावली-बनास-चंबल पर्यावरणीय ढांचा
राजस्थान का पर्यावरणीय ढांचा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अरावली पर्वतमाला, बनास अपवाह तंत्र, चंबल घाटी ने आरंभिक बसावट के तीन बड़े पट्टे बनाए।
| भू-दृश्य | विशेषता | बसावट में महत्व |
|---|---|---|
| अरावली पर्वतमाला | भारत की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमालाओं में गिनी जाती है | क्वार्ट्जाइट, तांबा-समृद्ध क्षेत्र, आश्रय स्थल और पूर्वी-पश्चिमी राजस्थान को जोड़ने वाले मार्ग देती है |
| बनास अपवाह तंत्र | मेवाड़ और दक्षिण-पूर्वी मैदानी भागों से गुजरता है | जल, जलोढ़, चराई क्षेत्र और ऐसे संपर्क-पथ देता है जिन पर आगे बागोर और आहड़ जैसे स्थल विकसित हुए |
| चंबल क्षेत्र | हाड़ौती का क्षेत्र | नदी-सीढ़ियों, बीहड़ों और पठारी किनारों के कारण बार-बार मानवीय निवास के लिए उपयुक्त रहा |
| थार मरुस्थल | पश्चिम में | स्थायी जलस्रोतों से दूर दीर्घकालिक बसावट को सीमित किया |
पुरातात्विक शब्दावली और तिथि-निर्धारण
| शब्द / विधि | अर्थ / उपयोग |
|---|---|
| पुरापाषाण औजार | सामान्यतः कोर से निकाले गए पत्थर उपकरणों को सूचित करता है |
| लघुपाषाण | छोटे फलक या शल्क होते हैं जिन्हें प्रायः लकड़ी या अस्थि में जड़ा जाता था |
| ताम्रपाषाण | पत्थर और तांबे का सह-अस्तित्व |
| अर्ध-ऐतिहासिक समुदाय | उन समुदायों के लिए कहा जाता है जिनकी लिपि मिलती है पर अभी पढ़ी नहीं गई है |
| रेडियोकार्बन / कार्बन-१४ तिथि-निर्धारण | पत्थर नहीं बल्कि जैविक अवशेषों की तिथि देता है |
| स्तरविन्यास | परतों के ऊपर-नीचे क्रम से अनुक्रम बताता है |
| प्रकारशास्त्र | आकार और निर्माण-शैली की तुलना करता है |
| प्रकाश-उद्दीप्त ल्यूमिनेसेन्स | उपयुक्त अवसादों पर उपयोग किया जाता है |
संस्थागत इतिहास
| संस्था / विद्वान | तिथि / अवधि | योगदान |
|---|---|---|
| भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण | १८६१ | एलेग्जेंडर कनिंघम के काल में स्थापना; भारत में संगठित पुरातात्विक सर्वेक्षण का मूल स्थापना-सूत्र |
| सर्वेक्षण परंपरा | २०वीं शताब्दी | बड़े उत्खनन और सर्वेक्षण हुए |
| बी.बी. लाल | १९६० से १९६९ | कालीबंगा के कार्य से राजस्थान को हड़प्पा और अर्ध-ऐतिहासिक बहस के केंद्र में रखा |
| एच.डी. साँकलिया | २०वीं शताब्दी | आहड़ और बागोर को शोध का महत्व दिया |
| वी.एन. मिश्र | १९७३ | बनास क्षेत्र के मध्यपाषाण स्वरूप को अधिक स्पष्ट किया |
| पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान | वर्तमान | संग्रहालयों, स्थलों, प्रकाशनों और राज्य-स्तरीय संरक्षण से इस परंपरा को आगे बढ़ाता है |
| इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का राजस्थान पुरातात्विक-स्थल पोर्टल | वर्तमान | अजमेर, पुष्कर, भीलवाड़ा और उदयपुर जैसे जिलों को सूचीबद्ध करता है |
इस प्रकार यह खंड आगे आने वाले स्थल-आधारित अध्यायों का आधार-मानचित्र देता है। काल-विभाजन बताता है कि सामने कौन-सा सांस्कृतिक स्तर है, और अरावली-बनास-चंबल ढांचा बताता है कि वे स्तर किन भौगोलिक पट्टों में सघन हुए। राजस्थान में यह क्रम विशेष रूप से इसलिए सुरक्षित है क्योंकि अर्ध-शुष्क दशाएं राख, अस्थि, ताम्र वस्तुओं और बसावट के अवशेषों को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट रूप में बचाए रखती हैं।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ राजस्थान के प्रागैतिहास में कुटे-पत्थर की आरंभिक परंपराओं से तांबा-पत्थर सह-अस्तित्व तक का सही पूर्व से उत्तरवर्ती क्रम किस विकल्प में है?
व्याख्या
विकल्प क सही है क्योंकि दीर्घ पुरापाषाण क्रम निम्न से मध्य और फिर उच्च पुरापाषाण तक जाता है, उसके बाद मध्यपाषाण का लघुपाषाण चरण, फिर नवपाषाण की कृषक पृष्ठभूमि और अंत में ताम्रपाषाण का तांबा-पत्थर सह-अस्तित्व आता है। इस खंड में दिए गए काल-बंध भी यही क्रम दिखाते हैं: उच्च पुरापाषाण लगभग 40,000-10,000 वर्ष पूर्व तक जाता है, मध्यपाषाण लगभग 10,000-5000 ईसा पूर्व है और राजस्थान का ताम्रपाषाण लगभग 3500-1500 ईसा पूर्व माना जाता है। विकल्प ख इसलिए आकर्षक लगता है क्योंकि कई विद्यार्थी केवल निम्न और उच्च पुरापाषाण याद रखते हैं, पर मध्य पुरापाषाण को उच्च के बाद नहीं रखा जा सकता। विकल्प ग गलत है क्योंकि मध्यपाषाण, उच्च पुरापाषाण से पहले नहीं आता। विकल्प घ दो कारणों से गलत है: इसमें नवपाषाण और मध्यपाषाण का क्रम उलटा है और ताम्रपाषाण के स्थान पर कांस्य युग रख दिया गया है।
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